शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

शिवपुराण (नारद मोह भंग कथा) लेख संख्या 4

                       नारद मोह भंग कथा
   व्यास जी भगवान शिव की वंदना करके तथा भगवती माता एवं गणेश जो नमस्कार करने के उपरांत आगे की कथा प्रारंभ करते हैं। शौनिक आदि ऋषियों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए सूत जी कहते हैं कि भगवान शंकर जी के गुणों का वर्णन सात्विक, राजस और तामस तीनों ही प्रकृति के मनुष्यों को सदा आनंद ही प्रदान करने वाला है। हे ब्राह्मणों मैं अब आपको यथा बुद्धि शिव लीला का वर्णन करता हूँ।
   एक बार महामुनि नारद जी, जो  कि  ब्रह्मा जी के  पुत्र हैं, ने विनीतचित हो तपस्या में मन लगाया। हिमालय पर्वत  में  कोई एक गुफा थी, जो बड़ी शोभा से संपन्न दिखाई देती थी।  उसके निकट देवनदी गंगा जी निरंतर वेगपूर्वक बहती थीं।  वहां  एक महान दिव्य आश्रम था। दिव्यदर्शी नारद जी तपस्या  करने  के लिए उसी आश्रम में गए। उस गुफा को देखकर  मुनिवर  बहुत प्रसन्न हुए और सुदीर्घ काल तक वहीं तपस्या करते रहे। उनका अंत: करण शुद्ध था। चिर काल के  लिए  वो  समाधि  में  चले गए।
   उनकी ऐसी तपस्या का समाचार पाकर  देवराज  इन्द्र  कांप उठे। वो मानसिक संताप से विह्वल हो गए। इन्द्र ने  सोचा  कि नारद मुनि उनका राज्य छीन लेना चाहते हैं। यह सोचकर  इन्द्र ने उनकी समाधि भंग करने के लिए कामदेव को  भेजा।  परंतु उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली।
   हे ऋषियो, ऐसा होने में जो कारण था वो सुनो। उसी आश्रम में पहले समय में भगवान शिव ने उत्तम  तपस्या  की  थी  और कामदेव को भस्म कर डाला था। तब  रति के प्रार्थना करने पर महादेव जी ने कहा कि कुछ समय बाद कामदेव जीवत तो  हो जाएंगे परंतु इस आश्रम पर इनका कोई प्रभाव नहीं होगा। इस लिए यह कहा जा सकता है की नारद जी ने कामदेव को  शिव भगवान के कारण ही जीता था।  इसमें  कोई  संशय  नहीं  है। परंतु नारद जी भगवान शिव की माया के कारण इस बात को नहीं जान पाए और उन्हें अपनी जीत का  अभिमान  हो  गया।
   अब अपनी इस जीत की प्रसन्नता में नारद जी  सबसे पहले  भगवान रुद्र के पास पहुंचे। प्रसन्नता से मुस्कुराते हुए  भगवान रुद्र  को सारी कथा सुना दी। भगवान ने कहा कि हे नारद तुम बहुत ही ज्ञानवान हो। इस लिए मैं  तुम्हें  कहता  हूँ  कि अपनी सिद्धियों का वर्णन किसी के पूछने पर भी नहीं करना  चाहिए। इस लिए अब तुम किसी से भी इस बात की चर्चा  मत  करना। नारद जी पर तो भगवान की माया का पर्दा पड़ा हुआ था। इस लिए उन्होंने भगवान की आज्ञा  को  हितकर  नहीं  माना  और यही सब बताने अपने पिता ब्रह्मा जो के पास चले गए।
   ब्रह्मा जी ने जब नारद जी को सुना तो वो जान गए कि नारद को अभिमान हो गया है। उन्होंने  भी  नारद को  समझाया  कि इस बात की चर्चा भूल कर भी भगवान विष्णु से ना करें। परंतु जब व्यक्ति को अभिमान हो जाता है तो उससे अपनी प्रसन्नता कहां छिपाई जाती है। नारद जी ने अपने पिता जी की बात भी नहीं मानी और वहां से सीधे  भगवान विष्णु जी  के  पास  चले गए।
    भगवान विष्णु से क्या छिपा था। वो तो सब जानते  ही  थे। नारद जी उनके प्रिय  भक्त हैं और भक्त के मन में जब भगवान अहंकार का अंकुर फूटता हुआ देखते हैं तब वे  शीघ्र ही अपने प्रिय भक्त के अभिमान को  हर लेते हैं।  नारद  के वहां पहुंचते ही विष्णु जी ने नारद जी  का बहुत सम्मान किया। उन्हें  बैठने  के लिए अपना ही आसान दे दिया और साथ ही  बहुत  प्रशंसा भी कर दी। बस फिर क्या था नारद जी ने अभिमान पूर्वक वह सारी की सारी कथा कह सुनाई। विष्णु जी ने कहा कि हे नारद जी आपने तो बहुत ही उत्तम कार्य किया  है।  नारद  जी  विदा लेकर चले गए।
   जब नारद जी जा रहे थे, उनके रास्ते में भगवान  विष्णु और भगवान शिव की प्रेरणा से एक माया की नगरी का निर्माण  हो गया। वह नगरी अलकापुरी से भी सुंदर जान पड़ती  थी।  वहां के राजा का नाम सीलनिधि था। वहां  सीलनिधि की कन्या का स्वयंवर भी होने वाला था। इस लिए नगर को और भी  अधिक सजाया गया था। नारद जी यह सब  देखकर  मोहित  हो  गए। जब राजा को पता चला कि नारद जी उसके नगर  में  आए  हैं तो उसने उनका बहुत आदर सत्कार किया। उनके चरण धोकर आसन दिया और बताया कि हे मूनिवर मेरी एक कन्या  भी  है जिसका नाम श्रीमती है उसका स्वयंवर होने वाला  है।  हे मुने! आप मेरी इस कन्या के भविष्य एवं भावी  वर  के  बारे  बताने की कृपा करें। जैसे ही नारद जी ने कन्या का हाथ देखा, उनके मन में काम भावना ने घर कर लिया।  नारद  जी  ने  राजा  को बताया कि यह कन्या बहुत ही  भागयशाली है।  इसका  वर तो भगवान के ही जैसा होगा। यह कह कर नारद  जी ने  विदा  ले ली।
   बाहर आकर सोचने लगे कि मैं कौन सा उपाय करूं जिससे  वह कन्या मेरे गले में वरमाला डाल दे और मेरी उससे शादी हो जाए। फिर वे सोचने लागे कि यदि  भगवान  विष्णु  मुझे  कुछ समय के लिए अपना रूप प्रदान कर दें तो  आवश्य  ही  कन्या मेरी सुंदरता को देख कर मेरे गले में वरमाला डाल  देगी।  ऐसा सोचकर उन्होंने  भगवान  विष्णु  जी  का  स्मरण  किया।  जब भगवान प्रकट हुए तो नारद जी ने  उन्हें  सारी  बात  बता  कर कहा कि वो  उसे  अपना  मोहिनी  रूप  प्रदान  करें।  भगवान विष्णु जी ने कहा कि है नारद मैं तुम्हारा हित साधन उसी तरह करूंगा जैसे वैद्य अत्यंत पीड़ित  रोगी  का  करता  है;  क्योंकि तुम मुझे बहुत प्रिय हो। इतना कह कर अपनी माया से  इन्होंने नारद को शरीर तो अपने जैसा ही प्रदान कर दिया परंतु  ऊपर चेहरा वानर का लगा दिया।
   जब नारद जी स्वयंवर सभा में पहुंचे  तो  वहां  भगवान शिव के दो गण भी आए हुए थे। उन्होंने नारद जी का बहुत उपहास किया। जब स्वयंवर हुआ तो कन्या ने वरमाला भगवान  विष्णु जी के गले में डाल दी। जब स्वयंवर हो गया तो दोनों पार्षदों ने नारद जी को दर्पण में उनका वानर रूप  दिखलाया और  कहा हे मुने! तुम व्यर्थ ही काम से मोहित हो रहे हो  और  सौंदर्य  के बल से राजकुमारी को पाना चाहते हो। अपना वानर के समान घृणित मुंह तो देख लो। नारद जी को बड़ा विस्मय  और  क्रोध हुआ। वे शिव की माया से मोहित थे। दर्पण में अपने  मुख  को देखकर क्रोधित हो उठे। दोनों शिव गणों को शाप देते हुए बोले -- अरे! तुम दोनों ने मुझ ब्राह्मण का  उपहास  किया  है।  अतः तुम ब्राह्मण के वीर्य से उत्पन राक्षस हो जाओ।
   नारद जी उसी समय क्रोध की  अग्नि  में  जलते  हुए  विष्णु लोक को गए। उनका ज्ञान नष्ट हो गया था। इस लिए वे दुर्वचन पूर्ण व्यंग्य सुनान लगे।
   नारद जी ने कहा -- हरे! तुम बड़े दुष्ट, कपटी और  विश्व  को मोह में डालने वाले हो। दूसरों का उत्कर्ष तो  तुमसे  सहा  नहीं जाता। तुमने स्त्री के लिए मुझे व्याकुल किया है। तुम मनुष्य हो जाओ और स्त्री के वियोग का दुख भाेगो।  तुमने  जिन  वानरों के समान मेरा मुंह बनाया था, वे ही उस समय तुम्हारे सहायक हों। तुम्हें स्त्री के वियोग का दुख प्राप्त  हो।  अज्ञान  से  मोहित मनुष्य के समान तुम्हारी स्थिति हो। श्री हरि ने  शंभु  की  माया की प्रशंसा करते हुए उस शाप को स्वीकार कर लिया।
   तभी महालीला करने वाले शंभु ने अपनी उस  विश्व  मोहिनी माया को, जिसके कारण ज्ञानी नारद मुनि भी  मोहित  हो  गए थे, खींच लिया। उस माया के तिरोहित होते ही नारद जी पहले जैसे ही शुद्ध बुद्धि से युक्त हो गए। नारद जी भगवान विष्णु के चरणों में गिर पड़े और  बोले, हे नाथ माया से मोहित  होने  के कारण मेरी बुद्धि बिगड़ गई थी।  इस  लिए  मैंने  आपके  लिए बहुत दूर्वचन कहे हैं। आपको शाप  तक  दे  डाला  है। अब  मैं निश्चय ही नरक में पडूंगा। मैं आपका दास हूं प्रभु। अब मैं क्या उपाय और क्या प्रायश्चित करूं, जिससे मेरा पाप समूह नष्ट हो जाए। तब विष्णु जी ने कहा, तात खेद ना करो। तुम  मेरे  श्रेष्ठ भक्त हो। सुनो, तुमने मद में आकर भगवान शिव की बात नहीं मानी थी। तुम अपने मन में यह दृढ़ निश्चय कर लो कि यह सब कुछ भगवान शिव की इच्छा से ही हुआ है। भगवान शिव तीनों गुणों से परे हैं। वे सच्चिदानंद निर्गुण और  निर्विकार  हैं। वे  ही अपनी माया को लेकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन  तीन  रूपों में प्रकट होते हैं। निर्गुण अवस्था में उन्हीं का नाम  शिव  है।  वे ही परमात्मा, महेश्वर, परब्रह्म, अविनाशी, अनंत  और  महादेव आदि नामों से कहे जाते हैं।
   तुम अब भगवान शंकर के सुयश का  गान  करो, सदा  शिव के शतनाम स्तोत्र का पाठ करो। उन्हीं की उपासना और भजन करो। उन्हीं के यश को सुनो और गाओ। प्रतिदिन उन  की  ही  पूजा अर्चा करते रहो। भगवान शिव के  नाम  रूपी  नौका  का जो आश्रय लेते हैं, वे संसार सागर से पार हो जाते हैं। अब तुम जाओ और भगवान शिव का ध्यान करते हुए पहले उनके तीर्थ स्थानों के दर्शन करो और तत्पश्चात ब्रह्मलोक में जाकर  अपने पिता ब्रह्मा जी से भगवान शिव की भक्ति का ज्ञान  प्राप्त  करो और शिव भक्त होकर मोक्ष के भागी बनो।
   भगवान श्री हरि के अंतर्धान हो जाने पर मुनिश्रेष्ठ  नारद  जी शिवलिंगों का भक्ति पूर्वक दर्शन करते हुए  पृथ्वी  पर  विचरने लगे। उनके चित्त को  शुद्ध  हुआ  जानकर  वे  दोनों  शिव गण जिनको नारद जी द्वारा शाप मिला था, नारद जी के पास  आए और क्षमा याचना करने लगे। नारद जी  ने  दया  करके  उनको कहा कि सुनिए, आप  दोनों भगवान शिव के गण हैं और बहुत सम्माननीय हैं। मेरी बुद्धि भृष्ट हो गई थी।  अब  तुम  दोनों  मेरे द्वारा दिए शाप से उद्धार की बात सुनिए। तुम दोनों ही मुनीवर  विश्रवा   के वीर्य  से  जन्म  ग्रहण  करके  सम्पूर्ण  दिशाओं  में प्रसिद्ध ( कुंभकर्ण और रावण) के रूप में रक्षाश राज  का  पद प्राप्त करेंगे और शिव के ही दूसरे रूप भगवान विष्णु के  हाथों मृत्यु पाकर फिर अपने पद पर प्रतिष्ठित हो जाएंगे।
    तब नारद जी ने काशी पुरि समेत सभी शिव तीर्थ स्थानों के दर्शन किए और ब्रह्म लोक की ओर चल दिए।
                           ॐ नमः शिवाय
 
   

रविवार, 12 अप्रैल 2020

शिवपुराण (शिवलिंग की स्थापना) लेख संख्या - 3

                       शिवलिंग की स्थापना
   सूत जी कहते हैं कि अनुकूल एवं शुभ समय में किसी पवित्र तीरथ में, नदी आदि के तट पर अपनी  रुचि  के  अनुसार  ऐसे स्थान पर शिवलिंग की स्थापना करनी चाहिए जहां नित्य  प्रति पूजन हो सके।
   पार्थिव द्रव्य से, जलमय  द्रव्य  से  अथवा  तैजस  पदार्थ  से अपनी रुचि के अनुसार कल्पोक्त लक्षणों से युक्त शिवलिंग का निर्माण करके इसकी पूजा करने से पूरा पूरा फल  प्राप्त  होता है।
   यदि चल प्रतिष्ठा करनी हो तो इसके लिए छोटा सा शिवलिंग अथवा विग्रह श्रेष्ठ माना  जाता  है।  और  यदि  अचल  प्रतिष्ठा करनी हो तो स्थूल शिवलिंग अथवा  विग्रह  अच्छा  माना  गया है।
   शिवलिंग का पीठ गोल, चौकोर,  त्रिकोण  अथवा  खाट  के पाए की भांति  ऊपर  नीचे  मोटा  और  बीच  में  पतला  होना चाहिए।
   जिस  द्रव्य ( मिट्टी,  लोहे, पत्थर आदि )  से   शिवलिंग  का निर्माण हो, उसी द्रव्य से ही उसका  पीठ  भी  बनाना  चाहिए।
परंतु बाण लिंग के लिए यह नियम नहीं है।
   लिंग की लंबाई यजमान की 12 अंगुल से और चर लिंग  की लंबाई यजमान की एक अंगुल से कम नहीं होनी चाहिए। परंतु अधिक होने में दोष नहीं है।
   देवालय देवगणों की मूर्तियों से अलंकृत हो। उसका  गर्भग्रह बहुत ही सुंदर, सुदृढ और दर्पण के समान स्वच्छ होना चाहिए। उसे नौ प्रकार के रत्नों से विभूषित किया गया  हो।  उसमें  पूर्व और पश्चिम दिशा में दो द्वार हों।
   जहां स्थापना करनी हो उस स्थान के गर्त  में  नीलम,  लाल वैदुर्य, श्याम, मरकत, मोती, मूंगा,  गोमेद  और  हीरा - इन  नौ रत्नों को तथा अन्य महत्व पूर्ण द्रव्यों को वैदिक मंत्रों  के  साथ छोड़ें। सद्योजात आदि पांच  वैदिक  मंत्रों  द्वारा  शिवलिंग  का पांच स्थानों में क्रमशः पूजन करके अग्नि में हविष्य की  अनेक आहुतियां दे और परिवार सहित शिव पूजा करके  गुरु  स्वरूप आचार्य को धन से तथा सभी बंधुओं को मनचाही  वस्तुओं  से संतुष्ट करे। याचकों  को  जड़ (सुवर्ण, गृह एवं भू संपत्ति) तथा चेतन (गौ आदि) वैभव प्रदान करे।
   स्थावर एवं जंगम सभी प्रकार के जीवों को यत्नपूर्वक संतुष्ट करके वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए  परम  कल्याणकारी महादेव जी का ध्यान करे। तत्पश्चात नादघोश  से युक्त महामंत्र ओंकार (ॐ) का उच्चारण कारके शिवलिङ्गं की  स्थापना  कर के उसे पीठ से संयुक्त करे।  इसी  प्रकार वहां मूर्ति की भी उसी तरह स्थापना की जाए।
   फिर वैदिक विधि से पूजा की जाए। तब से  नित्य  प्रति  उस शिवलिंग की पूजा की जानी चाहिए।
   यदि चर लिंग है तो षोडशोपचार  पूजन  किया  जाए।  जैसे आवाहन, आसन, अर्घ्य, पद्य, पाध्यांग  आचमन,  स्नान,  वस्त्र एवं यज्ञोपवीत, गंध, पुष्प,  धूप,  दीप, नैवेद्य,  तांबूल  समर्पण, निराजन, नमस्कार और विसर्जन - यह सोलह उपचार हैं।  यह सब यथा शक्ति नित्य करें।
   स्थापना से संबंधित मुख्य बातें ही यहां  इस  लेख  में  लिख रहा हूँ। अन्यथा शिव पुराण ग्रंथ में तो इतने विस्तार से  बताया गया है कि उसे पूरा लिखने के लिए तो पूरी पुस्तक ही लिखनी पड़ेगी। मुख्य बात यह है कि शिवलिंग  की  स्थापना  विधिवत करनी चाहिए और शिवलिंग की पूजा नित्य प्रति  करने  से  ही पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।
            विद्येश्वर संहिता के दूसरे मुख्य बिंदु
   विद्येश्वर संहिता में आगे मोक्षदायक पुन्यक्षेत्रों का  वर्णन  भी किया गया है जिसमें पवित्र नदियां जैसे सिंधु, सतलज,  नर्मदा सरस्वती, गंगा, कृष्णा आदि जिनके तटों पर  महान  पुरषों  के तपस्या करने से कई पुण्य क्षेत्र बन गए हैं। वहां पर जाकर  भी पुण्य कर्म करने  चाहिएं।  नैमिशारण्य  एवं  बद्रिकाश्रम  आदि कई  पुण्य क्षेत्रों की महिमा बताई गई है।
काल विशेष में विभिन्न नदियों के जल में स्नान आदि करने  के उत्तम फल के बारे में भी बताया गया है।
   इसके इलावा इस विद्येश्वर  संहिता  में  सदाचार,  शौचाचार, स्नान, भस्म धारण, संध्या वंदन, प्रणव जप, गायत्री जप, दान, न्यौता: धनोपार्जन तथा अग्निहोत्र आदि की विधि एवं  महिमा का वर्णन किया गया है।
   इसके बाद विद्येश्वर संहिता में अग्नि यज्ञ, देव यज्ञ, ब्रह्म  यज्ञ आदि का वर्णन किया गया है। इसमें यह भी स्पष्ट  किया  गया है कि सातों वारों का निर्माण भी भगवान शिव  ने ही  किया  है और साथ ही उनमें देव अराधना से विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति का वर्णन भी किया गया है।
   इसके बाद देश, काल, पात्र, और दान आदि का विचार और रुद्राक्ष धारण की महिमा तथा उसके विविध भेदों का वर्णन भी मिलता है।
   बताया गया है कि विद्येश्वर संहिता सम्पूर्ण सिद्दिओं  को  देने वाली तथा भगवान शिव की आज्ञा से नित्य मोक्ष  प्रदान  करने वाली है।
                        ॐ नमः शिवाय
       
 
 
 


   

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

शिवपुराण (परिचय) लेख संख्या - 2

                          विद्येश्वर संहिता
                      शिवपुराण का परिचय
   पूर्व काल में भगवान शिव ने एक ही पुराण ग्रंथ ग्रथित किया था जिसकी श्लोक संख्या सौ करोड़  थी।  जिसमें  शिव पुराण के एक लाख श्लोक हैं। इस शिव पुराण के  बारह भेद या खंड हैं। सृष्टि के आदि में निर्मित  हुआ  वह पुराण - साहित्य अत्यंत विस्तृत था।
   फिर द्वापर आदि युगों  में  द्वैपायन व्यास  आदि  ऋषियों  ने जब पुराण का अठारह भागों में विभाजन कर दिया, उस समय सम्पूर्ण पुराणों का संक्षिप्त  स्वरूप  केवल  चार लाख  श्लोकों का  रह गया।  उस समय  उन्होंने शिवपुराण का चौबीस हजार श्लोकों में प्रतिपादन किया। यही  इसके श्लोकों की  संख्या है। यह वेद तुल्य पुराण सात संहिताओं में बंटा हुआ है।
1. विद्येश्वर संहिता 2. रुद्र संहिता 3. शत रुद्र संहिता 4. कोटि रुद्र  संहिता  5. उमा  संहिता  6. कैलास  संहिता  7. वायवीय संहिता।
   शिव पुराण वेद के तुल्य प्रामाणिक तथा सबसे  उत्कृष्ट  गति प्रदान करने वाला, जीव समुदाय  के  लिए  उपकारक,  त्रिविध ताप का नाश करने  वाला और  विज्ञानमय  है। यह  धर्म, अर्थ काम और मोक्ष प्रदान करने वाला है। यह  पुराण  ईर्ष्या  रहित अंत: करण वाले विद्वानों के लिए जानने योग्य है।  जो बड़े  ही आदर से इसे पढ़ता और सुनता है, वह भगवान शिव का  प्रिय होकर परम गति को प्राप्त कर लेता है।
                साध्य - साधन आदि का विचार
   वेदांतसार सर्वस्वरूप  अद्भुत  शिवपुराण  की  कथा  आरंभ करते हुए सूत जी कहते हैं कि शिव पुराण में  भक्ति, ज्ञान और वैराग्य - इन तीनों का प्रीति पूर्वक गान किया गया है।  वर्तमान कल्प के आरंभ में छ: कुलों के महा ऋषियों को  सम्पूर्ण  तत्वों से परे परात्पर पुराण पुरुष के बारे में बताते हुए  ब्रह्मा  जी  ने  कहा  था  कि जहां से, मन सहित वाणी, उन्हें ना  पाकर  लौट  आती है  तथा जिनसे ब्रह्मा,  विष्णु,  रुद्र और  इन्द्र  आदि  से  युक्त  यह  सम्पूर्ण जगत  समस्त  भूतों  एवं  इन्द्रियों  के  साथ पहले प्रकट  हुए  हैं, वे ही यह देव, महादेव सर्वग्य एवं  सम्पूर्ण जगत  के  स्वामी  हैं। ये ही सबसे उत्कृष्ट हैं।  इनका  भक्ति  से ही  साक्षात्कार  होता  है।  दूसरे  किसी  उपाय  से कहीं उनका दर्शन नहीं  होता।  रुद्र, हरि, हर तथा अन्य देवेश्वर सदा  उत्तम भक्ति भाव  से  उनका  दर्शन करना चाहते हैं। भगवान शिव में भक्ति होने  से  मनुष्य  संसार बंधन से मुक्त हो जाता है। देवता के कृपा प्रसाद से उनमें भक्ति होती है और भक्ति से देवता का  कृपा  प्रसाद  प्राप्त  होता  है।  यह ठीक उसी तरह  है जैसे कि अंकुर से बीज और बीज से  अंकुर पैदा होता है। शिव  पद की प्राप्ति ही साध्य है और उनकी सेवा  ही  साधन  है।  जो  इच्छा रहित है वही  साधक   है।  वेदोक्त   कर्म  का  अनुष्ठान  करके उसके  महान फल को भगवान शिव के  चरणों  में  अर्पण कर देना ही परमेश्वर  पद  की  प्राप्ति  है। वही मुक्ति भी ही।
   भक्ति के साधन अनेक प्रकार के  हैं।  कान  से  भगवान  के नाम - गुण और लीलाओं का श्रवण, वाणी द्वारा उनका कीर्तन तथा मन के द्वारा उनका  मनन - इन  तीनों  को  महान  साधन कहा गया है। इन तीन साधनों को ही मुक्ति का  उपाय  बताया गया है।  ऋषियों ने सूत जी से पूछा कि हे सूत जी  जो  मनुष्य श्रवण आदि तीनों साधनों को करने में असमर्थ हो  वह  मनुष्य किस उपाय का अवलंबन करके मुक्त हो सकता है?
          भगवान शिव के लिंग एवं साकार विग्रह की
                          पूजा का महत्व
   सूत जी कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति जो उपरोक्त साधन करने में असमर्थ है वह भगवान शंकर के  लिंग  एवं  मूर्ति की  स्थापना करके नित्य ही उसकी पूजा करे।  सूत जी आगे  कहते  हैं  कि केवल भगवान शिव की ही पूजा लिंग और मूर्ति दोनों रूपों  में की जाती है क्योंकि एकमात्र भगवान शिव  ही  ब्रह्म रूप  होने के कारण निष्कल (निराकार) कहे  गए  हैं।  रूपवान  होने  के कारण उन्हें सकल (साकार) भी कहा गया है। शिवलिंग उनके निष्कल स्वरूप का प्रतीक है तथा मूर्ति रूप उनके सकल रूप का प्रतीक है।
 ब्रह्मा जी और विष्णु जी को लिंगपूजन का महत्व बताना
   सूत जी कहते हैं कि एक बार ब्रह्मा और विष्णु जी द्वारा अंत रहित भीषण  अग्निस्तम्भ (ज्योतिर्मय स्तंभ) की  गहराई  और ऊंचाई की थाह लेने की चेष्टा की गई। जब  वे  ऐसा  नहीं  कर पाए तो वहीं पर महादेव जी प्रकट  हुए।  जब  विनम्र  भाव  से दोनों ने शंकर जी की पूजा की तो भगवान शिव ने मुस्करा कर कहा, -- आज का दिन बड़ा महान दिन है। इसमें  तुम्हारे  द्वारा जो आज मेरी पूजा हुई है, इससे मैं तुम लोगों पर  बहुत  प्रसन्न हूँ। इसी कारण यह दिन बहुत पवित्र  और  महान - से - महान होगा। आज की यह तिथि शिवरात्रि के नाम से विख्यात होकर मेरे लिए परम प्रिय होगी। शिवरात्रि में जो  शिवलिंग  की  पूजा करेगा वह पुरुष जगत की सृष्टि  और  पालन  आदि  कार्य  भी कर सकता है। जैसे पूर्ण चंद्रमा का उदय समुद्र  की  वृध्दि  का अवसर है, उसी प्रकार यह शिवरात्रि तिथि मेरे  धर्म  की  वृध्दि का समय है। पहले मैं जब ज्योतिर्मय स्तंभरूप से प्रकट  हुआ था, वह समय मार्गशीर्ष मास में आर्द्रा नक्षत्र से युक्त  पूर्णमासी या प्रतिपदा है। जो पुरुष मार्गशीर्ष मास  में  आर्द्रा  नक्षत्र  होने पर पार्वती सहित मेरा दर्शन करता है अथवा मेरी मूर्ति या लिंग की ही झांकी करता है, वह मेरे लिए कार्तिकेय से  भी  अधिक प्रिय है। उस दिन को मेरे दर्शन मात्र से  पूरा  फल  प्राप्त  होता है। यदि दर्शन के साथ साथ मेरा  पूजन भी  किया जाता है  तो इतना अधिक फल प्राप्त होता है कि उसका वाणी द्वारा  वर्णन नहीं हो सकता।
   वहां पर मैं लिंगरूप से प्रकट होकर बहुत बड़ा हो  गया  था। अत: उस लिंग के कारण ही यह भूतल  लिंगस्थान के  नाम  से प्रसिद्ध हुआ। जगत के लोग इसका दर्शन और पूजन कर सकें इसके लिए यह अनादि और अनंत  ज्योतिस्तंभ  अत्यंत  छोटा हो जाएगा। इसके यहां प्रकट होने  के  कारण  इस  स्थान  का नाम अरुणाचल प्रसिद्ध होगा।
   ब्रहमभाव मेरा निराकार और महेश्वर्भाव साकार  रूप है।  मैं ही सबका आत्मा हूँ। इसके इलावा जगत सबंधी अनुग्रह आदि जो पांच कृत्य हैं वे सदा मेरे  ही  हैं  क्योंकि मैं ही सबका ईश्वर हूँ। लिंग की स्थापना मूर्ति की स्थापना से श्रेष्ठ है।  शिवलिंग के अभाव में सब ओर से मूर्तियुक्त  होने  पर  भी  वह  स्थान  क्षेत्र नहीं कहलाता।
                   पांच कृत्यों का प्रतिपादन
   भगवान शिव बोले कि सृष्टि रचना, सृष्टि पालन, सृष्टि संहार, तिरोभाव और अनुग्रह - यही मेरे जगत संबंधी पांच कार्य हैं जो नित्य सिद्ध हैं। संसार की रचना का जो आरंभ है उसी को सर्ग या सृष्टि कहते हैं। मुझसे पालित होकर उसका सुस्थिर रूप  से रहना ही उसकी स्थिति है। उसका विनाश ही संहार  है।  प्राणों का उत्क्रमण (उन्नत होना) ही तिरोभाव कहलाता है। तथा  इन सब से छुटकारा (मोक्ष) मिल जाना ही अनुग्रह कहलाता है।       भक्तजन इन पांच कृत्यों को पांचों भूतों  में  देखते  हैं।  सृष्टि भूतल में, स्थिति जल में,  संहार  अग्नि  में,  तिरोभाव  वायु  में और अनुग्रह आकाश में स्थित है। पृथ्वी से सबकी  सृष्टि  होती है। जल से सबकी वृद्धि और जीवन रक्षा होती  है। आग  सभी को जला देती है। वायु सबको एक स्थान से दूसरे स्थान पर  ले जाती है। और आकाश सबको अनुग्रहित करता  है।  इन  पांच कृत्यों का भार वहन करने के लिए ही मेरे पांच मुख हैं। हे पुत्रो तुम दोनों ने तपस्या करके  प्रसन्न  हुए  मुझ  परमेश्वर  से  सृष्टि और स्थिति नामक दो कृत्य प्राप्त  किए  हैं।  इसी  प्रकार  मेरी विभूति स्वरूप रुद्र और महेश्वर ने दो अन्य उत्तम  कृत्य  संहार और तिरोभाव मुझसे प्राप्त किए हैं। परंतु अनुग्रह नामक कृत्य दूसरा कोई नहीं पा सकता। रुद्र और महेश्वर  अपने  कार्य  को भूले नहीं हैं। इसलिए मैंने उनके लिए  अपनी  समानता  प्रदान की है। वे रूप, वेष, कृत्य, वाहन, आसन और आयुध आदि में मेरे ही समान हैं।
               प्रणव एवं पंचाक्षर मंत्र की महत्ता
   भगवान शिव आगे कहते हैं कि सबसे पहले मेरे ही  मुख  से ओंकार (ॐ) प्रकट हुआ, जो मेरे स्वरूप का बोध कराने वाला है। ओंकार वाचक है और मैं वाच्य हूँ। यह मंत्र मेरा स्वरूप  ही है। मेरे ही पांचों मुखों से बारी बारी अकार, उकार, मकार, बिंदु और नाद का प्राकट्य हुआ। इन सभी अवयवों से  एकीभूत हो कर वह प्रणव ( ॐ ) नामक एक अक्षर हो गया।
   यह मंत्र शिव और शक्ति दोनों का बोधक  है।  इसी प्रणव से पंचाक्षर मंत्र की उत्पत्ति हुई है, जो मेरे सकल रूप  का  बोधक है। पंचाक्षर मंत्र है - ॐ नमः शिवाय। इसी मंत्र से मात्रिका वर्ण का, उसी से शिरोमंत्र सहित त्रिपदा गायत्री का और गायत्री  से आगे सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए हैं। वेदों से ही भिन्न भिन्न कार्यों को सिद्ध करने के लिए करोड़ों मंत्र निकले हैं। परंतु इन प्रणव एवं पंचाक्षर से सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है।
   इस तरह से भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु जी के मस्तक पर करकमल रखकर धीरे धीरे उच्चारण करके उन्हें उत्तम मंत्र का उपदेश किया। इस तरह दोनों  को  मंत्र की  दीक्षा  दी।  यूं दोनों शिष्यों ने गुरु दक्षिणा के रूप में अपने आप को ही  शिव के लिए समर्पित कर दिया और  दोनों हाथ जोड़कर  जगत् के गुरु का स्तवन किया।
 हे शिव शम्भू हे परमेश्वर, नमस्कार निष्कल,  सर्वेश्वर।
 सर्वात्मा सभी के स्वामी, नमस्कार हे सकल महेश्वर।।
 प्रणव लिंग वाले हे स्वामी, प्रणव के दाता अन्तर्यामी।
 तुम से वेद मंत्र सब उपजे नमस्कार ब्रह्माण्ड के स्वामी।।
 पंच मुखी सबके दुख हरता सृष्टि स्थिति प्रलय के करता।
 तिरोभाव है कर्म तुम्हारा, भक्तजनों पर अनुग्रह करता।।
 पंच ब्रह्म स्वरूप है तेरा, सर्वात्मा ब्रह्म प्रभु मेरा।
 अनंत शक्तिओं का गुण तेरा, नमस्कार तू सद्गुरु मेरा।।
   इस तरह अपने गुरु महेश्वर की स्तुति करके ब्रह्मा और विष्णु जी ने उनके चरणों में  प्रणाम  किया। भगवान महेश्वर  ने दोनों को ज्ञान प्रदान किया, प्रणव  के जाप का  महत्व  बताया  और अन्तर्ध्यान हो गए।
                          ॐ नमः शिवाय
 
 
 

   
 
   

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

शिव पुराण (चंचुला और बिंदुग की कथा) लेख संख्या 01

भारतीय संस्कृति में, ईश्वर  की  उपासना की  अनेक  पद्धतियां रही हैं। किसी ने निराकार की, किसी ने  विष्णु जी  की, किसी ने शिव, किसी ने देवी की, किसी  ने श्री राम,  श्री कृष्ण  आदि अवतारों की उपासना की है। यहां  तक  कि  जल,  पृथ्वी,  गौ, वृक्षों आदि को भी भगवान माना गया है। भारतीय संस्कृति  में यह तो सभी मानते हैं कि सारे रूपों का श्रोत एक शक्ति ही  है जिसको कहते हैं ( परब्रह्म पमेश्वर)।  उपासक अपने संस्कारों के अनुसार किसी भी रूप में उस परम शक्ति की उपासना कर सकता  है।  उसकी  उपासना  अंततोगत्वा  उसी  एक परब्रह्म परमेश्वर की ही उपासना होती है। साधक जिस इष्ट को मानता है उसी के रूप में परब्रह्म परमेश्वर को  देखता है।  अर्थात  वह परब्रह्म परमेश्वर को उसी अपने इष्ट देव के रूप में ही देखता है और यह भी जानता है कि कण कण में उसी का वास  है।  यह भी कि उसके सिवाय  और  कुछ  भी  नहीं  है।  श्री व्यास जी ने 18 पुराणों की  रचना इस लिए ही की होगी  कि  इन महान  ग्रंथों  के अनुसार, भिन्न भिन्न  प्रकार के  साधक  अपने  अपने इष्ट  की उपासना करते  हुए  उस  परम  पुरुष  परमात्मा  तक पहुंच  सकें। फिर इससे अंतर नहीं पड़ता कि आप  किस  इष्ट  की  उपासना कर रहे हैं। क्योंकि सभी रूप एक परमशक्ति के ही हैं।  जिस रुप में  भी  साधक  पूर्ण  श्रद्धा और  विश्वास  के साथ समर्पण कर देता है, उसी रूप में उसको उस  परब्रह्म की प्राप्ति हो जाती है।
                    श्री शिवपुराण महात्म्य
   शिव का अर्थ ही कल्याणकारी है। इस लिए यह तो  स्पष्ट ही है कि शिव कल्याणकारी हैं। शिव पुराण ही नहीं चारों वेद और स्मृतियों आदि सभी ग्रंथों ने सदा शिव की महिमा गाई है। शिव को अनादि, अजन्मा, अव्यक्त, स्रष्टा,  पालक,  संहारक,  परम तत्व, स्वयंभू, मंगलमय, सर्व  सिद्धिदायक  एवं  सर्वश्रेष्ठ  कहा गया है। विष्णु जी और  ब्रह्मा जी भी महादेव जी की  उपासना करते हैं। शिवपुराण में भी भगवान शिव  को  परब्रह्म  परमेश्वर ही माना है। शिवपुराण में भगवान शिव  के स्वरूप की  महिमा और उपासना का विस्तार से वर्णन मिलता है।
   शौनक जी ने महा ज्ञानी सूत जी से प्रश्न किया कि हे सूत जी ज्ञान और वैराग्य सहित भक्ति से प्राप्त  होने  वाले  विवेक  की वृद्धि कैसे होती है? काम आदि मानसिक विकारों का निवारण कैसे किया जाता है ? कलयुगी  जीवों  को  दैवी गुणों  से  युक्त बनाने के सर्वश्रेष्ठ  उपाय क्या हैं।  कृपया  ऐसा  साधन  बताएं जिसके करने से सदाशिव की प्राप्ति हेतु चित्त शुद्ध एवं  निर्मल हो जाए।
   शौनक जी के लोक कल्याण के लिए  पूछे गए इन  प्रश्नों  से प्रसन्न  होकर सूत जी ने कहा कि सम्पूर्ण शास्त्रों के सिद्धांत  से सम्पन्न, भक्ति आदि को बढ़ाने वाला, भगवान शिव  को  संतुष्ट करने वाला, कानों के लिए रसायन, अमृत स्वरूप, दिव्य,  एक परम उत्तम ग्रंथ है जिसका नाम है शिव पुराण। यह  पूर्व  काल में स्वयं भगवान शिव द्वारा वर्णित, काल के  त्रास  का  विनाश करने वाला शास्त्र है जिसका गुरुदेव व्यास जी ने  सनत कुमार मुनियों से उपदेश पाकर कलयुग में भूतल पर उत्पन्न होने वाले जीवों के कल्याण के लिए प्रतिपादन किया  था।  अब  मैं  उस परम पवित्र ग्रंथ का वर्णन करता हूं।  तुम  ध्यान  पूर्वक  श्रवण करो।
   वत्स, शिव पुराण ऐसा उत्तम शास्त्र है जिसे भगवान शिवजी का ही वांग्मय स्वरूप समझना चाहिए। श्रद्धा और विश्वास  के साथ इसका पठन और श्रवण करके मनुष्य सब पापों से  मुक्त हो जाता है, जीवन में बड़े बड़े उत्कृष्ट भोगों  का  उपभोग  कर के अंत में शिवलोक को प्राप्त कर लेता है।  श्रीशिव पुराण  के चौबीस हजार श्लोक हैं। इसकी  सात  संहिताएं  हैं।  यह  ग्रंथ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप चारों पुर्शार्थों को देने वाला है।
               देवराज को शिवलोक की प्राप्ति
   सूत जी आगे इस ग्रंथ का महत्व बताते हुए कुछ  ऐसे  लोगों की उदाहरण देते हैं जिनको शिव पुराण सुनने से शिवलोक की प्राप्ति हुई। इनमे सब से पहली कथा देवराज की  है।  सूत  जी कहते हैं कि प्राचीन काल में एक देवराज  नामक  ब्राह्मण  था। वह अज्ञानी और दरिद्र था एवं वैदिक धर्म से  विमुख  भी  था। वह सत्कर्मों से भ्रष्ट हो चुका था। वह वैश्यावृत्ति में तत्पर, ठग, लोगों का धन छीनने वाला तथा कुमार्गगामी था।
   एक दिन दैवयोग से घूमता हुआ प्रतिष्ठानपुर (झूसी- प्रयाग) में जा पहुंचा। वह एक शिवालय में ठहर गया।  वहां  उसे  ज्वर आ गया। उसी शिवालय में शिव पुराण की कथा  हो  रही  थी। ज्वर के कारण वहीं पर पड़ा पड़ा कथा का श्रवण करता रहता था। एक मास के बाद ज्वर  से  अत्यंत  पीड़ित  होकर  उसकी मृत्यु हो गई। यमराज के दूत उसे पाशों में बांधकर यमलोक ले गए। इतने में ही शिवलोक से भगवान शिव के पार्षद  गण  आ गए। उनके गौर अंग  कर्पूर  के  समान  उज्जवल  थे।  हाथ में त्रिशूल थे और गले में रुद्राक्ष की मालाएं सुशोभित हो रही थीं। उनके सम्पूर्ण अंग भस्म से उद्भासित हो रहे थे। उनको देखकर धर्मग्य धर्मराज ने उनका  विधिपूर्वक  पूजन  किया  और  ज्ञान दृष्टि से सारा वृतांत जान लिया। शिवदूत उस ब्राह्मण  को  वहां से शिवलोक ले गए और वहां जाकर उन्होंने ब्राह्मण  को  सांब सदाशिव के हाथों में दे दिया।
           चंचुला तथा उसके पति बिंदुग का उद्धार
   सूत जी ने आगे कहा कि हे  शौनक जी  अब  मैं  तुम्हें  शिव भक्ति बढ़ाने वाली एक और कथा  कहता हूँ।  ध्यान  से  सुनो।
प्राचीनकाल में  समुद्र  के  निकटवर्ती  प्रदेश  में  एक  वाष्कल नामक गांव था। वहां रहने वाला बिंदुग नामक ब्राह्मण बड़ा ही अधम दुरात्मा और महापापी था।  उसकी चंचुला नामक सुंदर पत्नी थी जो सदा उत्तम  धर्म  के पालन में लगी रहती थी। वह पापी अपनी पत्नी को छोड़ कर वैष्यागामी हो गया था।  उधर उसकी स्त्री काम से  पीड़ित होने पर भी स्वधर्मनाश के भय से क्लेश सहकर भी  दीर्घकाल तक  धर्म से  भ्रष्ट नहीं हुई।  परंतु दुराचारी पति के  आचरण  से  प्रभावित हो  आगे चलकर  वह स्त्री भी दुराचारिणी हो गई।
     बिंदुग की मृत्यु होने पर वह नरक में जा पड़ा।  बहुत  दिनों तक यातनाएं सहने के उपरांत उसे विंद्यपर्वत पर एक  भयंकर पिशाच की  योनि प्राप्त  हुई। उसकी  पत्नी  बहुत  समय  तक अपने पुत्रों के साथ रही। एक दिन दैव योग से किसी पुण्य पर्व के आने पर वह भाई बंधुओं के साथ गोकर्ण क्षेत्र में गई।  तीर्थ के जल में स्नान किया। वहां उसने कथा भी सुनी। कथावाचक व्याभिचारिणी स्त्रियों को यमराज द्वारा दी जाने वाली सजा  के बारे में बता रहे थे। यह सुनकर वह भय के मारे  कांपने  लगी। उसने ब्राह्मण के आगे हाथ  जोड़  कर  अपने  उद्धार  के  लिए मार्ग बताने के लिए अनुनय  विनय की।  ब्राह्मण को  उस  स्त्री पर दया आ गई। ब्राह्मण ने कहा कि हे ब्राह्मण पत्नी तुम  शिव भगवान की शरण में जाओ। शिव की कृपा होने  से  सारा पाप तत्काल नष्ट हो जाता है। शिव कथा सुन कर ही  तुम्हारी  बुद्धि इस तरह पश्चाताप से युक्त एवं शुद्ध हो गई है। साथ ही  तुम्हारे मन में विषयों के प्रति वैराग्य हो गया है। केवल पश्चाताप से ही प्रायश्चित संभव है। शिव पुराण की  कथा  सुनने  से  चित्तशुद्दि होती है। मनुष्यों के शुद्ध चित्त में जगदम्बा पार्वती सहित  शिव भगवान  विराजमान रहते हैं। इस उत्तम कथा का श्रवण करना समस्त मनुष्यों के लिए कल्याण का  बीज  है।  यह भव  बंधन रूपी रोग का नाश करने वाली है। कथा को सुनकर फिर अपने हृदय में उसका मनन एवं निद्ध्यसन करना चाहिए।  चित्त  शुद्ध हो जाने पर ज्ञान और वैराग्य के साथ भक्ति  निश्चय  ही  प्रकट होती है। तत्पश्चात शिव के अनुग्रह से दिव्य  मुक्ति  प्राप्त  होती है। स्त्री के प्रार्थना करने पर ब्राह्मण ने  उसको  शिवपुराण  की सम्पूर्ण  कथा सुनाई। उसका चित्त शुद्ध हो गया। तब वह नित्य कथा का मनन और शिव भक्ति करने लगी। अब  वह  पूर्णतया विशुद्ध हो गई। उसने भगवान शिव में लगी  रहने  वाली  उत्तम बुद्धि पाकर शिव के सच्चिदानंद मय स्वरूप का बारंबार मनन एवं चिंतन आरंभ किया। तत्पश्चात समय के पूरे होने पर भक्ति ज्ञान और वैराग्य से युक्त हुई। उसने अपना शरीर  बिना  किसी कष्ट के त्याग दिया। इतने में त्रिपुर शत्रु भगवान शिव का  भेजा हुआ दिव्य विमान उसे लेने पहुंचा और  उसे  तत्काल  शिवपुरी में पहुंचा दिया। वह दिव्यांगना हो गई थी। शिव लोक पहुंचकर उसने सनातन देवता त्रिनेत्र धारी महादेव जी  के  दर्शन  किए। सभी मुख्य मुख्य देवता उनकी सेवा में खड़े थे। श्री गणेश जी, भृंगी, नंदीश्वर तथा वीरभद्र आदि उनकी सेवा में  उत्तम  भक्ति भाव से उपस्थित थे। उनकी अंग कांति करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशित हो रही थी। कंठ  में  नील  चिन्ह  शोभा  पाता  था।  उनके पांच मुख और प्रत्येक मुख में तीन तीन नेत्र थे।  मस्तक पर अर्ध चंद्राकार मुकुट शोभा देता था।  वामांग  भाग में  गौरी देवी शोभायमान थीं, जो विद्युत पुंज के समान  प्रकाशित  थीं। गौरी पति महादेव जी की कांति कपूर  के समान  गौर थी  और उनका सारा शरीर श्वेत  भस्म से  भासित  था।  शरीर  पर  श्वेत वस्त्र शोभा पा रहे थे। दर्शन करके वह  बड़े  प्रेम,  आनंद  और संतोष से युक्त हो विनीत भाव से खड़ी हो  गई।  पार्वती  जी ने उसे अपनी सखी बना लिया। तब वह अक्षय सुख का  अनुभव करने लगी।
        तुम्बुरु द्वारा शिवकथा सुनाकर बिंदुग का उद्धार
   चंचुला ने पार्वती जी से प्रार्थना की कि हे  गिरी  राज  नंदिनी आप समस्त सुखों को देने वाली और ब्रह्मा, विष्णु आदि  सभी देवताओं द्वारा सेव्य हो। आप ही संसार की सृष्टि, पालन  और संहार करने वाली हैं। तीनों गुणों का आश्रय  भी  आप  ही  हैं। आप ही पराशक्ति हैं। इस तरह स्तुति से पार्वती जी  को  प्रसन्न करके पूछा कि हे दीन वत्सले मेरे पति बिंदुग इस  समय  किस योनि में हैं ? मैं अपने पति से जिस प्रकार संयुक्त हो सकूं  वैसा ही उपाय कीजिए। उनकी मृत्यु मुझसे पहले ही हो गई थी।  ना जाने वे किस गति को प्राप्त हुए हैं।
   इस पर पार्वती जी ने कहा कि हे चंचुला तेरा पति बिंदुग  जो कि अपने कर्मों के कारण लंबे समय तक  नरक को  भोग  कर अब विंध्य पर्वत पर भयानक पिशाच योनि में रह  रहा है  और अनेकों दुःख झेल रहा है। यह सुन कर चंचुला  बहुत  दुखी  हो गई। उसे दुखी देख कर पार्वती जो  को  दया आ  गई।  उन्होंने भगवान शिव की उत्तम कीर्ति का गान करने  वाले  गंधर्व  राज तुम्बुरु को बुला कर सारी बात बताई और आदेश दिया कि वह बिंदुग को यतनपुर्वक पवित्र शिव पुराण की कथा सुनाए। कथा से उसका हृदय शुद्ध हो जाएगा और वह शीघ्र ही प्रेत योनि का परित्याग कर देगा। उसके बाद विमान पर बैठा  कर  उसे  मेरी आज्ञा से तुम शिव के समीप ले आओ।
   आज्ञा अनुसार गंधर्व राज तुम्बुरु विंध्य पर्वत  पर  गए।  वहां पर पिशाच को ब्लात पाषों से बांध कर  शिवपुराण  की  पवित्र कथा सुनाई गई। और भी बहुत सारे देवता  आदि  कथा  सुनने आए। कथा सुनने के उपरांत पिशाच का हृदय  शुद्ध  हो  गया। उसने पिशाच योनि का  परित्याग कर दिया।  विशुद्ध  हो  जाने पर उसे भी शिव लोक  की प्राप्ति  हुई।  उसे  वहां  पार्षद  बना दिया गया। दोनों पति  पत्नी  सनातन धाम में अविचल निवास पाकर सुखी हो गए।
                       ॐ नमः शिवायः