शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

शिवपुराण (नारद मोह भंग कथा) लेख संख्या 4

                       नारद मोह भंग कथा
   व्यास जी भगवान शिव की वंदना करके तथा भगवती माता एवं गणेश जो नमस्कार करने के उपरांत आगे की कथा प्रारंभ करते हैं। शौनिक आदि ऋषियों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए सूत जी कहते हैं कि भगवान शंकर जी के गुणों का वर्णन सात्विक, राजस और तामस तीनों ही प्रकृति के मनुष्यों को सदा आनंद ही प्रदान करने वाला है। हे ब्राह्मणों मैं अब आपको यथा बुद्धि शिव लीला का वर्णन करता हूँ।
   एक बार महामुनि नारद जी, जो  कि  ब्रह्मा जी के  पुत्र हैं, ने विनीतचित हो तपस्या में मन लगाया। हिमालय पर्वत  में  कोई एक गुफा थी, जो बड़ी शोभा से संपन्न दिखाई देती थी।  उसके निकट देवनदी गंगा जी निरंतर वेगपूर्वक बहती थीं।  वहां  एक महान दिव्य आश्रम था। दिव्यदर्शी नारद जी तपस्या  करने  के लिए उसी आश्रम में गए। उस गुफा को देखकर  मुनिवर  बहुत प्रसन्न हुए और सुदीर्घ काल तक वहीं तपस्या करते रहे। उनका अंत: करण शुद्ध था। चिर काल के  लिए  वो  समाधि  में  चले गए।
   उनकी ऐसी तपस्या का समाचार पाकर  देवराज  इन्द्र  कांप उठे। वो मानसिक संताप से विह्वल हो गए। इन्द्र ने  सोचा  कि नारद मुनि उनका राज्य छीन लेना चाहते हैं। यह सोचकर  इन्द्र ने उनकी समाधि भंग करने के लिए कामदेव को  भेजा।  परंतु उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली।
   हे ऋषियो, ऐसा होने में जो कारण था वो सुनो। उसी आश्रम में पहले समय में भगवान शिव ने उत्तम  तपस्या  की  थी  और कामदेव को भस्म कर डाला था। तब  रति के प्रार्थना करने पर महादेव जी ने कहा कि कुछ समय बाद कामदेव जीवत तो  हो जाएंगे परंतु इस आश्रम पर इनका कोई प्रभाव नहीं होगा। इस लिए यह कहा जा सकता है की नारद जी ने कामदेव को  शिव भगवान के कारण ही जीता था।  इसमें  कोई  संशय  नहीं  है। परंतु नारद जी भगवान शिव की माया के कारण इस बात को नहीं जान पाए और उन्हें अपनी जीत का  अभिमान  हो  गया।
   अब अपनी इस जीत की प्रसन्नता में नारद जी  सबसे पहले  भगवान रुद्र के पास पहुंचे। प्रसन्नता से मुस्कुराते हुए  भगवान रुद्र  को सारी कथा सुना दी। भगवान ने कहा कि हे नारद तुम बहुत ही ज्ञानवान हो। इस लिए मैं  तुम्हें  कहता  हूँ  कि अपनी सिद्धियों का वर्णन किसी के पूछने पर भी नहीं करना  चाहिए। इस लिए अब तुम किसी से भी इस बात की चर्चा  मत  करना। नारद जी पर तो भगवान की माया का पर्दा पड़ा हुआ था। इस लिए उन्होंने भगवान की आज्ञा  को  हितकर  नहीं  माना  और यही सब बताने अपने पिता ब्रह्मा जो के पास चले गए।
   ब्रह्मा जी ने जब नारद जी को सुना तो वो जान गए कि नारद को अभिमान हो गया है। उन्होंने  भी  नारद को  समझाया  कि इस बात की चर्चा भूल कर भी भगवान विष्णु से ना करें। परंतु जब व्यक्ति को अभिमान हो जाता है तो उससे अपनी प्रसन्नता कहां छिपाई जाती है। नारद जी ने अपने पिता जी की बात भी नहीं मानी और वहां से सीधे  भगवान विष्णु जी  के  पास  चले गए।
    भगवान विष्णु से क्या छिपा था। वो तो सब जानते  ही  थे। नारद जी उनके प्रिय  भक्त हैं और भक्त के मन में जब भगवान अहंकार का अंकुर फूटता हुआ देखते हैं तब वे  शीघ्र ही अपने प्रिय भक्त के अभिमान को  हर लेते हैं।  नारद  के वहां पहुंचते ही विष्णु जी ने नारद जी  का बहुत सम्मान किया। उन्हें  बैठने  के लिए अपना ही आसान दे दिया और साथ ही  बहुत  प्रशंसा भी कर दी। बस फिर क्या था नारद जी ने अभिमान पूर्वक वह सारी की सारी कथा कह सुनाई। विष्णु जी ने कहा कि हे नारद जी आपने तो बहुत ही उत्तम कार्य किया  है।  नारद  जी  विदा लेकर चले गए।
   जब नारद जी जा रहे थे, उनके रास्ते में भगवान  विष्णु और भगवान शिव की प्रेरणा से एक माया की नगरी का निर्माण  हो गया। वह नगरी अलकापुरी से भी सुंदर जान पड़ती  थी।  वहां के राजा का नाम सीलनिधि था। वहां  सीलनिधि की कन्या का स्वयंवर भी होने वाला था। इस लिए नगर को और भी  अधिक सजाया गया था। नारद जी यह सब  देखकर  मोहित  हो  गए। जब राजा को पता चला कि नारद जी उसके नगर  में  आए  हैं तो उसने उनका बहुत आदर सत्कार किया। उनके चरण धोकर आसन दिया और बताया कि हे मूनिवर मेरी एक कन्या  भी  है जिसका नाम श्रीमती है उसका स्वयंवर होने वाला  है।  हे मुने! आप मेरी इस कन्या के भविष्य एवं भावी  वर  के  बारे  बताने की कृपा करें। जैसे ही नारद जी ने कन्या का हाथ देखा, उनके मन में काम भावना ने घर कर लिया।  नारद  जी  ने  राजा  को बताया कि यह कन्या बहुत ही  भागयशाली है।  इसका  वर तो भगवान के ही जैसा होगा। यह कह कर नारद  जी ने  विदा  ले ली।
   बाहर आकर सोचने लगे कि मैं कौन सा उपाय करूं जिससे  वह कन्या मेरे गले में वरमाला डाल दे और मेरी उससे शादी हो जाए। फिर वे सोचने लागे कि यदि  भगवान  विष्णु  मुझे  कुछ समय के लिए अपना रूप प्रदान कर दें तो  आवश्य  ही  कन्या मेरी सुंदरता को देख कर मेरे गले में वरमाला डाल  देगी।  ऐसा सोचकर उन्होंने  भगवान  विष्णु  जी  का  स्मरण  किया।  जब भगवान प्रकट हुए तो नारद जी ने  उन्हें  सारी  बात  बता  कर कहा कि वो  उसे  अपना  मोहिनी  रूप  प्रदान  करें।  भगवान विष्णु जी ने कहा कि है नारद मैं तुम्हारा हित साधन उसी तरह करूंगा जैसे वैद्य अत्यंत पीड़ित  रोगी  का  करता  है;  क्योंकि तुम मुझे बहुत प्रिय हो। इतना कह कर अपनी माया से  इन्होंने नारद को शरीर तो अपने जैसा ही प्रदान कर दिया परंतु  ऊपर चेहरा वानर का लगा दिया।
   जब नारद जी स्वयंवर सभा में पहुंचे  तो  वहां  भगवान शिव के दो गण भी आए हुए थे। उन्होंने नारद जी का बहुत उपहास किया। जब स्वयंवर हुआ तो कन्या ने वरमाला भगवान  विष्णु जी के गले में डाल दी। जब स्वयंवर हो गया तो दोनों पार्षदों ने नारद जी को दर्पण में उनका वानर रूप  दिखलाया और  कहा हे मुने! तुम व्यर्थ ही काम से मोहित हो रहे हो  और  सौंदर्य  के बल से राजकुमारी को पाना चाहते हो। अपना वानर के समान घृणित मुंह तो देख लो। नारद जी को बड़ा विस्मय  और  क्रोध हुआ। वे शिव की माया से मोहित थे। दर्पण में अपने  मुख  को देखकर क्रोधित हो उठे। दोनों शिव गणों को शाप देते हुए बोले -- अरे! तुम दोनों ने मुझ ब्राह्मण का  उपहास  किया  है।  अतः तुम ब्राह्मण के वीर्य से उत्पन राक्षस हो जाओ।
   नारद जी उसी समय क्रोध की  अग्नि  में  जलते  हुए  विष्णु लोक को गए। उनका ज्ञान नष्ट हो गया था। इस लिए वे दुर्वचन पूर्ण व्यंग्य सुनान लगे।
   नारद जी ने कहा -- हरे! तुम बड़े दुष्ट, कपटी और  विश्व  को मोह में डालने वाले हो। दूसरों का उत्कर्ष तो  तुमसे  सहा  नहीं जाता। तुमने स्त्री के लिए मुझे व्याकुल किया है। तुम मनुष्य हो जाओ और स्त्री के वियोग का दुख भाेगो।  तुमने  जिन  वानरों के समान मेरा मुंह बनाया था, वे ही उस समय तुम्हारे सहायक हों। तुम्हें स्त्री के वियोग का दुख प्राप्त  हो।  अज्ञान  से  मोहित मनुष्य के समान तुम्हारी स्थिति हो। श्री हरि ने  शंभु  की  माया की प्रशंसा करते हुए उस शाप को स्वीकार कर लिया।
   तभी महालीला करने वाले शंभु ने अपनी उस  विश्व  मोहिनी माया को, जिसके कारण ज्ञानी नारद मुनि भी  मोहित  हो  गए थे, खींच लिया। उस माया के तिरोहित होते ही नारद जी पहले जैसे ही शुद्ध बुद्धि से युक्त हो गए। नारद जी भगवान विष्णु के चरणों में गिर पड़े और  बोले, हे नाथ माया से मोहित  होने  के कारण मेरी बुद्धि बिगड़ गई थी।  इस  लिए  मैंने  आपके  लिए बहुत दूर्वचन कहे हैं। आपको शाप  तक  दे  डाला  है। अब  मैं निश्चय ही नरक में पडूंगा। मैं आपका दास हूं प्रभु। अब मैं क्या उपाय और क्या प्रायश्चित करूं, जिससे मेरा पाप समूह नष्ट हो जाए। तब विष्णु जी ने कहा, तात खेद ना करो। तुम  मेरे  श्रेष्ठ भक्त हो। सुनो, तुमने मद में आकर भगवान शिव की बात नहीं मानी थी। तुम अपने मन में यह दृढ़ निश्चय कर लो कि यह सब कुछ भगवान शिव की इच्छा से ही हुआ है। भगवान शिव तीनों गुणों से परे हैं। वे सच्चिदानंद निर्गुण और  निर्विकार  हैं। वे  ही अपनी माया को लेकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन  तीन  रूपों में प्रकट होते हैं। निर्गुण अवस्था में उन्हीं का नाम  शिव  है।  वे ही परमात्मा, महेश्वर, परब्रह्म, अविनाशी, अनंत  और  महादेव आदि नामों से कहे जाते हैं।
   तुम अब भगवान शंकर के सुयश का  गान  करो, सदा  शिव के शतनाम स्तोत्र का पाठ करो। उन्हीं की उपासना और भजन करो। उन्हीं के यश को सुनो और गाओ। प्रतिदिन उन  की  ही  पूजा अर्चा करते रहो। भगवान शिव के  नाम  रूपी  नौका  का जो आश्रय लेते हैं, वे संसार सागर से पार हो जाते हैं। अब तुम जाओ और भगवान शिव का ध्यान करते हुए पहले उनके तीर्थ स्थानों के दर्शन करो और तत्पश्चात ब्रह्मलोक में जाकर  अपने पिता ब्रह्मा जी से भगवान शिव की भक्ति का ज्ञान  प्राप्त  करो और शिव भक्त होकर मोक्ष के भागी बनो।
   भगवान श्री हरि के अंतर्धान हो जाने पर मुनिश्रेष्ठ  नारद  जी शिवलिंगों का भक्ति पूर्वक दर्शन करते हुए  पृथ्वी  पर  विचरने लगे। उनके चित्त को  शुद्ध  हुआ  जानकर  वे  दोनों  शिव गण जिनको नारद जी द्वारा शाप मिला था, नारद जी के पास  आए और क्षमा याचना करने लगे। नारद जी  ने  दया  करके  उनको कहा कि सुनिए, आप  दोनों भगवान शिव के गण हैं और बहुत सम्माननीय हैं। मेरी बुद्धि भृष्ट हो गई थी।  अब  तुम  दोनों  मेरे द्वारा दिए शाप से उद्धार की बात सुनिए। तुम दोनों ही मुनीवर  विश्रवा   के वीर्य  से  जन्म  ग्रहण  करके  सम्पूर्ण  दिशाओं  में प्रसिद्ध ( कुंभकर्ण और रावण) के रूप में रक्षाश राज  का  पद प्राप्त करेंगे और शिव के ही दूसरे रूप भगवान विष्णु के  हाथों मृत्यु पाकर फिर अपने पद पर प्रतिष्ठित हो जाएंगे।
    तब नारद जी ने काशी पुरि समेत सभी शिव तीर्थ स्थानों के दर्शन किए और ब्रह्म लोक की ओर चल दिए।
                           ॐ नमः शिवाय
 
   

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