विद्येश्वर संहिता
शिवपुराण का परिचय
पूर्व काल में भगवान शिव ने एक ही पुराण ग्रंथ ग्रथित किया था जिसकी श्लोक संख्या सौ करोड़ थी। जिसमें शिव पुराण के एक लाख श्लोक हैं। इस शिव पुराण के बारह भेद या खंड हैं। सृष्टि के आदि में निर्मित हुआ वह पुराण - साहित्य अत्यंत विस्तृत था।
फिर द्वापर आदि युगों में द्वैपायन व्यास आदि ऋषियों ने जब पुराण का अठारह भागों में विभाजन कर दिया, उस समय सम्पूर्ण पुराणों का संक्षिप्त स्वरूप केवल चार लाख श्लोकों का रह गया। उस समय उन्होंने शिवपुराण का चौबीस हजार श्लोकों में प्रतिपादन किया। यही इसके श्लोकों की संख्या है। यह वेद तुल्य पुराण सात संहिताओं में बंटा हुआ है।
1. विद्येश्वर संहिता 2. रुद्र संहिता 3. शत रुद्र संहिता 4. कोटि रुद्र संहिता 5. उमा संहिता 6. कैलास संहिता 7. वायवीय संहिता।
शिव पुराण वेद के तुल्य प्रामाणिक तथा सबसे उत्कृष्ट गति प्रदान करने वाला, जीव समुदाय के लिए उपकारक, त्रिविध ताप का नाश करने वाला और विज्ञानमय है। यह धर्म, अर्थ काम और मोक्ष प्रदान करने वाला है। यह पुराण ईर्ष्या रहित अंत: करण वाले विद्वानों के लिए जानने योग्य है। जो बड़े ही आदर से इसे पढ़ता और सुनता है, वह भगवान शिव का प्रिय होकर परम गति को प्राप्त कर लेता है।
साध्य - साधन आदि का विचार
वेदांतसार सर्वस्वरूप अद्भुत शिवपुराण की कथा आरंभ करते हुए सूत जी कहते हैं कि शिव पुराण में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य - इन तीनों का प्रीति पूर्वक गान किया गया है। वर्तमान कल्प के आरंभ में छ: कुलों के महा ऋषियों को सम्पूर्ण तत्वों से परे परात्पर पुराण पुरुष के बारे में बताते हुए ब्रह्मा जी ने कहा था कि जहां से, मन सहित वाणी, उन्हें ना पाकर लौट आती है तथा जिनसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्र आदि से युक्त यह सम्पूर्ण जगत समस्त भूतों एवं इन्द्रियों के साथ पहले प्रकट हुए हैं, वे ही यह देव, महादेव सर्वग्य एवं सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं। ये ही सबसे उत्कृष्ट हैं। इनका भक्ति से ही साक्षात्कार होता है। दूसरे किसी उपाय से कहीं उनका दर्शन नहीं होता। रुद्र, हरि, हर तथा अन्य देवेश्वर सदा उत्तम भक्ति भाव से उनका दर्शन करना चाहते हैं। भगवान शिव में भक्ति होने से मनुष्य संसार बंधन से मुक्त हो जाता है। देवता के कृपा प्रसाद से उनमें भक्ति होती है और भक्ति से देवता का कृपा प्रसाद प्राप्त होता है। यह ठीक उसी तरह है जैसे कि अंकुर से बीज और बीज से अंकुर पैदा होता है। शिव पद की प्राप्ति ही साध्य है और उनकी सेवा ही साधन है। जो इच्छा रहित है वही साधक है। वेदोक्त कर्म का अनुष्ठान करके उसके महान फल को भगवान शिव के चरणों में अर्पण कर देना ही परमेश्वर पद की प्राप्ति है। वही मुक्ति भी ही।
भक्ति के साधन अनेक प्रकार के हैं। कान से भगवान के नाम - गुण और लीलाओं का श्रवण, वाणी द्वारा उनका कीर्तन तथा मन के द्वारा उनका मनन - इन तीनों को महान साधन कहा गया है। इन तीन साधनों को ही मुक्ति का उपाय बताया गया है। ऋषियों ने सूत जी से पूछा कि हे सूत जी जो मनुष्य श्रवण आदि तीनों साधनों को करने में असमर्थ हो वह मनुष्य किस उपाय का अवलंबन करके मुक्त हो सकता है?
भगवान शिव के लिंग एवं साकार विग्रह की
पूजा का महत्व
सूत जी कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति जो उपरोक्त साधन करने में असमर्थ है वह भगवान शंकर के लिंग एवं मूर्ति की स्थापना करके नित्य ही उसकी पूजा करे। सूत जी आगे कहते हैं कि केवल भगवान शिव की ही पूजा लिंग और मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है क्योंकि एकमात्र भगवान शिव ही ब्रह्म रूप होने के कारण निष्कल (निराकार) कहे गए हैं। रूपवान होने के कारण उन्हें सकल (साकार) भी कहा गया है। शिवलिंग उनके निष्कल स्वरूप का प्रतीक है तथा मूर्ति रूप उनके सकल रूप का प्रतीक है।
ब्रह्मा जी और विष्णु जी को लिंगपूजन का महत्व बताना
सूत जी कहते हैं कि एक बार ब्रह्मा और विष्णु जी द्वारा अंत रहित भीषण अग्निस्तम्भ (ज्योतिर्मय स्तंभ) की गहराई और ऊंचाई की थाह लेने की चेष्टा की गई। जब वे ऐसा नहीं कर पाए तो वहीं पर महादेव जी प्रकट हुए। जब विनम्र भाव से दोनों ने शंकर जी की पूजा की तो भगवान शिव ने मुस्करा कर कहा, -- आज का दिन बड़ा महान दिन है। इसमें तुम्हारे द्वारा जो आज मेरी पूजा हुई है, इससे मैं तुम लोगों पर बहुत प्रसन्न हूँ। इसी कारण यह दिन बहुत पवित्र और महान - से - महान होगा। आज की यह तिथि शिवरात्रि के नाम से विख्यात होकर मेरे लिए परम प्रिय होगी। शिवरात्रि में जो शिवलिंग की पूजा करेगा वह पुरुष जगत की सृष्टि और पालन आदि कार्य भी कर सकता है। जैसे पूर्ण चंद्रमा का उदय समुद्र की वृध्दि का अवसर है, उसी प्रकार यह शिवरात्रि तिथि मेरे धर्म की वृध्दि का समय है। पहले मैं जब ज्योतिर्मय स्तंभरूप से प्रकट हुआ था, वह समय मार्गशीर्ष मास में आर्द्रा नक्षत्र से युक्त पूर्णमासी या प्रतिपदा है। जो पुरुष मार्गशीर्ष मास में आर्द्रा नक्षत्र होने पर पार्वती सहित मेरा दर्शन करता है अथवा मेरी मूर्ति या लिंग की ही झांकी करता है, वह मेरे लिए कार्तिकेय से भी अधिक प्रिय है। उस दिन को मेरे दर्शन मात्र से पूरा फल प्राप्त होता है। यदि दर्शन के साथ साथ मेरा पूजन भी किया जाता है तो इतना अधिक फल प्राप्त होता है कि उसका वाणी द्वारा वर्णन नहीं हो सकता।
वहां पर मैं लिंगरूप से प्रकट होकर बहुत बड़ा हो गया था। अत: उस लिंग के कारण ही यह भूतल लिंगस्थान के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जगत के लोग इसका दर्शन और पूजन कर सकें इसके लिए यह अनादि और अनंत ज्योतिस्तंभ अत्यंत छोटा हो जाएगा। इसके यहां प्रकट होने के कारण इस स्थान का नाम अरुणाचल प्रसिद्ध होगा।
ब्रहमभाव मेरा निराकार और महेश्वर्भाव साकार रूप है। मैं ही सबका आत्मा हूँ। इसके इलावा जगत सबंधी अनुग्रह आदि जो पांच कृत्य हैं वे सदा मेरे ही हैं क्योंकि मैं ही सबका ईश्वर हूँ। लिंग की स्थापना मूर्ति की स्थापना से श्रेष्ठ है। शिवलिंग के अभाव में सब ओर से मूर्तियुक्त होने पर भी वह स्थान क्षेत्र नहीं कहलाता।
पांच कृत्यों का प्रतिपादन
भगवान शिव बोले कि सृष्टि रचना, सृष्टि पालन, सृष्टि संहार, तिरोभाव और अनुग्रह - यही मेरे जगत संबंधी पांच कार्य हैं जो नित्य सिद्ध हैं। संसार की रचना का जो आरंभ है उसी को सर्ग या सृष्टि कहते हैं। मुझसे पालित होकर उसका सुस्थिर रूप से रहना ही उसकी स्थिति है। उसका विनाश ही संहार है। प्राणों का उत्क्रमण (उन्नत होना) ही तिरोभाव कहलाता है। तथा इन सब से छुटकारा (मोक्ष) मिल जाना ही अनुग्रह कहलाता है। भक्तजन इन पांच कृत्यों को पांचों भूतों में देखते हैं। सृष्टि भूतल में, स्थिति जल में, संहार अग्नि में, तिरोभाव वायु में और अनुग्रह आकाश में स्थित है। पृथ्वी से सबकी सृष्टि होती है। जल से सबकी वृद्धि और जीवन रक्षा होती है। आग सभी को जला देती है। वायु सबको एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है। और आकाश सबको अनुग्रहित करता है। इन पांच कृत्यों का भार वहन करने के लिए ही मेरे पांच मुख हैं। हे पुत्रो तुम दोनों ने तपस्या करके प्रसन्न हुए मुझ परमेश्वर से सृष्टि और स्थिति नामक दो कृत्य प्राप्त किए हैं। इसी प्रकार मेरी विभूति स्वरूप रुद्र और महेश्वर ने दो अन्य उत्तम कृत्य संहार और तिरोभाव मुझसे प्राप्त किए हैं। परंतु अनुग्रह नामक कृत्य दूसरा कोई नहीं पा सकता। रुद्र और महेश्वर अपने कार्य को भूले नहीं हैं। इसलिए मैंने उनके लिए अपनी समानता प्रदान की है। वे रूप, वेष, कृत्य, वाहन, आसन और आयुध आदि में मेरे ही समान हैं।
प्रणव एवं पंचाक्षर मंत्र की महत्ता
भगवान शिव आगे कहते हैं कि सबसे पहले मेरे ही मुख से ओंकार (ॐ) प्रकट हुआ, जो मेरे स्वरूप का बोध कराने वाला है। ओंकार वाचक है और मैं वाच्य हूँ। यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है। मेरे ही पांचों मुखों से बारी बारी अकार, उकार, मकार, बिंदु और नाद का प्राकट्य हुआ। इन सभी अवयवों से एकीभूत हो कर वह प्रणव ( ॐ ) नामक एक अक्षर हो गया।
यह मंत्र शिव और शक्ति दोनों का बोधक है। इसी प्रणव से पंचाक्षर मंत्र की उत्पत्ति हुई है, जो मेरे सकल रूप का बोधक है। पंचाक्षर मंत्र है - ॐ नमः शिवाय। इसी मंत्र से मात्रिका वर्ण का, उसी से शिरोमंत्र सहित त्रिपदा गायत्री का और गायत्री से आगे सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए हैं। वेदों से ही भिन्न भिन्न कार्यों को सिद्ध करने के लिए करोड़ों मंत्र निकले हैं। परंतु इन प्रणव एवं पंचाक्षर से सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है।
इस तरह से भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु जी के मस्तक पर करकमल रखकर धीरे धीरे उच्चारण करके उन्हें उत्तम मंत्र का उपदेश किया। इस तरह दोनों को मंत्र की दीक्षा दी। यूं दोनों शिष्यों ने गुरु दक्षिणा के रूप में अपने आप को ही शिव के लिए समर्पित कर दिया और दोनों हाथ जोड़कर जगत् के गुरु का स्तवन किया।
हे शिव शम्भू हे परमेश्वर, नमस्कार निष्कल, सर्वेश्वर।
सर्वात्मा सभी के स्वामी, नमस्कार हे सकल महेश्वर।।
प्रणव लिंग वाले हे स्वामी, प्रणव के दाता अन्तर्यामी।
तुम से वेद मंत्र सब उपजे नमस्कार ब्रह्माण्ड के स्वामी।।
पंच मुखी सबके दुख हरता सृष्टि स्थिति प्रलय के करता।
तिरोभाव है कर्म तुम्हारा, भक्तजनों पर अनुग्रह करता।।
पंच ब्रह्म स्वरूप है तेरा, सर्वात्मा ब्रह्म प्रभु मेरा।
अनंत शक्तिओं का गुण तेरा, नमस्कार तू सद्गुरु मेरा।।
इस तरह अपने गुरु महेश्वर की स्तुति करके ब्रह्मा और विष्णु जी ने उनके चरणों में प्रणाम किया। भगवान महेश्वर ने दोनों को ज्ञान प्रदान किया, प्रणव के जाप का महत्व बताया और अन्तर्ध्यान हो गए।
ॐ नमः शिवाय
शिवपुराण का परिचय
पूर्व काल में भगवान शिव ने एक ही पुराण ग्रंथ ग्रथित किया था जिसकी श्लोक संख्या सौ करोड़ थी। जिसमें शिव पुराण के एक लाख श्लोक हैं। इस शिव पुराण के बारह भेद या खंड हैं। सृष्टि के आदि में निर्मित हुआ वह पुराण - साहित्य अत्यंत विस्तृत था।
फिर द्वापर आदि युगों में द्वैपायन व्यास आदि ऋषियों ने जब पुराण का अठारह भागों में विभाजन कर दिया, उस समय सम्पूर्ण पुराणों का संक्षिप्त स्वरूप केवल चार लाख श्लोकों का रह गया। उस समय उन्होंने शिवपुराण का चौबीस हजार श्लोकों में प्रतिपादन किया। यही इसके श्लोकों की संख्या है। यह वेद तुल्य पुराण सात संहिताओं में बंटा हुआ है।
1. विद्येश्वर संहिता 2. रुद्र संहिता 3. शत रुद्र संहिता 4. कोटि रुद्र संहिता 5. उमा संहिता 6. कैलास संहिता 7. वायवीय संहिता।
शिव पुराण वेद के तुल्य प्रामाणिक तथा सबसे उत्कृष्ट गति प्रदान करने वाला, जीव समुदाय के लिए उपकारक, त्रिविध ताप का नाश करने वाला और विज्ञानमय है। यह धर्म, अर्थ काम और मोक्ष प्रदान करने वाला है। यह पुराण ईर्ष्या रहित अंत: करण वाले विद्वानों के लिए जानने योग्य है। जो बड़े ही आदर से इसे पढ़ता और सुनता है, वह भगवान शिव का प्रिय होकर परम गति को प्राप्त कर लेता है।
साध्य - साधन आदि का विचार
वेदांतसार सर्वस्वरूप अद्भुत शिवपुराण की कथा आरंभ करते हुए सूत जी कहते हैं कि शिव पुराण में भक्ति, ज्ञान और वैराग्य - इन तीनों का प्रीति पूर्वक गान किया गया है। वर्तमान कल्प के आरंभ में छ: कुलों के महा ऋषियों को सम्पूर्ण तत्वों से परे परात्पर पुराण पुरुष के बारे में बताते हुए ब्रह्मा जी ने कहा था कि जहां से, मन सहित वाणी, उन्हें ना पाकर लौट आती है तथा जिनसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और इन्द्र आदि से युक्त यह सम्पूर्ण जगत समस्त भूतों एवं इन्द्रियों के साथ पहले प्रकट हुए हैं, वे ही यह देव, महादेव सर्वग्य एवं सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं। ये ही सबसे उत्कृष्ट हैं। इनका भक्ति से ही साक्षात्कार होता है। दूसरे किसी उपाय से कहीं उनका दर्शन नहीं होता। रुद्र, हरि, हर तथा अन्य देवेश्वर सदा उत्तम भक्ति भाव से उनका दर्शन करना चाहते हैं। भगवान शिव में भक्ति होने से मनुष्य संसार बंधन से मुक्त हो जाता है। देवता के कृपा प्रसाद से उनमें भक्ति होती है और भक्ति से देवता का कृपा प्रसाद प्राप्त होता है। यह ठीक उसी तरह है जैसे कि अंकुर से बीज और बीज से अंकुर पैदा होता है। शिव पद की प्राप्ति ही साध्य है और उनकी सेवा ही साधन है। जो इच्छा रहित है वही साधक है। वेदोक्त कर्म का अनुष्ठान करके उसके महान फल को भगवान शिव के चरणों में अर्पण कर देना ही परमेश्वर पद की प्राप्ति है। वही मुक्ति भी ही।
भक्ति के साधन अनेक प्रकार के हैं। कान से भगवान के नाम - गुण और लीलाओं का श्रवण, वाणी द्वारा उनका कीर्तन तथा मन के द्वारा उनका मनन - इन तीनों को महान साधन कहा गया है। इन तीन साधनों को ही मुक्ति का उपाय बताया गया है। ऋषियों ने सूत जी से पूछा कि हे सूत जी जो मनुष्य श्रवण आदि तीनों साधनों को करने में असमर्थ हो वह मनुष्य किस उपाय का अवलंबन करके मुक्त हो सकता है?
भगवान शिव के लिंग एवं साकार विग्रह की
पूजा का महत्व
सूत जी कहते हैं कि ऐसा व्यक्ति जो उपरोक्त साधन करने में असमर्थ है वह भगवान शंकर के लिंग एवं मूर्ति की स्थापना करके नित्य ही उसकी पूजा करे। सूत जी आगे कहते हैं कि केवल भगवान शिव की ही पूजा लिंग और मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है क्योंकि एकमात्र भगवान शिव ही ब्रह्म रूप होने के कारण निष्कल (निराकार) कहे गए हैं। रूपवान होने के कारण उन्हें सकल (साकार) भी कहा गया है। शिवलिंग उनके निष्कल स्वरूप का प्रतीक है तथा मूर्ति रूप उनके सकल रूप का प्रतीक है।
ब्रह्मा जी और विष्णु जी को लिंगपूजन का महत्व बताना
सूत जी कहते हैं कि एक बार ब्रह्मा और विष्णु जी द्वारा अंत रहित भीषण अग्निस्तम्भ (ज्योतिर्मय स्तंभ) की गहराई और ऊंचाई की थाह लेने की चेष्टा की गई। जब वे ऐसा नहीं कर पाए तो वहीं पर महादेव जी प्रकट हुए। जब विनम्र भाव से दोनों ने शंकर जी की पूजा की तो भगवान शिव ने मुस्करा कर कहा, -- आज का दिन बड़ा महान दिन है। इसमें तुम्हारे द्वारा जो आज मेरी पूजा हुई है, इससे मैं तुम लोगों पर बहुत प्रसन्न हूँ। इसी कारण यह दिन बहुत पवित्र और महान - से - महान होगा। आज की यह तिथि शिवरात्रि के नाम से विख्यात होकर मेरे लिए परम प्रिय होगी। शिवरात्रि में जो शिवलिंग की पूजा करेगा वह पुरुष जगत की सृष्टि और पालन आदि कार्य भी कर सकता है। जैसे पूर्ण चंद्रमा का उदय समुद्र की वृध्दि का अवसर है, उसी प्रकार यह शिवरात्रि तिथि मेरे धर्म की वृध्दि का समय है। पहले मैं जब ज्योतिर्मय स्तंभरूप से प्रकट हुआ था, वह समय मार्गशीर्ष मास में आर्द्रा नक्षत्र से युक्त पूर्णमासी या प्रतिपदा है। जो पुरुष मार्गशीर्ष मास में आर्द्रा नक्षत्र होने पर पार्वती सहित मेरा दर्शन करता है अथवा मेरी मूर्ति या लिंग की ही झांकी करता है, वह मेरे लिए कार्तिकेय से भी अधिक प्रिय है। उस दिन को मेरे दर्शन मात्र से पूरा फल प्राप्त होता है। यदि दर्शन के साथ साथ मेरा पूजन भी किया जाता है तो इतना अधिक फल प्राप्त होता है कि उसका वाणी द्वारा वर्णन नहीं हो सकता।
वहां पर मैं लिंगरूप से प्रकट होकर बहुत बड़ा हो गया था। अत: उस लिंग के कारण ही यह भूतल लिंगस्थान के नाम से प्रसिद्ध हुआ। जगत के लोग इसका दर्शन और पूजन कर सकें इसके लिए यह अनादि और अनंत ज्योतिस्तंभ अत्यंत छोटा हो जाएगा। इसके यहां प्रकट होने के कारण इस स्थान का नाम अरुणाचल प्रसिद्ध होगा।
ब्रहमभाव मेरा निराकार और महेश्वर्भाव साकार रूप है। मैं ही सबका आत्मा हूँ। इसके इलावा जगत सबंधी अनुग्रह आदि जो पांच कृत्य हैं वे सदा मेरे ही हैं क्योंकि मैं ही सबका ईश्वर हूँ। लिंग की स्थापना मूर्ति की स्थापना से श्रेष्ठ है। शिवलिंग के अभाव में सब ओर से मूर्तियुक्त होने पर भी वह स्थान क्षेत्र नहीं कहलाता।
पांच कृत्यों का प्रतिपादन
भगवान शिव बोले कि सृष्टि रचना, सृष्टि पालन, सृष्टि संहार, तिरोभाव और अनुग्रह - यही मेरे जगत संबंधी पांच कार्य हैं जो नित्य सिद्ध हैं। संसार की रचना का जो आरंभ है उसी को सर्ग या सृष्टि कहते हैं। मुझसे पालित होकर उसका सुस्थिर रूप से रहना ही उसकी स्थिति है। उसका विनाश ही संहार है। प्राणों का उत्क्रमण (उन्नत होना) ही तिरोभाव कहलाता है। तथा इन सब से छुटकारा (मोक्ष) मिल जाना ही अनुग्रह कहलाता है। भक्तजन इन पांच कृत्यों को पांचों भूतों में देखते हैं। सृष्टि भूतल में, स्थिति जल में, संहार अग्नि में, तिरोभाव वायु में और अनुग्रह आकाश में स्थित है। पृथ्वी से सबकी सृष्टि होती है। जल से सबकी वृद्धि और जीवन रक्षा होती है। आग सभी को जला देती है। वायु सबको एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है। और आकाश सबको अनुग्रहित करता है। इन पांच कृत्यों का भार वहन करने के लिए ही मेरे पांच मुख हैं। हे पुत्रो तुम दोनों ने तपस्या करके प्रसन्न हुए मुझ परमेश्वर से सृष्टि और स्थिति नामक दो कृत्य प्राप्त किए हैं। इसी प्रकार मेरी विभूति स्वरूप रुद्र और महेश्वर ने दो अन्य उत्तम कृत्य संहार और तिरोभाव मुझसे प्राप्त किए हैं। परंतु अनुग्रह नामक कृत्य दूसरा कोई नहीं पा सकता। रुद्र और महेश्वर अपने कार्य को भूले नहीं हैं। इसलिए मैंने उनके लिए अपनी समानता प्रदान की है। वे रूप, वेष, कृत्य, वाहन, आसन और आयुध आदि में मेरे ही समान हैं।
प्रणव एवं पंचाक्षर मंत्र की महत्ता
भगवान शिव आगे कहते हैं कि सबसे पहले मेरे ही मुख से ओंकार (ॐ) प्रकट हुआ, जो मेरे स्वरूप का बोध कराने वाला है। ओंकार वाचक है और मैं वाच्य हूँ। यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है। मेरे ही पांचों मुखों से बारी बारी अकार, उकार, मकार, बिंदु और नाद का प्राकट्य हुआ। इन सभी अवयवों से एकीभूत हो कर वह प्रणव ( ॐ ) नामक एक अक्षर हो गया।
यह मंत्र शिव और शक्ति दोनों का बोधक है। इसी प्रणव से पंचाक्षर मंत्र की उत्पत्ति हुई है, जो मेरे सकल रूप का बोधक है। पंचाक्षर मंत्र है - ॐ नमः शिवाय। इसी मंत्र से मात्रिका वर्ण का, उसी से शिरोमंत्र सहित त्रिपदा गायत्री का और गायत्री से आगे सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए हैं। वेदों से ही भिन्न भिन्न कार्यों को सिद्ध करने के लिए करोड़ों मंत्र निकले हैं। परंतु इन प्रणव एवं पंचाक्षर से सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है।
इस तरह से भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु जी के मस्तक पर करकमल रखकर धीरे धीरे उच्चारण करके उन्हें उत्तम मंत्र का उपदेश किया। इस तरह दोनों को मंत्र की दीक्षा दी। यूं दोनों शिष्यों ने गुरु दक्षिणा के रूप में अपने आप को ही शिव के लिए समर्पित कर दिया और दोनों हाथ जोड़कर जगत् के गुरु का स्तवन किया।
हे शिव शम्भू हे परमेश्वर, नमस्कार निष्कल, सर्वेश्वर।
सर्वात्मा सभी के स्वामी, नमस्कार हे सकल महेश्वर।।
प्रणव लिंग वाले हे स्वामी, प्रणव के दाता अन्तर्यामी।
तुम से वेद मंत्र सब उपजे नमस्कार ब्रह्माण्ड के स्वामी।।
पंच मुखी सबके दुख हरता सृष्टि स्थिति प्रलय के करता।
तिरोभाव है कर्म तुम्हारा, भक्तजनों पर अनुग्रह करता।।
पंच ब्रह्म स्वरूप है तेरा, सर्वात्मा ब्रह्म प्रभु मेरा।
अनंत शक्तिओं का गुण तेरा, नमस्कार तू सद्गुरु मेरा।।
इस तरह अपने गुरु महेश्वर की स्तुति करके ब्रह्मा और विष्णु जी ने उनके चरणों में प्रणाम किया। भगवान महेश्वर ने दोनों को ज्ञान प्रदान किया, प्रणव के जाप का महत्व बताया और अन्तर्ध्यान हो गए।
ॐ नमः शिवाय
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