शिवलिंग की स्थापना
सूत जी कहते हैं कि अनुकूल एवं शुभ समय में किसी पवित्र तीरथ में, नदी आदि के तट पर अपनी रुचि के अनुसार ऐसे स्थान पर शिवलिंग की स्थापना करनी चाहिए जहां नित्य प्रति पूजन हो सके।
पार्थिव द्रव्य से, जलमय द्रव्य से अथवा तैजस पदार्थ से अपनी रुचि के अनुसार कल्पोक्त लक्षणों से युक्त शिवलिंग का निर्माण करके इसकी पूजा करने से पूरा पूरा फल प्राप्त होता है।
यदि चल प्रतिष्ठा करनी हो तो इसके लिए छोटा सा शिवलिंग अथवा विग्रह श्रेष्ठ माना जाता है। और यदि अचल प्रतिष्ठा करनी हो तो स्थूल शिवलिंग अथवा विग्रह अच्छा माना गया है।
शिवलिंग का पीठ गोल, चौकोर, त्रिकोण अथवा खाट के पाए की भांति ऊपर नीचे मोटा और बीच में पतला होना चाहिए।
जिस द्रव्य ( मिट्टी, लोहे, पत्थर आदि ) से शिवलिंग का निर्माण हो, उसी द्रव्य से ही उसका पीठ भी बनाना चाहिए।
परंतु बाण लिंग के लिए यह नियम नहीं है।
लिंग की लंबाई यजमान की 12 अंगुल से और चर लिंग की लंबाई यजमान की एक अंगुल से कम नहीं होनी चाहिए। परंतु अधिक होने में दोष नहीं है।
देवालय देवगणों की मूर्तियों से अलंकृत हो। उसका गर्भग्रह बहुत ही सुंदर, सुदृढ और दर्पण के समान स्वच्छ होना चाहिए। उसे नौ प्रकार के रत्नों से विभूषित किया गया हो। उसमें पूर्व और पश्चिम दिशा में दो द्वार हों।
जहां स्थापना करनी हो उस स्थान के गर्त में नीलम, लाल वैदुर्य, श्याम, मरकत, मोती, मूंगा, गोमेद और हीरा - इन नौ रत्नों को तथा अन्य महत्व पूर्ण द्रव्यों को वैदिक मंत्रों के साथ छोड़ें। सद्योजात आदि पांच वैदिक मंत्रों द्वारा शिवलिंग का पांच स्थानों में क्रमशः पूजन करके अग्नि में हविष्य की अनेक आहुतियां दे और परिवार सहित शिव पूजा करके गुरु स्वरूप आचार्य को धन से तथा सभी बंधुओं को मनचाही वस्तुओं से संतुष्ट करे। याचकों को जड़ (सुवर्ण, गृह एवं भू संपत्ति) तथा चेतन (गौ आदि) वैभव प्रदान करे।
स्थावर एवं जंगम सभी प्रकार के जीवों को यत्नपूर्वक संतुष्ट करके वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए परम कल्याणकारी महादेव जी का ध्यान करे। तत्पश्चात नादघोश से युक्त महामंत्र ओंकार (ॐ) का उच्चारण कारके शिवलिङ्गं की स्थापना कर के उसे पीठ से संयुक्त करे। इसी प्रकार वहां मूर्ति की भी उसी तरह स्थापना की जाए।
फिर वैदिक विधि से पूजा की जाए। तब से नित्य प्रति उस शिवलिंग की पूजा की जानी चाहिए।
यदि चर लिंग है तो षोडशोपचार पूजन किया जाए। जैसे आवाहन, आसन, अर्घ्य, पद्य, पाध्यांग आचमन, स्नान, वस्त्र एवं यज्ञोपवीत, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल समर्पण, निराजन, नमस्कार और विसर्जन - यह सोलह उपचार हैं। यह सब यथा शक्ति नित्य करें।
स्थापना से संबंधित मुख्य बातें ही यहां इस लेख में लिख रहा हूँ। अन्यथा शिव पुराण ग्रंथ में तो इतने विस्तार से बताया गया है कि उसे पूरा लिखने के लिए तो पूरी पुस्तक ही लिखनी पड़ेगी। मुख्य बात यह है कि शिवलिंग की स्थापना विधिवत करनी चाहिए और शिवलिंग की पूजा नित्य प्रति करने से ही पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।
विद्येश्वर संहिता के दूसरे मुख्य बिंदु
विद्येश्वर संहिता में आगे मोक्षदायक पुन्यक्षेत्रों का वर्णन भी किया गया है जिसमें पवित्र नदियां जैसे सिंधु, सतलज, नर्मदा सरस्वती, गंगा, कृष्णा आदि जिनके तटों पर महान पुरषों के तपस्या करने से कई पुण्य क्षेत्र बन गए हैं। वहां पर जाकर भी पुण्य कर्म करने चाहिएं। नैमिशारण्य एवं बद्रिकाश्रम आदि कई पुण्य क्षेत्रों की महिमा बताई गई है।
काल विशेष में विभिन्न नदियों के जल में स्नान आदि करने के उत्तम फल के बारे में भी बताया गया है।
इसके इलावा इस विद्येश्वर संहिता में सदाचार, शौचाचार, स्नान, भस्म धारण, संध्या वंदन, प्रणव जप, गायत्री जप, दान, न्यौता: धनोपार्जन तथा अग्निहोत्र आदि की विधि एवं महिमा का वर्णन किया गया है।
इसके बाद विद्येश्वर संहिता में अग्नि यज्ञ, देव यज्ञ, ब्रह्म यज्ञ आदि का वर्णन किया गया है। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि सातों वारों का निर्माण भी भगवान शिव ने ही किया है और साथ ही उनमें देव अराधना से विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति का वर्णन भी किया गया है।
इसके बाद देश, काल, पात्र, और दान आदि का विचार और रुद्राक्ष धारण की महिमा तथा उसके विविध भेदों का वर्णन भी मिलता है।
बताया गया है कि विद्येश्वर संहिता सम्पूर्ण सिद्दिओं को देने वाली तथा भगवान शिव की आज्ञा से नित्य मोक्ष प्रदान करने वाली है।
ॐ नमः शिवाय
पार्थिव द्रव्य से, जलमय द्रव्य से अथवा तैजस पदार्थ से अपनी रुचि के अनुसार कल्पोक्त लक्षणों से युक्त शिवलिंग का निर्माण करके इसकी पूजा करने से पूरा पूरा फल प्राप्त होता है।
यदि चल प्रतिष्ठा करनी हो तो इसके लिए छोटा सा शिवलिंग अथवा विग्रह श्रेष्ठ माना जाता है। और यदि अचल प्रतिष्ठा करनी हो तो स्थूल शिवलिंग अथवा विग्रह अच्छा माना गया है।
शिवलिंग का पीठ गोल, चौकोर, त्रिकोण अथवा खाट के पाए की भांति ऊपर नीचे मोटा और बीच में पतला होना चाहिए।
जिस द्रव्य ( मिट्टी, लोहे, पत्थर आदि ) से शिवलिंग का निर्माण हो, उसी द्रव्य से ही उसका पीठ भी बनाना चाहिए।
परंतु बाण लिंग के लिए यह नियम नहीं है।
लिंग की लंबाई यजमान की 12 अंगुल से और चर लिंग की लंबाई यजमान की एक अंगुल से कम नहीं होनी चाहिए। परंतु अधिक होने में दोष नहीं है।
देवालय देवगणों की मूर्तियों से अलंकृत हो। उसका गर्भग्रह बहुत ही सुंदर, सुदृढ और दर्पण के समान स्वच्छ होना चाहिए। उसे नौ प्रकार के रत्नों से विभूषित किया गया हो। उसमें पूर्व और पश्चिम दिशा में दो द्वार हों।
जहां स्थापना करनी हो उस स्थान के गर्त में नीलम, लाल वैदुर्य, श्याम, मरकत, मोती, मूंगा, गोमेद और हीरा - इन नौ रत्नों को तथा अन्य महत्व पूर्ण द्रव्यों को वैदिक मंत्रों के साथ छोड़ें। सद्योजात आदि पांच वैदिक मंत्रों द्वारा शिवलिंग का पांच स्थानों में क्रमशः पूजन करके अग्नि में हविष्य की अनेक आहुतियां दे और परिवार सहित शिव पूजा करके गुरु स्वरूप आचार्य को धन से तथा सभी बंधुओं को मनचाही वस्तुओं से संतुष्ट करे। याचकों को जड़ (सुवर्ण, गृह एवं भू संपत्ति) तथा चेतन (गौ आदि) वैभव प्रदान करे।
स्थावर एवं जंगम सभी प्रकार के जीवों को यत्नपूर्वक संतुष्ट करके वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए परम कल्याणकारी महादेव जी का ध्यान करे। तत्पश्चात नादघोश से युक्त महामंत्र ओंकार (ॐ) का उच्चारण कारके शिवलिङ्गं की स्थापना कर के उसे पीठ से संयुक्त करे। इसी प्रकार वहां मूर्ति की भी उसी तरह स्थापना की जाए।
फिर वैदिक विधि से पूजा की जाए। तब से नित्य प्रति उस शिवलिंग की पूजा की जानी चाहिए।
यदि चर लिंग है तो षोडशोपचार पूजन किया जाए। जैसे आवाहन, आसन, अर्घ्य, पद्य, पाध्यांग आचमन, स्नान, वस्त्र एवं यज्ञोपवीत, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल समर्पण, निराजन, नमस्कार और विसर्जन - यह सोलह उपचार हैं। यह सब यथा शक्ति नित्य करें।
स्थापना से संबंधित मुख्य बातें ही यहां इस लेख में लिख रहा हूँ। अन्यथा शिव पुराण ग्रंथ में तो इतने विस्तार से बताया गया है कि उसे पूरा लिखने के लिए तो पूरी पुस्तक ही लिखनी पड़ेगी। मुख्य बात यह है कि शिवलिंग की स्थापना विधिवत करनी चाहिए और शिवलिंग की पूजा नित्य प्रति करने से ही पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।
विद्येश्वर संहिता के दूसरे मुख्य बिंदु
विद्येश्वर संहिता में आगे मोक्षदायक पुन्यक्षेत्रों का वर्णन भी किया गया है जिसमें पवित्र नदियां जैसे सिंधु, सतलज, नर्मदा सरस्वती, गंगा, कृष्णा आदि जिनके तटों पर महान पुरषों के तपस्या करने से कई पुण्य क्षेत्र बन गए हैं। वहां पर जाकर भी पुण्य कर्म करने चाहिएं। नैमिशारण्य एवं बद्रिकाश्रम आदि कई पुण्य क्षेत्रों की महिमा बताई गई है।
काल विशेष में विभिन्न नदियों के जल में स्नान आदि करने के उत्तम फल के बारे में भी बताया गया है।
इसके इलावा इस विद्येश्वर संहिता में सदाचार, शौचाचार, स्नान, भस्म धारण, संध्या वंदन, प्रणव जप, गायत्री जप, दान, न्यौता: धनोपार्जन तथा अग्निहोत्र आदि की विधि एवं महिमा का वर्णन किया गया है।
इसके बाद विद्येश्वर संहिता में अग्नि यज्ञ, देव यज्ञ, ब्रह्म यज्ञ आदि का वर्णन किया गया है। इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि सातों वारों का निर्माण भी भगवान शिव ने ही किया है और साथ ही उनमें देव अराधना से विभिन्न प्रकार के फलों की प्राप्ति का वर्णन भी किया गया है।
इसके बाद देश, काल, पात्र, और दान आदि का विचार और रुद्राक्ष धारण की महिमा तथा उसके विविध भेदों का वर्णन भी मिलता है।
बताया गया है कि विद्येश्वर संहिता सम्पूर्ण सिद्दिओं को देने वाली तथा भगवान शिव की आज्ञा से नित्य मोक्ष प्रदान करने वाली है।
ॐ नमः शिवाय
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