शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ ( राष्ट्रीय बालिका दिवस पर विशेष )

 मैं अशिक्षित से शिक्षित हुई, अबला से सबला।
पुरुष के कन्धे से कन्धा मिला,देश का भाग्य बदला।
पुरानी से लेकर नई तक, सब जिम्मेदारियां निभाती हूं।
ऑटो रिक्शा से लेकर, जहाज तक चलाती हूं।
सड़क पे चलते फिर भी, मेरी अस्मत क्यूं लुट जाती है।
उन नर रूपी दैत्यों को, फिर मौत, क्यूं नहीं आती है।
अस्मत लूटी, फूंक दिया, और मार दिया हथियारों से।
लड़की पूछ रही है, सभी समाज के ठेकेदारों से।
       आधी आबादी पर सदियों से  अत्याचार हो  रहा  है।  स्त्री को दूसरे दर्जे का नागरिक समझ कर और  उस की  उन्नति  में बाधक बन कर यह समाज  उसका  तो  नुकसान  कर ही  रहा है,दूसरी ओर पूरे समाज को  भी  पीछे  धकेल  रहा  है।  जिस समाज की नारी शिक्षित नहीं वो समाज हमेशा अधूरा ही रहता है। कहते हैं ना कि यदि परिवार की एक बेटी शिक्षित हो जाती है  तो एक नहीं बल्कि दो दो परिवारों को शिक्षित कर देती है।
       दुख होता है जब आज भी लोग  बेटी  को  अच्छी  शिक्षा देने के बजाए उसकी शादी की चिंता अधिक करते हैं।  उसकी शिक्षा पर खर्च करने के बजाए उसकी शादी के  लिए  धन  को संभाल संभाल कर रखते हैं। उसको अपने पैरों पर  खड़ा  होने में सहयोग देने के बजाय उसको पराई अमानत समझ कर एक अनजान परिवार में भेज देने की जल्दी करते हैं। वो  छोटी  सी परी जिसने आगे बढ़  कर  कल्पना चावला,  सानिया नेहवाल, सानीया मिर्जा आदि बनना था इसको कम उम्र  में  ही  गृहस्थ की बेड़ियां पहना दी जाती हैं।
        यहीं पर बस नहीं उससे भी बड़ा दुख तो इस  बात का है कि कई मनहूस प्राणी बेटी को पढ़ाने की बात तो दूर  बेटी  को पैदा होने से पहले ही उसकी जीवन लीला समाप्त कर  देते हैं। ऐसे लोग जिनकी इतनी घटिया और राक्षसी सोच है  और  जो बेटी को बोझ समझते हैं दरअसल वो स्वयं इस पृथ्वी पर बहुत बड़ा बोझ हैं। उनकी संवेदना मर चुकी है। वो आज तक समझ ही नहीं नहीं पाए कि जिस घर में बेटी पैदा नहीं  होती  वो  घर कितना निष्प्राण प्रतीत होता है। बेटी  ही  तो  घर  की  असली रौनक होती हैं। यह सब कुछ समझ पाना शायद उनके बस की बात भी नहीं है क्योंकि उनको तो स्वार्थ के आगे कुछ नज़र ही नहीं आता।  आज के युग का शायद सब  से  घृणित  अपराध बन गया है भ्रूण हत्या।
      रही सही कसर पूरी कर देते हैं नीच सोच  रखने  वाले  वो दरिंदे जो स्त्री को केवल वासना पूर्ति का साधन मान कर सारी मर्यादाओं को लांघ जाते हैं।
     वर्तमान सरकार की यह बहुत ही  कल्याण  कारी  योजना, बेटी ' पढ़ाओ बेटी बचाओ' अपने आप में एक अनूठी  योजना है जो बहुत पहले आ जानी चाहिए थी।  भारतीय  सरकार  के द्वारा इस योजना को 22 जनवरी, 2015 को कन्या  शिशु  के लिए  जागरूकता  का  निर्माण  करने  के  लिए  और  महिला कल्याण में सुधार करने के लिए शुरू किया गया था।
       इस योजना का उद्देश्य भ्रूण हत्या को रोकना, कन्या शिशु की रक्षा, शिक्षा के क्षेत्र में  महिलाओं की  भूमिका को  बढ़ाना, लिंग अनुपात को सही दिशा में बढ़ाना और छोटी  आयु  में  हो रहे विवाहों को रोकना आदि है।
      यह बात सही है कि केवल योजनाएं बना देने से बात नहीं बनती। इनको संकल्प पूर्वक लागू करना होता  है। और  खास करके वो योजनाएं जिनका संबंध लोगों की सोच  और उनकी मान्यताओं से हो, उनमें तो  और ज्यादा  सतर्कता,  जिम्मेदारी, कर्मठता और पक्के इरादे की आवश्यकता होती  है।  मुझे  तो पक्का विश्वास है कि सरकार और समाज के लोग पूरी तरह से संकल्प करके यदि इस योजना को  सफल  बनाने  का  प्रयास करेंगे तो सफलता का  कोई ना  कोई  मार्ग  आवश्य  ही  मिल जाएगा। कवि ने कहा है कि:
  सामने हो जब लक्ष्य हमारे, मन में गर विश्वास भरा हो
  कोई शंका हो ना मन में, चित्त हमारा पूर्ण खरा हो
  कितना भी मुश्किल हो चाहे, करने को जब तुल जाता है
  इच्छा जब संकल्प बने तो, एक झरोखा खुल जाता है

    

सोमवार, 20 जनवरी 2020

अंदर के रावण को कैसे जीतें

     हमारे अंदर हमेशा अच्छे और बुरे विचार  आते  और  जाते रहते हैं। हमारी मानसिक अवस्था सदा एक जैसी  नहीं  रहती। परंतु कुछ लोग ऐसे हुए हैं जिन्होंने प्रयत्न पूर्वक इस पर  कार्य किया और अपने अंदर  उठने  वाले  नकारात्मक  और  दुष्टता पूर्ण विचारों को नष्ट कर दिया। उन्होंने  अपने  अंदर  ऐसे  गुण भर लिए कि उनके अवगुण कम ही  नहीं  हुए  बल्कि  नष्ट  हो गए। जब किसी व्यक्ति की यह अवस्था बन जाती है तो  कहते हैं कि उसने अपने अंदर के रावण को जीत लिया है। ऐसे लोगों का संसार और अंतर मन दोनों बैकुंठ रूप  हो  जाते  हैं।  यही दर्शन हमें श्री रामचरितमानस में स्वामी  तुलसीदास जी  ने  भी दिया है।
 स्वामी तुलसी  दास जी द्वारा रचित श्री रामचरितमानस  में श्री राम रावण युद्ध के समय जब विभीषण ने देखा कि  रावण  तो युद्ध के लिए सब प्रकार  की  सामग्री लेकर और रथ पर सवार हो कर आया है और श्री राम जी के पास तो रथ भी नहीं है तो उसने बड़े ही अधीर। होकर, स्नेह  पूर्वक  भगवान राम  जी  से प्रार्थना करते हुए प्रश्न किया कि:-
                नाथ न रथ नहीं तन पद त्राना।
                केहि बिधी जितब बीर बलवाना।।
 हे रघुवीर, रावण तो रथ पर सवार होकर आया है  परंतु आप के पास ना तो कोई रथ है ना शरीर  की  रक्षा के  लिए  कवच है और ना ही पांव में  जूते हैं। ऐसे आप इतने  बलवान  योद्धा को कैसे जीत पाएंगे?
इस पर  विभीषण को उत्तर देते हुए और  संपूर्ण  मानव  जाति को एक संदेश देने के लिए  श्री राम जी ने कहा कि:-
                सुनहुं सखा कह कृपा निधाना।
                जेहिं जय होई सो स्यंदन आना।।
हे मित्र विभीषण , जिस से विजय प्राप्त हो सकती है, मैं  ऐसा रथ ले आया हूँ।
                 सौरज  धीरज तेहिं रथ चाका,
                 सत्य सील दृढ ध्वाजा पताका।
अर्थात इस रथ रथ  की  विशेषताएं यह हैं  कि शौर्य  और  धैर्य इसके दो पहिए हैं। सत्य और  शील (सदाचार) इसके मजबूत  ध्वजा पताका हैं।
                 बल बिबेक दम परहित घोड़े।
                 छमा कृपा समता रजु जोड़े।।
                 ईस भजनु सारथि सुजाना।
                 बिरती चर्म संतोष कृपाना।।
                 दान परसु बुद्धि सक्ति प्रचंडा।
                 बर बिज्ञान कठिन कोदंडा।।
                 अमल अचल मन त्रोन समाना।
                 सम जम नियम सिलीमुख नाना।।
                 कवच अभेद बिप्र गुरु पूजा।
                 एही सम विजय उपाय ना दूजा।।
                 सखा धर्ममय अस रथ जाकें।
                 जीतन कह न कतहुं रिपु ताकें।।
बल, विवेक, दम (इन्द्रियों को नियंत्रण  में  रखना) और  दूसरों का हित इस रथ के चार घोड़े हैं। क्षमा, दया और समता  रूपी  तीन  रस्सियां  हैं जिनसे इनको रथ  के  साथ  जोड़ा  गया  है। ईश्वर  का भजन इसका समझदार सारथी  है।  वैराग्य  ढाल  है और संतोष तलवार है। दान फरसा और बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है। विशुद्ध विज्ञान कठिन धनुष है। निर्मल और स्थिर मन तरकश के समान है। शम (मन को नियंत्रण में  करना)  यम  (अहिंसा) और नियम आदि इस तरकश के तीर हैं।  विप्र और  गुरु  जनों की सेवा ही अभेद्य कवच है। इसी से विजय मिलती है।  इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है। हे मित्र!जिसके  पास  इस प्रकार का धर्ममय रथ है, उसके लिए जीतने को कहीं  शत्रु  ही नहीं है। अर्थात उसका कोई शत्रु रहता ही नहीं है।
           महाअजय संसार रिपु, जीत सके सोई बीर।
           जाकें अस रथ होई दृढ, सुनहुं सखा मतिधीर।।
राम जी  विभीषण को  कहते हैं  कि  हे  धीरबुद्धि  वाले  सखा सुनो, जिस के पास इस प्रकार  का  रथ  है वो तो  महा  अजय संसार रूपी शत्रु (आवागमन का चक्र)  को  भी  जीत   सकता है। अर्थात रावण तो उसके सामने कुछ भी नहीं।
     इस दर्शन से पता चलता है कि हम व्यर्थ ही वाक  युद्ध  के द्वारा अपने को श्रेष्ठ सिद्ध करने  का   प्रयत्न  करते  रहते   हैं। एक दूसरे के प्रति घृणा, द्वेष आदि करते  हुए  भी अपने  आप को पवित्र और  विशुद्ध  दिखाने  का व्यर्थ  प्रयास  करते  रहते हैं। परंतु जो  करना  चाहिए  वो  नहीं  करते।  हमें  यह  समझ लेना चाहिए कि हमें  केवल  अपने आप  को  ही  ठीक  करना है,  दूसरों   को  नहीं  ऊपर   बताए   गुणों  (शौर्य,  धैर्य,  बल, विवेक, दृढता, सत्य, शील (सदाचार)  दम (इन्द्रिय  नियंत्रण),  दूसरों  का  हित  करना, क्षमा,  दया,  समता,  वैराग्य,  संतोष, दान, विशुद्ध वैज्ञानिक  बुद्धि, निर्मल  और  स्थिर  मन, अहिंसा और गुरु जनों कि सेवा का भाव) को धारण करके अपने अंदर के  राक्षस  को  जीत  लेना  है।  इतने  बड़े  ब्रह्मांड  में  इस  से बड़ा और कोई कार्य नहीं है।

गुरुवार, 9 जनवरी 2020

भजन

            भजन संख्या १. (हरि शरणम्)
 हरि शरणम् , हरि शरणम् , हरि शरणम् , हरि शरणम्।
 हरि शरणम् , हरि शरणम् , हरि शरणम् , हरि शरणम्।।
 प्रभु इतनी कृपा करना, संग संतों का दे देना।
 गुरु चरणों में मन लागे, व सेवा भाव दे देना।।
 हरि शरणम्............
 कृपा करना हरि मुझ पर, कथा में ध्यान हो मेरा।
 करूं किर्तन सदा तेरा, जुबान पे नाम हो तेरा।।
 हरि शरणम्...........
 मुझे वरदान दो कान्हा, तेरे गुण गाए यह वाणी।
 निहारूं रूप को तेरे, बहाऊं आंख से पानी।।
 हरि शरणम्...........
 उचित व्यवहार संयम ज्ञान, और वैराग्य दे देना।
 कभी पर दोष ना देखूं, मुझे संतोष दे देना।।
 हरि शरणम्.............
 जगत में तू दिखे ऐसी, मेरी दृष्टि बना देना।
 सरल छल हीन हो जाऊं, भरोसा तुझ में हो श्यामा।।
 हरि शरणम्.............

        भजन संख्या २. (जय मोहन माधव गिरधारी)
 जय मोहन माधव गिरधारी, केशव मुरलीधर बनवारी।
 जय मोहन माधव गिरधारी, केशव मुरलीधर बनवारी।।
 मन मंदिर में आन विराजो, राधा के संग श्याम।
 धुन वंशी की छेड़ो, मुझको संग नचाओ श्याम।।
 सर्वेश्वर मनमोहन तेरी, सूरत है प्यारी प्यारी।
 जय मोहन माधव गिरधारी..........
 कई जन्मों से भटक रही हूँ पद्मनाभ आ जाओ।
 वीराने मन में मनमोहन आ के रास रचाओ।।
 नयना तक तक हार गए हैं, मैं तेरे आगे हारी।
 जय मोहन माधव गिरधारी..........
 तेरी माया तू ही जाने और ना जाने कोई।
 जो ना तेरी ओर चली वो पकड़ के मस्तक रोई।।
 कृपा तेरी पर है मधुसूदन, निर्भर हैं बातें सारी।
 जय मोहन माधव गिरधारी...........

           भजन संख्या ३. (भज नारायण)
   भज नारायण, भज नारायण, नारायण भज रेे मन तू।
   भज नारायण, भज नारायण, नारायण भज रेे मन तू।।
   अत्याचारी लोगों के जब पाप कर्म बढ़ जाते हैं।
   भले लोग इन लोगों के पापों से जब भय खाते हैं।
   मानवता की रक्षा करने नारायण तब आते हैं।।
   भज नारायण भज नारायण..........
   वराह रूप रसातल से पृथ्वी को बाहर थे लाए।
   मन्वन्तर की रक्षा को थे मत्स्य रूप में हरि आए।
   सागर मंथन को नारायण कच्छप जैसे बन आए।।
   भज नारायण भज नारायण..........
   नृसिंह बन नारायण ने था हिरण्यकशिपु उद्धार किया।
   वामन रूप में देव बचाए बली पर भी उपकार किया।
   परशुराम अवतार में आकर पापियों का संहार किया।।
   भज नारायण भज नारायण..........
   राम चन्द्र जी ने रावण और कुंभकर्ण उद्धार किया।
   स्वयं कृष्ण ने लीलाओं से भक्तों पर उपकार किया।
   पाप मिटाया पृथ्वी से और धर्म का जय जयकार किया।।
   भज नारायण भज नारायण..........

        भजन संख्या ४ (श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी)
    श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव।
    श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव।
               बड़ी ही सुंदर छवि है कान्हा,
               हो कैसे वर्णन कोई ना जाना।
               हृदय कमल में मेरे वीराजो,
               हे नाथ नारायण वासुदेव।।
    श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव।
               गले में वनमला सोहे सुंदर,
               मेघा सा रंग, सुंदर पीताम्बर।
               वक्ष स्थल पर मणि सुहाए,
               हे नाथ नारायण वासुदेव।।
    श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव।
               कानों में कुण्डल सर पे मुकुट है,
               चित को चुराए टेढ़ी भृकुटी है।
               अद्भुत यह क्या रूप की माधुरी है,
               हे नाथ नारायण वासुदेव।।
     श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव।
               चंदन से चर्चित श्री अंग सारा,
               अधरों पे बंसी चित्त का सहारा।
               बंसी बजैया गोपियन का प्यारा,
               हे नाथ नारायण वासुदेव।।
     श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी, हे नाथ नारायण वासुदेव।

         भजन संख्या: ५ (यशोमती नंदन राधे श्याम)
     यशोमती नंदन, राधे श्याम, नंद  के  लाला  सुख के धाम।
     यशोमती नंदन, राधे श्याम, नंद के लाला  सुख के  धाम।।
     सर पर सुंदर मुकुट सुहावे, जो भी  देखे  अति सुख  पावे।
     कृष्ण नाम जो मुख से बोले, जीवन में वो कभी ना डोले।।
     देवकी पुत्र कृष्ण भगवान, नंद  के  लाला  सुख  के  धाम।
     यशोमती  नंदन, राधे श्याम, नंद के  लाला सुख के धाम।।
     अधरों  पे बंसी  क्या  सोहे,   रूप  माधुरी  मन  को  मोहे।
     लाखों काम देव भी क्या हैं, बाल कृष्ण की छवि जहां है।।
     गोपिअन के प्रियतम श्रीकांत, नंद के लाला सुख के धाम।
     यशोमती नंदन, राधे श्याम, नंद के लाला  सुख के  धाम।।
     मनमोहन  वासुदेव  सुदर्शन,   नयनम  में  तेरा  ही  दर्शन।
     भक्ति  दे  दो  हे  सर्वेश्वर,    चरणों  में  ले  लो  परमेश्वर।।
     ज्ञान विरक्ति का वरदान,  नंद  के  लाला  सुख  के  धाम।
     यशोमती नंदन, राधे श्याम, नंद के लाला  सुख के  धाम।।
     हृदय कमल में गोविंद आओ, केशव माधव दर्श दिखाओ।
     धुन मुरली की मुझे सुनाओ, राधा के संग  गोविंद आओ।।
     मन में बसो प्रभु आठों याम, नंद के लाला सुख  के  धाम।
     यशोमती नंदन, राधे श्याम, नंद के  लाला सुख के  धाम।।

         भजन संख्या ६. (भज मन सिया राम का नाम)
   भज मन सिया राम का नाम, अकारण कृपा करें मेरे राम।
   भज मन सिया राम का नाम, अकारण कृपा करें मेरे राम।

   भव भय हरने वाले राम, सब सुख करने वाले राम।
   काटें तीन ताप के फंदे, भले बुरे सब उसके बंदे,
   मेरे राम हैं सुख के धाम, भज मन सिया राम का नाम।
   भज मन सिया राम का नाम, अकारण कृपा करें मेरे राम।

   मोहिनी आंखों वाले राम, मुख, कर, पद सब कमल समान।
   लाखों कामदेव भी क्या हैं, राम चन्द्र की छवि जहां है।
   नीर भरे मेघा से श्याम, भज मन सिया राम का नाम।
   भज मन सिया राम का नाम, अकारण कृपा करें मेरे राम।

   सर पर सुंदर मुकुट सुहावे, जो मुख देखे अति सुख पावे।
   राम राम जो मुख से बोले, जीवन में वो कभी ना डोले।
   पार उतारें प्यारे राम, भज मन सिया राम का नाम।
   भज मन सिया राम का नाम, अकारण कृपा करें मेरे राम।

   दीन दुःखी की पीड़ा हरते, दैत्य सदा रघुवर से डरते।
   मन मंदिर में आओ राम, हृदय कमल पर बैठो राम।
   भक्ति का दीज्यो वरदान, भज मन सिया राम का नाम।
   भज मन सिया राम का नाम, अकारण कृपा करें मेरे राम।

बुधवार, 8 जनवरी 2020

गुरु वंदना

प्रथम गुरु जी की वंदना, फिर गणपति का ध्यान।
गुरु शरण बिन ना मिले पूर्ण ब्रह्म का ज्ञान।
सर्व प्रथम ब्रह्म ज्ञान प्रदान करने वाले गुरु जी की वंदना करता हूँ। उसके बाद कल्याण करता और विघ्नहर्ता  गणेश  जी  का ध्यान करता हूँ। जब तक मनुष्य  सच्चे  गुरु  की  शरण  ग्रहण नहीं करता तब तक उसे पूर्ण ब्रह्म का ज्ञान  प्राप्त  नहीं  होता।
ज्ञान हीन पर सतगुरु कृपा कीजिए आन।
निर्मल मन कर दास का दो भक्ति का दान।।
मुझ में बिल्कुल  भी ज्ञान नहीं है।  हे सतगुरु आप आकर  मुझ पर कृपा करें। आप मेरे चित्त को ऐसा निर्मल बना दें कि  उसमें भक्ति का प्रवेश हो जाए।
जय गुरुदेव ज्ञान भंडारी, हरहू नाथ मम संकट भारी।
ज्ञान विहीन मूर्ख मैं प्राणी, शरण तुम्हारी आया स्वामी।।
हे गुरुदेव आप ज्ञान  के  भंडार हैं  और  आप  ही  ज्ञान  प्रदान करने वाले हैं। आप मेरे तीनों तापों से होने वाले संकट दूर करो मैं तो मूर्ख हूं और अपना भला बुरा कुछ नहीं जानता।हे स्वामी आप मुझे अपनी शरण में ले लो।
गुरु बिन ना कोई पार लगावे, अंधा राही धोखा खावे।
गुरु देव हर देव तुम्हीं हो, ब्रह्मा, विष्णु, महेश तुम्हीं हो।।
जैसे एक अंधे व्यक्ति को रास्ता दिखाई नहीं देता उसी तरह ही  ब्रह्म ज्ञान रूपी आंखें ना होने के कारण मैं  अंधा  मुसाफिर हूँ  जो गुरु के रास्ता दिखाए बिना भव सागर  को  पार  नहीं  कर सकता। मेरे लिए सभी देवता आप में ही हैं। मेरे लिए आप ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं।
तुम्हीं पिता हो तुम्हीं हो माता, तुम्हीं सखा हो तुम्हीं हो भ्राता।
जगत पिता हो सबके स्वामी, सर्व व्यापक अन्तर्यामी।।
आप ही मेरे पिता, माता, और भ्राता हैं। मैं  आप  में  ही  परम पिता परमात्मा के दर्शन करता हूं। मेरे लिए  आप  ही  परब्रह्म परमेश्वर हैं जो कण कण में व्याप्त हैं। 
हर कोई निस दिन तुम्हें ध्यवे, तुम बिन ईश्वर कोई ना पावे।
वेद, शस्त्र महिमा तुद गावे, महापुरुष सब ध्यान लगावें।।
हे गुरुदेव जिस ईश्वर का सब लोग और बड़े बड़े  महापुरुष  भी नित्य ध्यान करते हैं और जिसकी वेद और शास्त्र  महिमा  गाते हैं उसको आप की कृपा के बिना  पाया  नहीं  का  सकता  इस लिए मैं आप को उसी परमात्मा का स्वरूप मानता हूँ।
गुरु नाम से मन हर्षाए, तन मन सब जागृत हो जाए।
अंतर के पट खुलते जाएं, ज्यों ज्यों गुरु का नाम ध्याएं।।
आप का नाम सुन कर मेरा मन हर्षित हो  जाता  है।  मेरा  तन मन सब जागृत हो जाता है। जो भी आप द्वारा  दिए  नाम  को जैसे जैसे लेता है वैसे वैसे उसके अंतर के पट खुलते जाते हैं।
गुरुदेव की महिमा भारी, गुरुदेव की लीला न्यारी।
कृपा गुरु की जब हो जावे, अवगुण सारे दूर भगावे।।
गुरु की महिमा अपरंपार है। उसकी लीला इतनी  न्यारी  है  कि गुरु अपने शिष्य पर कृपा करके उसके सारे  अवगुण  दूर  कर देता है।
चंचलता मन की हट जावे, ज्ञान ध्यान की दौलत पावे।
संग गुरु का जब हो जावे, आशिर्वाद मिले सुख पावे।।
गुरु के संग से ही शिष्य ज्ञान और ध्यान रूपी दौलत पा लेता है और उसके मन की चंचलता मिट जाती है।  गुरु के  आशिर्वाद से उसे असली सुख की प्राप्ति हो जाती है।
जगत पसारा समझ में आवे, अंतर मन में जोत जगावे। 
गुरु शरण में जो भी जावे, मिटे अंधेरा रौशनी पावे।।
गुरु की शरण ग्रहण  करने  से  शिष्य  के  मन  से  अज्ञान  का अंधकार समाप्त हो जाता है और  ज्ञान  का  नित्य  प्रकाश  हो जाता है जिस से उसे यह पता भी चल जाता है कि सारी  सृष्टि परमात्मा का ही विस्तार है। 
गुरुदेव का ध्यान लगावे, नाम दान गुरुदेव से पावे।
धन संपदा से ध्यान हटावे, हरि नाम की दौलत पावे।।
गुरुदेव से नाम का दान ग्रहण करके जब शिष्य गुरु  और  हरि का ध्यान करता है उसका ध्यान सांसारिक वस्तुओं  से  अपने आप दूर हो जाता है।
ध्यान मग्न संसार भुलावे, संकट मिटे बहुत सुख पावे।।
इष्ट देव साक्षात करावे, हरि नाम से सद्गति पावे।
गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान और ध्यान से ही शिष्य के संकट मिटते हैं, नित्य सुख मिलता है, संसार से ध्यान हट जाता है और अंत में उसे इष्टदेव के दर्शन हो जाने से सद्गति  प्राप्त हो जाती है।
हरि चरणों की करे आरती, हरि चरणों में शीश निवावे। 
ब्रह्म रूप को याद करे, और ब्रह्म रूप ही खुद हो जावे।।
गुरु की कृपा से ही शिष्य इस योग्य हो पाता है कि वो  भगवान की आराधना कर सके, पूजा कर सके उसे याद करता रहे और एक दिन स्वयं भी उसी में मिल जाए।
गुरुदेव कल्याण करे, और गुरु देव ही कष्ट मिटावे।
गुरु देव ही शरण में ले, और गुरुदेव ही पार लगावे।।
यह सब कुछ गुरु कृपा से ही हो सकता है। इसी लिए कहा  है कि प्राणी का कल्याण करने वाला गुरु है, सारे कष्ट दूर  करने वाला और अपनी शरण में लेकर भव सागर से  पार  उतारने वाला भी गुरु ही है।
जो नर मन चित लाए के, करे गुरु का ध्यान।
कृपा करें गुरुदेव जी, संकट कटें तमाम।।
 जो व्यक्ति अपना चित्त गुरु के चरणों में  लगा देता है उस  पर गुरु स्वयं कृपा करते हैं उसे फिर सांसारिक और भवसागर का रास्ता पार करने के कष्टों की कोई चिंता नहीं  रह  जाती।  गुरु स्वयं ही उसको पार कर देते हैं।
                    गुरुदेव जी की आरती
जय जय जय गुरुदेव, स्वामी जय जय जय गुरुदेव।
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु,    जय गुरु देव  महेश।।  ॐ जय...
गुरु बिन घोर अंधेरा, गुरु बिन ज्ञान नहीं।
गुरु  शरण  बिन  बंदे,        पावे  मान  नहीं।।  ॐ जय...
कष्ट क्लेश सब मन के, पल में दूर करे।
ज्यों ही शिष्य जुबां पर, गुरुजी का नाम धरे।।  ॐ जय...
तन मन धन सब अर्पण, जो कर देता है।
नाम दान  पाकर  वो,    मोक्ष  पद  लेता  है।।   ॐ जय...
अहम् त्याग कर खुद को, गुरु जी की शरण करे।
गुरु  कृपा  से  वह,       भवसागर  पार  तरे।।   ॐ जय...
गुरु देव जी की आरती, जो कोई नर गावे।
गुरु कृपा  से  वह,    मनवांछित  फल  पावे।।   ॐ जय...




शनिवार, 28 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या 38 (श्रीकृष्ण पत्नियों और वज्र नाभ का उद्धार)

                      परीक्षित - वज्र नाभ संवाद
       श्रीकृष्ण जी के अपने धाम को चले जाने के बाद  अर्जुन द्वारिका से सभी स्त्रियों को इंद्रप्रस्थ ले आए।  श्रीकृष्ण जी  के वंश में उनके पौत्र अनिरुद्ध के पुत्र वज्रनाभ को उन्होंने  मथुरा मंडल का राजा बना दिया।  पांडवों के स्वर्गारोहण के बाद श्री परीक्षित जी ने  अपना कर्तव्य समझते हुए  वाज्रनाभ के पास जाने का निर्णय किया। वहां पहुंचने पर वज्र नाभ बहुत प्रसन्न हुए और प्रणाम करके उनको महलों में ले गए।
       परीक्षित जी के कुशल क्षेम पूछने पर वज्र नाभ ने बताया कि यहां पर कोई प्रजा ही नहीं है।  जहां प्रजा ही नहीं वहां पर शासन किस पर करना है। मुझे तो पता ही नहीं कि सारी प्रजा कहां चली गई।  इस पर परीक्षित जी ने इसका उत्तर जानने के लिए नंद जी के गुरु महर्षि शांडिल्य जी को बुलाया।
               नित्य एवं वास्तविक लीला विहार
       परीक्षित जी द्वारा  निवेदन  करने पर  महर्षि शांडिल्य जी ने कहा कि इस स्थान का नाम व्रज है।  व्रज  शब्द  का  अर्थ है व्यापक और व्यापक तो केवल भगवान हैं। इस लिए व्रज नाम भगवान का ही है।  व्रज  में आज भी श्री कृष्ण  का  वास्तविक लीला विहार नित्य चलता रहता है।  परंतु सब लोग उनकी इस लीला को देखने के अधिकारी नहीं हैं।  इस  लिए  आपको यह स्थान निर्जन लग रहा है।  समय  आने  पर आपको श्री उद्धव  जी द्वारा श्रीमद्भागवत सुनाई जाने के  बाद  आपकी  भी  ऐसी स्थिति बन जाएगी जिस स्थिति में उस  लीला  के  दर्शन  आप कर पाओगे। तब तक हे वज्र नाभ  आप  इस  व्रज  का सेवन  करते  रहो  और यहां पर  बाहर से लोगों को  लाकर  बसाओ। इसके इलावा प्रभु  श्री कृष्ण  जी की  लीलाओं के  स्थानों  का पता लगा कर  उन स्थानों के  नाम भी  भगवान  द्वारा  की गई लीलाओं के नाम पर ही रखना।
            कालिंदी जी और श्रीकृष्ण पत्नियों का संवाद
     एक दिन श्रीकृष्ण विरह वेदना से व्याकुल श्रीकृष्ण जी की 16000 रानियां अपने  प्रियतम  की  चतुर्थ  पटरानी  कालिंदी (यमुना जी) को आनंदित देख कर पूछने लगीं कि  उसे  उनकी तरह विरह वेदना क्यों नहीं सता रही है। यमुना जी ने हंसते हुए उत्तर दिया कि अपनी आत्मा में ही रमण करने के कारण  प्रभु श्रीकृष्ण आत्मा राम हैं। उनकी आत्मा  हैं - श्री  राधा  जी।  मैं दासी की भांति श्री राधा जी की सेवा में रहती  हूँ।  यह  उनकी सेवा का ही प्रभाव है कि विरह  मुझे  स्पर्श  नहीं  कर  सकता। श्रीकृष्ण जी की सभी रानियां, श्री  राधा  जी  के  ही  अंश  का विस्तार हैं। राधा कृष्ण का नित्य संयोग है।  इसी  तरह  उनकी अंश होने के कारण सभी रानियों  को  भी  भगवान  का  नित्य संयोग प्राप्त रहता है। श्रीकृष्ण ही राधा और राधा जी श्रीकृष्ण हैं। उन दोनों का प्रेम ही वंशी है।  तथा  राधा  की  प्यारी  सखी चंद्रावली भी श्रीकृष्ण चरणों के नख रूपी चंद्रमाओं  की  सेवा में आसक्त रहने के कारण ही चंद्रावली नाम से कहीं जाती  है। मैंने श्री राधा जी में ही रुक्मिणी आदि का  समावेश  देखा  है। तुम लोगों का भी सर्वांश में श्री कृष्ण के साथ वियोग नहीं हुआ है। परंतु तुम इस रहस्य को इस  रूप  में  जानती  नहीं हो। इस लिए इतनी व्याकुल हो। जैसे गोपियों का विरह  उद्धव  जी  के द्वारा दिए गए ज्ञान से दूर हुआ था, उसी प्रकार  यदि  तुम  सब को उद्धव जी का सत्संग प्राप्त हो जाए, तो तुम सब भी  अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के साथ  नित्य  विहार  का  सुख  प्राप्त  कर लोगी। यमुना जी ने आगे कहा कि उद्धव जो साक्षात स्वरुप में बद्रिकाश्रम में ही रहते हैं।  परंतु  साधन  की  फलरूपा  भूमि - व्रज भूमि है,  इसे भी इसके रहस्यों सहित भगवान ने पहले ही उद्धव जी को दे दिया था। परंतु वह  फल  भूमि, श्री  कृष्ण जी के अन्तर्ध्यान हो जाने के साथ ही स्थूल  दृष्टि से  परे जा  चुकी है। अर्थात स्थूल शरीर से उसे देखा नहीं जा सकता। इस लिए उद्धव जी प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं पड़ते। फिर भी  गोवर्धन पर्वत के निकट भगवान की लीला सहचरी गोपियों की  विहार स्थली है। वहां की लता, अंकुर और बेलों के रूप में अवश्य ही उद्धव जी वहां निवास करते हैं। उद्धव जी को  श्रीकृष्ण  जी ने अपना उत्सव स्वरूप भी प्रदान किया है।  भगवान  का उत्सव उद्धव जी का अंग है। वह उससे अलग नहीं रह सकते।
     इस लिए अब तुम वज्र नाभ को लेकर जाओ  और  कुसुम सरोवर के पास ठहरो। संगीतमय कीर्तन के  महान  उत्सव को आरंभ करो। उनका दर्शन आवश्य होगा। वही आपके  मनोरथ को पूर्ण करेंगे।
     जब सच्चे भाव से संकीर्तन शुरू किया गया तो सभी  लोग एकाग्र हो गए। उन सब की दृष्टि और उनके मन की वृत्ति कहीं और ना जाती थी। लताओं से प्रकट होकर श्री  उद्धव  जी  भी सबके सामने आ गए। उनको उपस्थित देख  कर  सभी  प्रसन्न हो गए।
          उद्धव जी द्वारा भागवत कथा का महत्त्व बताना
     श्री उद्धव जी कहने लगे, "श्रीकृष्ण जी  का  प्रकाश  प्राप्त हुए बिना किसी को भी अपने स्वरूप का बोध नहीं हो  सकता जीवों के अंत: करण में जो श्रीकृष्ण तत्व  का  प्रकाश  है, उस पर सदा माया का पर्दा पड़ा रहता है।  श्रीकृष्ण  अवतार  वाले समय के इलावा यदि किसी और काल  में कोई  श्रीकृष्ण  तत्व का प्रकाश पाना चाहे तो उसे वह श्रीमद्भागवत से ही प्राप्त कर सकता है। श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण साक्षात रूप में विराजमान रहते हैं। इसके पढ़ने, सुनने, सुनाने और इसके चिंतन करने  से ज्ञान, बल ,धन और आरोग्य की प्राप्ति भी होती है परंतु  इससे सब से उत्तम फल जो मिलता है वो है श्रीकृष्ण जी की  प्राप्ति।
अपनी ही माया से पुरुष रूप धारण  करने  वाले  परमात्मा  ने जब सृष्टि के लिए  संकल्प किया, तब  उनके  दिव्य  विग्रह  से तीन पुरुष: रजोगुण  की  प्रधानता  से  ब्रह्मा (सृष्टि निर्माण  के लिए), सत्वगुण  की  प्रधानता  से विष्णु (सृष्टि पालन करने के लिए) और  तमोगुण  की  प्रधानता  से  रुद्र  (सृष्टि के संहार के लिए) प्रकट हुए। परमात्मा  ने  ही  इन  तीनों को श्रीमद्भागवत का ज्ञान देते हुए कहा कि इसी ज्ञान की शक्ति से ही आप सभी अपने अपने कार्य कर सकोगे।  इसी  ज्ञान  से  वे  पूर्ण  रूप से सामर्थ हुए।
     वज्र नाभ ने अपने पुत्र प्रति बाहु को मथुरा का  राजा  बना दिया और एक महीने तक माताओं  के  साथ  ही  कथा  सुनी। सभी श्रोताओं ने अपने आप को भगवान के स्वरूप  में  स्थित देखा। माताएं विरह वेदना से छुटकारा पाकर श्रीकृष्ण  जी  के परमधाम में प्रविष्ट हो गईं। बाकी के सभी  श्रोतागण  भी  प्रभु श्रीकृष्ण जी की अंतरंग लीला में सम्मिलित  होकर  इस  स्थूल व्यावहारिक जगत से तत्काल अन्तर्ध्यान हो गए।  उनके  दर्शन आज भी भावुक भक्तों को हो जाते हैं।
     सूत जी कहते हैं कि जो लोग भगवत प्राप्ति की कामना से इस कथा को सुनेंगे और कहेंगे उनको भगवान  की  प्राप्ति  हो जाएगी और उनके दुखों का सदा के लिए अंत हो जाएगा।
                     जय श्री कृष्ण जी की
                              समाप्त
सभी पाठको का इस दास की ओर से लेखों को पढ़ने के  लिए और पसंद करने के लिए धन्यवाद। श्रीकृष्ण जी आपकी भक्ति और श्रद्धा को और बढ़ाते  हुए आप  सभी  पर अपनी  करुणा का अमृत बरसाते रहें। जय जय श्री राधे कृष्ण जी की।
                             धन्यवाद
 

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या 37 (यदुवंश संहार एवं श्रीकृष्ण स्वधाम गमन)

                     यदुवंश को ऋषियों का शाप
     भगवान श्री कृष्ण जी ने श्री बलराम जी के  साथ  मिलकर बहुत से दैत्यों और अन्य पापी योद्धाओं का संहार  कर  दिया। कौरवों और पांडवों में भी शीघ्र मार काट मचाने वाला अत्यन्त प्रबल ' कलह ' उत्पन्न करके पृथ्वी  का भार  उतार  दिया। श्री कृष्ण जी ने विचार किया कि बहुत सारे यदुवंशी  भी अति उग्र स्वभाव के हैं। कल को वे भी पृथ्वी पर उत्पात करेंगे। भगवान ने ऋषियों के शाप के बहाने अपने ही  कुल  का  संहार  करवा दिया। सब को समेट कर अपने धाम में ले गए।
     एक  बार  विश्वामित्र,  असित, कण्व, दुर्वासा, भृगु, अंगिरा, कश्यप, वामदेव, अत्रि, वशिष्ठ और नारद आदि ऋषि  द्वारिका के पास ही पिंडारक क्षेत्र में जाकर निवास करने  लगे थे।  एक दिन यदु वंश के कुछ  उद्दंड बालक  जांबवती  नंदन  सांब  को स्त्री वेष में सजाकर उनके पास ले गए  और  कहने  लगे  कि,  "यह सुंदरी गर्भवती है। हे महृषिओ आप हमें बताने  की  कृपा करें कि यह स्त्री कन्या को जन्म देगी या पुत्र को।" ब्राह्मणों  ने क्रोधित होकर कहा कि मूर्खो यह एक ऐसा मूसल पैदा  करेगी जो तुम्हारे कुल का नाश करने वाला होगा।  ऋषियों  का  शाप सुन कर वे डर गए। वहां से तो वे  चले  गए  परंतु  जब  पेट के कपड़े को खोल कर देखा तो एक मूसल  ही  निकला।  उन्होंने राज्य सभा में जाकर सारी बात  बताई।  उग्रसेन  ने  बिना  श्री कृष्ण जी से पूछे निर्णय ले लिया और आदेश दिया  कि  मूसल का चूरा बना कर समुद्र में डाल  दिया  जाए।  मूसल  का  चूरा बना दिया। परंतु एक छोटा टुकड़ा बच गया। सारा  चूरा  बाकी बचे टुकड़े समेत समुद्र में फैंक दिया गया। वो चूरा तो समुद्र के किनारे लग गया। वही चूरा थोड़े दिनों में एरक ( बिना गांठ की एक घास) के रूप में उग आया। जो लोहे का  टुकड़ा  बचा था उसे एक मछली निगल गई। जरा  नाम  के  एक  व्याध ने  इस मछली के पेट से  निकले  लोहे  को अपने  बाण  की  नोक पर लगा लिया। काल  रूप धारी  भगवान श्रीकृष्ण  ने  ऋषियों के इस शाप का अनुमोदन ही किया था।
                   उद्धव जी का बद्रिकाश्रम गमन
     उद्धव जी श्रीकृष्ण जी के परम भक्त थे। उनको भगवान ने उपदेश देकर बद्रिकाश्रम भेज दिया। उद्धव  जी  के  पूछने  पर भगवान ने एक सच्चे भक्त के लक्षण इस  तरह  से  बताए। श्री कृष्ण जी ने कहा," मेरे भक्त को चाहिए कि 1.अपने सारे कर्म मेरे लिए ही  करे, मेरा  स्मरण  करता  रहे।  कुछ  ही  दिनों  में उसका मन और चित्त मुझ में समर्पित हो  जाएंगे। 2. मेरे  प्रिय भक्तों के आचरण का अनुसरण करे। 3.मेरे  महोत्सवों को मन से मनाए। 4. सब में मुझे ही देखे। 5. लोक  लज्जा  को  छोड़ मेरा हो जाए। मेरे ऐसे भक्त के सारे संदेह अपने  आप  समाप्त हो जाते हैं। यही श्रेष्ठ साधन है। आत्म समर्पण से ही  मैं  प्राप्त हो जाता हूँ।
     भगवान की बातों को सुनने के बाद उद्धव  जी  ने  कहा, हे भगवान अब आप  मुझे  ऐसी आज्ञा  प्रदान  करें  जिससे  मेरी आपके चरण कमलों में अनन्य भक्ति बनी रहे।  श्रीकृष्ण जी ने कहा कि अब तुम मेरी आज्ञा से  बदरिक  वन में  चले  जाओ। वह मेरा ही आश्रम है। वहां मेरे चरण  कमलों  के  धोवन  गंगा जल से स्नान पान करना। किसी  भोग  की  इच्छा  ना  करना, अपने में मस्त रहना, मेरे स्वरूप के ज्ञान और अनुभव  में  डूबे रहना और भागवत धर्म के प्रेम में रम जाना। अंत में तुम तृगुण और उनसे संबंध रखने वाली हर गति  को  पार  करके  उनसे  परे मेरे परमार्थ स्वरूप में मिल जाओगे। उद्धव जी ने भगवान  की परिक्रमा की चरणों पर  सिर  को  रक्खा  और अश्रु  धारा  बहाते हुए विह्वल हो उठे।  बारंबार  प्रणाम  करके  और दिव्य  छवि  को धारण किए हुए बद्रिकाश्रम की ओर चल पड़े।
                         यदुकुल का संहार
      भगवान ने सुधर्मा सभा में यदुवंशियों को  कहा कि  हमारे अनिष्ट के सूचक भयंकर उत्पात होने लगे हैं। अब हमें  यहां दो घड़ी भी नहीं ठहरना चाहिए।  स्त्रियां, बच्चे  और  बूढ़े  यहां से शंखोद्वार क्षेत्र में चले जाएं, और हम लोग प्रभास क्षेत्र में  चलें। वहां पूजा दान आदि करेंगे।  श्री कृष्ण जी की बात सुन  करके सभी ने वैसा ही किया  जैसी  श्रीकृष्ण की आज्ञा थी।  प्रभास क्षेत्र पहुंच कर पूजा दान आदि किए गए परंतु भावी वश  तभी उनकी बुद्धि दैव ने हर ली। वे सभी मैरेयक  नामक  मदिरा का पान करने लगे। वे एक दूसरे से लड़ने झगड़ने लगे। जब अस्त्र समाप्त हुए तो मूसल के चूरे से  उत्पन्न  एरक  नामक घास जो हाथ में आते ही कठोर मुदगरों में परिणित हो गई थी से आपस में एक दूसरे पर वार करने लगे।  इस तरह से  आपस में लड़ते लड़ते सारे योद्धा एक दूसरे के हाथों मारे गए।
     श्री बलराम जी ने अपने आप को  आत्म स्वरूप में  स्थित कर लिया और मनुष्य शरीर का त्याग कर दिया।
                   श्रीकृष्ण जी का स्वधाम गमन
     श्रीकृष्ण जी चुप चाप पीपल के पेड़ के नीचे पृथ्वी पर बैठ गए और चतुर्भुज रूप धारण कर लिया। भगवान तब अग्नि के समान प्रकाशमान हो रहे थे।  उनके भीतर से  स्वर्ण  के समान एक ज्योति निकल रही थी।  दाहिनी जांघ पर  बायां  पांव रख कर बैठे हुए थे।  उनका लाल तलवा रक्त के समान चमक रहा था। जरा नाम का एक बहेलिया था। उसने  रगड़े हुए मूसल के बाकी बचे लोहे  के  टुकड़े से  अपने  बाण की गांसी  बना  ली थी। उस बहेलिए ने भगवान को हिरन समझ कर उस  तीर  से बींध दिया। परंतु जब वो उनके पास आया तो वह पूरी तरह से घबरा गया । वो सोच रहा था कि उसके हाथों  यह  बहुत  बड़ा पाप हो गया है। परंतु भगवान ने उसको सांत्वना देते हुए  कहा "तुम अपने आप को दोष ना दो क्योंकि यह सब कुछ  मेरी  ही आज्ञा से हुआ है।" भगवान ने उसको यह भी कह दिया कि वो अब स्वर्ग में जाकर निवास करे।  उसने  भगवान की  परिक्रमा की और सीधा स्वर्ग को चला गया।
   उधर से श्रीकृष्ण जी का सारथी दारुक भी आ  पहुंचा।  उसे भगवान ने कहा कि वो द्वारिका जाकर यहां जो कुछ घटा है वो और मेरे स्वधाम गमन की बात सब को सुना दे। द्वारिका समुद्र में डूब जाएगी। इस लिए तुम सभी को कहना कि वो मेरे माता पिता  को  साथ लेकर  परिवार सहित  अर्जुन  के  संरक्षण  में इंद्रप्रस्थ चले जाएं। तुम भागवत धर्म का आश्रय लो और  शांत हो जाओ। भगवान की आज्ञा का  पालन  करते हुए  दारुक ने श्री कृष्ण जी की परिक्रमा की और प्रणाम करके  द्वारिका  को चला गया। उधर गरुड़ जी और सारे आयुध भी  आकाश गमन कर गए।
     भगवान का शरीर मनुष्य की तरह स्थूल  शरीर  नहीं  होता है। केवल दिखाई ही वैसा पड़ता है। इस लिए भगवान सशरीर ही अपने धाम को चले गए। उनके साथ ही इस लोक से  सत्य, धर्म, धैर्य, कीर्ति और श्रीदेवी भी चली गईं।  भगवान को अपने धाम की ओर जाते हुए देख कर सभी  देवता  पुष्प वर्षा  करने लगे।
                     जय श्री कृष्ण जी की

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या 36(गोप, गोपियों, बाबा नंद और यशोदा माता से भेंट)

                   बाणासुर का घमंड चकनाचूर
बाणासुर भगवान शिव का भक्त था और  उसने  उनको  प्रसन्न करके वर प्राप्त  कर  लिया था कि भगवान शिव  स्वयं उसके  नगर की रक्षा करें।  उसकी  एक  हज़ार भुजाएं थीं। इस बात का  उसे  बहुत  अभिमान  हो  गया  था।  तब  अभिमान  के  वशीभूत  होकर  उसने शिव भगवान  को  ही  कह  दिया  कि  मुझे तो  कोई  मेरी बराबरी का योद्धा ही  नहीं  मिल  रहा जो मेरा मुकाबला कर सके।  भगवान  शिवजी ने क्रोधित हो कर कहा," अरे मूढ़, जिस  समय  तेरी  यह  ध्वजा  टूट  कर  गिर जाएगी उस समय मेरे  ही समान महान  योद्धा से तेरा  सामना होगा और तेरा  अभिमान  चकनाचूर  हो जाएगा।"  बाणासुर की  ऊषा नाम की पुत्री थी। उसने स्वपन में एक दिन श्रीकृष्ण के  पौत्र अनिरुद्ध  को  देखा और  उस  पर  मोहित  हो  गई। उसकी  एक  सहेली थी  जिसका  नाम था  चित्रलेखा जो कि योगिनी थी। योगिनी ने ऊषा के आदेश पर अनिरुद्ध  का  पता लगाया और उसे सोते हुए ही द्वारिका से  उठा कर  शोणितपुर ले आई। इस तरह से ऊषा ने अनिरुद्ध को अपने जाल में फंसा लिया। वे दोनों अंतापुर में विहार करने लगे। जब इस  बात का पता बाणासुर को चला तो उसने अनिरुद्ध को नागपाश में बांध लिया।
       उधर जब श्रीकृष्ण जी ने इस बात को जाना  तो  उन्होंने  बाणासुर की चार भुजाएं छोड़  कर बाकी  सभी  भुजाएं  काट कर उसका घमंड चकनाचूर कर दिया और अनिरुद्ध और ऊषा को लेकर वापिस द्वारिका आ गए।
                     नृग राजा को स्वर्ग भेजना
इक्ष्वाकु पुत्र नृग एक बहुत दानी राजा था।  एक  बार धोखे  से उसने एक ही गाए दो बार दान कर दी थी। यमराज ने पूछा कि तुमने बहुत पुण्य के कार्य किए हैं।  परंतु  एक  तुमने  पाप  भी किया है। तुम पहले पुण्य का फल  चाहते  हो  या  पाप  का ? राजा ने कहा कि पहले उसे पाप का  ही  फल  दे  दिया  जाए। यमराज की आज्ञा से उसे उसी समय गिरगिट बनना पड़ा। श्री कृष्ण जी ने उसे स्पर्श करके उसको पाप मुक्त किया और  उसे स्वर्ग में जाने की आज्ञा दी।
             पौंड्रिक, काशी राज और द्विविद का उद्धार
पौंड्रिक ने अपने आप को असली  वासुदेव  घोषित  कर  दिया और श्री कृष्ण जी को युद्ध की चुनौती दे डाली।  श्रीकृष्ण  जी ने युद्ध में उसका वध  कर  दिया।  उधर  काशी  नरेश  के  पुत्र सुदक्षिण ने कृत्या को श्रीकृष्ण  जी  को  मारने  के लिए भेजा। भगवान ने उस क्रित्या के पीछे सुदर्शन चक्र छोड़ दिया। कृत्या ने उल्टा सुदक्षिण  को ही मार दिया और सुदर्शन चक्र ने काशी को जला डाला। उधर द्विविद एक वानर था जो  भौमासुर  का सखा था। उसमें दस हज़ार हाथियों का बल था।  उसने  अपने मित्र का बदला लेने  के  लिए  आक्रमण  किया।  परंतु वह भी बलराम जी के हाथों मारा गया।
                  जरासंध और शिशुपाल का वध
     एक दिन जरासंध द्वारा कैदी बनाए गए राजाओं  का  एक  दूत द्वारिका में श्रीकृष्ण जी के पास आया।  उसने उनकी और से उनकी  स्वतंत्रता के लिए  सहायता  मांगी।  श्रीकृष्ण  जी ने दूत को  कहा कि शीघ्र ही वे कुछ करेंगे। उधर उनको नारद जी ने  आकर  सलाह  दी कि इंद्रप्रस्थ में युधिष्ठिर जी भगवान की प्राप्ति  के  लिए  राजसूय  यज्ञ  करना  चाहते  हैं।  आप  कृपा करके उनकी  इस  अभिलाषा  का अनुमोदन कीजिए।  उद्धव जी ने भी श्रीकृष्ण जी को  कहा कि वहां जाने से  राजाओं की स्वतंत्रता का कार्य भी सम्पन्न हो  जाएगा। इस लिए वहां जाना चाहिए।  श्री  कृष्ण जी  इंद्रप्रस्थ गए।  वहां  पर  उनका  बहुत आदर सत्कार हुआ।
    वहां से एक दिन श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन और भीम को अपने साथ लिया और तीनों ब्राह्मण वेश  में  जरासंध  के  पास  गए। उन्होंने राजा से द्वन्द युद्ध की याचना की।  जब  उसने  चुनौती स्वीकार कर ली तो भीम और जरासंध में द्वंद युद्ध हुआ।  कई दिन तक युद्ध होता रहा। कई  बार  भीम  ने  जरासंध  को  दो भागों में चीर कर विभाजित  कर  दिया।  परंतु  हर  बार  दोनों भाग फिर जुड़ जाते और वो जीवित होकर फिर से युद्ध करने लग जाता। एक दिन श्रीकृष्ण जी ने भीम को इशारा  करने  के लिए एक तिनके को बीच से  चीर  कर  उलटी  दिशा  में  फैंक दिया। भीम सेन इशारा समझ गए। इस बार उसने जरासंध को फिर से दो भागों में चीर कर बाईं दिशा वाला दाहिनी और दाईं दिशा वाला भाग  बाईं  दिशा  में  फैंक  दिया।  इसके  बाद  वो दोबारा जीवित नहीं हुआ।  जरासंध के मारे जाने के बाद सभी राजाओं को स्वतंत्र करवा दिया गया।
     जरासंध का वध करने के बाद श्रीकृष्ण, अर्जुन  और  भीम वापिस इंद्रप्रस्थ आ गए। राजसूय यज्ञ में बहुत बड़े  बड़े  ऋषि मुनि पधारे थे। परंतु फिर भी सभी ने  मिलकर   निर्णय  किया कि श्रीकृष्ण जी की ही सब से  पहले पूजा होनी चाहिए।  ऐसा इस लिए कि वे ही अग्र पूजा के असली अधिकारी हैं। वहां पर शिशुपाल भी था जो श्रीकृष्ण जी को शत्रु  मानता था।  वो इस लिए कि वो रुक्मिणी जी  से  विवाह  करना चाहता था।  परंतु श्री कृष्ण जी ने रुक्मिणी जी से विवाह कर  लिया  था।  दूसरा वह जरासंध का मित्र भी था। उसे श्रीकृष्ण जी की  अग्र  पूजा वाली बात पसंद नहीं आई और वह  उनको कई प्रकार के अप शब्दों से संबोधित  करने लगा।  उधर  शिशुपाल  श्रीकृष्ण  जी की बुआ का  लड़का  था  और  उनकी  बुआ  ने  श्रीकृष्ण  से  वचन  ले रक्खा था कि वो उसके सौ अपराध  क्षमा  कर  देंगे। वह जब सौ अपराध कर चुका था, उस समय भी  भगवान  ने  उसे  अवसर दिया  कि  वो  अपने  आप  पर  नियंत्रण कर  ले  परंतु  उसमें  कोई अंतर नहीं आया और  वो  श्रीकृष्ण  जी  के  विरूद्ध  और  भी अधिक  अप  शब्द  बोलने  लग  गया।  तब  भगवान  ने  अपना  सुदर्शन  चक्र  छोड़ा  और  शिशुपाल  का सिर धड़ से अलग कर दिया।  मरते  ही उसमें  से  एक ज्योति  निकल  कर  भगवान श्री कृष्ण जी में समा गई। 
                  दन्त्वक्र और विदुरथ का उद्धार
      अपने मित्र शिशुपाल और जरासंध के मारे  जाने  के  बाद दंतवक्र अकेला ही हाथ में गदा लेकर युद्ध  के  मैदान  में पहुंच गया। वह भी बहुत बलवान और अत्याचारी था। अत्याचारियों का अंत करने के लिए ही तो भगवान ने अवतार लिया था। श्री कृष्ण जी भी मैदान में आए और उससे युद्ध करते हुए उसका   वध कर दिया। शिशुपाल की ही तरह उसके  मरते  ही  सबके सामने उसके अंदर से एक ज्योति निकल कर श्रीकृष्ण में समा गई। दंतवक्र का भाई विदूरथ भी अपने भाई का बदला लेने के लिए आया परंतु वो भी भगवान के हाथों मारा गया।
            गोप, गोपियों एवं नंद, यशोदा जी से भेंट
    एक बार सर्वग्रास सूर्य ग्रहण लगा, जैसा कि प्रलय के समय
लगा करता है। सब लोग अपने अपने  कल्याण के  लिए  पुण्य आदि उपार्जन करने के लिए  सामान्य  पंचक तीर्थ कुरुक्षेत्र  में आए, जहां परशुराम जी ने  राजाओं की  रुधिर  धारा  से  पांच बड़े बड़े कुण्ड बना दिए थे।  भगवान परशुराम ने लोक मर्यादा की रक्षा के लिए वहीं पर बहुत बड़ा यज्ञ किया था।
    सभी यदुवंशी भी वहां आकर उपवास कर रहे थे।  वहां  पर यदुवंशियों के परम हितैषी बंधु नंद आदि गोप,  माता  यशोदा, एवं भगवान के दर्शन के लिए चिर काल से उत्कण्ठित गोपियां भी वहां पर आई हुई थीं। श्रीकृष्ण और बलराम  जी  ने  माता यशोदा तथा बाबा  नंद  जी  को  हृदय  से  लगाकर स्नेह प्राप्त किया और उनके चरणों में अपना  शीश  नवाकर उन्हें  प्रणाम किया। माता यशोदा ने चिर काल तक दोनों को अपनी  गोद में बैठा कर दुलार किया।
    गोपियों ने अपने नेत्रों के  रास्ते  भगवान  को अपने हृदय में धारण कर लिया। उनको अपने स्थूल शरीर  का तो पहले से ही कोई भान नहीं था, अब तो उनका लिंग शरीर  भी  नष्ट हो गया और वे भगवान से एक हो गईं। गोपियों की यह स्थिति  हो गई देख कर भगवान ने उन्हें ज्ञान  दिया।  उन्होंने  कहा," गोपिओ  कहीं तुम्हारे मन में यह आशंका तो नहीं  हो गई कि मैं अकृतज्ञ हूँ। निस्संदेह भगवान ही सब  प्राणियों  के  संयोग और  वियोग का कारण हैं। यह बड़े सौभाग्य की बात है  कि तुम  लोगों  को मेरा वह प्रेम प्राप्त हो चुका है जो मेरी ही प्राप्ति कराने वाला है
क्योंकि मेरे प्रति हुई प्रेम भक्ति  प्राणियों  को  अमृतत्व  अर्थात परमानंद धाम प्रदान करने में समर्थ है।  जितने  भी  पदार्थ  हैं उनके पहले, पीछे, बीच में  बाहर  और भीतर केवल मैं ही हूँ।
सभी प्राणियों के शरीर में पांचों  भूत (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) कारण रूप से स्थित हैं। परंतु मैं इन दोनों से परे अविनाशी सत्य हूँ। यह दोनों मेरे ही अंदर प्रतीत हो रहे हैं। तुम लोग ऐसा ही अनुभव करो।
    इसी उपदेश के बार बार स्मरण से गोपियों का  जीव कोश - लिंग शरीर पूर्णतया नष्ट हो गया और वे भगवान से एक ही हो गईं। वे भगवान को सर्वदा के लिए प्राप्त हो गईं।
    गोपियों ने कहा," हे कमलनाभ  जो  लोग  संसार के कुएं में गिरे हुए हैं उन्हें उससे निकालने के  लिए  आपके  चरण कमल ही एक मात्र अवलंबन हैं।  प्रभु  आप  ऐसी  कृपा  कीजिए कि आप का वह चरण कमल, घर गृहस्थ  के  काम करते रहने पर भी सदा सर्वदा हमारे हृदय में विराजमान रहे। हम एक क्षण के लिए भी उसे ना भूलें।
                        जय श्रीकृष्ण जी की
              

बुधवार, 25 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या 35(श्रीकृष्ण जी के अन्य विवाह)

                        स्यमंतक मणि की कथा
           (जांबवती और सत्यभामा के साथ विवाह)
सत्राजित, भगवान सूर्य का बहुत बड़ा  भक्त था।  सूर्य भगवान ने प्रसन्न होकर उसे स्यमंतक मणि दी थी। जब वह मणि लेकर द्वारिका जी में आ रहा था, वह मणि इतनी  चमक  रही थी कि द्वारिका वासियों ने समझा कि सूर्य  ही  द्वारिका  में  आ रहे हैं। अपने घर पहुंच कर सत्रजित ने मणि को मंदिर में स्थापित कर दिया। वह मणि प्रति दिन आठ भार सोना पैदा करती थी। एक दिन ऐसे ही प्रसंग वश श्रीकृष्ण ने उसे कह दिया कि वो अपनी मणि  महाराज उग्रसेन को भेंट कर दे।  परंतु  उसने  मना  कर दिया।  एक दिन  सत्राजित  के भाई  प्रसेन  ने  उसको  गले  में डाला और घोड़े पर सवार होकर शिकार खेलने  जंगल में चला गया।
एक सिंह ने घोड़े सहित  उसे  मार  डाला। उस सिंह  को  ऋक्ष राज ने मार दिया और मनी अपनी गुफ़ा  में  जाकर  बच्चों  को दे दी। सत्राजित ने अपने भाई के वापिस ना आने  पर श्रीकृष्ण जी पर शक किया। उसने सोचा कि कृष्ण  ने  मणि  राजा  को देने की बात की थी, इस लिए उन्होंने ही उसके भाई  को  मारा है। जब श्रीकृष्ण जी को इस बात का पता चला  तो  वो  अपने ऊपर लगे कलंक को धोने  और  सच्चाई  का  पता  लगाने  के लिए जंगल में गए। पदचिन्हों को देखते हुए भगवान ऋक्ष राज जांबवान की गुफा तक जा पहुंचे। बाकी लोग तो बाहर ही  रहे परंतु श्रीकृष्ण ने अकेले ही गुफ़ा के अंदर प्रवेश  किया।  अंदर श्रीकृष्ण  और  जांबवान में 12 दिन  तक  युद्ध  चला। अंत  में एक दिन जांबवान को  ध्यान  आया  कि इतने  दिनों  तक  जो मनुष्य  उसका  मुकाबला  कर  रहा  है  वह  सिवाए  भगवान  के और कोई नहीं हो सकता। उसे वह  त्रेता युग  की  बात याद आ गई। उस समय भगवान राम को जांबवान ने कहा  था  कि युद्ध में उसे अपना बल प्रयोग करने का अवसर ही नहीं मिला। तब इस पर भगवान राम  ने  कहा  था,"जब  मैं  द्वापर  युग  में कृष्ण अवतार लूंगा, उस समय मैं  तुम  से  युद्ध  करूंगा।  तब तुम्हें अपने बल  का  प्रयोग  करने का  पूरा  अवसर  मिलेगा।" उसने भगवान को पहचान  लिया और  उनको  प्रणाम  किया। भगवान ने उसे आशीर्वाद दिया। जांबवान ने मणि तो  भगवान को दी ही साथ में अपनी पुत्री जांबवती का विवाह भी श्रीकृष्ण जी से कर दिया। वापिस आकर श्रीकृष्ण जी ने  सत्राजित  को दरबार में  बुलवाया  और  उसे  मणि  लौटा  दी। सत्राजित  को अपनी गलती का अहसास हो गया और  उसने  अपनी  गलती स्वीकार भी कर ली। यह  सोचकर  कि  उसकी  पुत्री  के  लिए श्रीकृष्ण जी से बढ़कर कोई वर नहीं हो  सकता  उसने  अपनी कन्या सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण से कर दिया।
             श्रीकृष्ण जी  का कालिंदी जी से विवाह
एक बार भगवान पांडवों से  मिलने  इंद्रप्रस्थ  पधारे।  सात्यकी और बहुत सारे यदुवंशी भी उनके साथ पधारे। एक दिन यमुना जी के तट पर उन्होंने एक युवती को तपस्या करते  हुए  देखा। अर्जुन ने उस युवती से पूछा कि वो कौन  है  और  क्या चाहती हैं। कालिंदी ने कहा कि वह भगवान सूर्य देव की पुत्री  है  और भगवान विष्णु को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या कर रही है। जब तक भगवान कृष्ण उस पर  प्रसन्न  नहीं  होते  तब तक वह अपनी तपस्या करती रहेगी।  भगवान  कृष्ण  तो  सब जानते ही थे। उन्होंने प्रसन्न  होकर  उन्हें रथ  पर  बैठाया  और इंद्रप्रस्थ में धर्मराज युधिष्ठिर जी के पास  ले  आए।  कुछ  दिन रहने के बाद  जब  वापिस  द्वारिका  आए  तो  विधिवत  उनसे विवाह किया।
                         मित्रविंदा से विवाह
अवंती (उज्जैन) के राजा थे  विंद और अनुविंद।  उनकी  बहन मित्रविंदा  भगवान श्रीकष्ण जी  को पति रूप में  प्राप्त  करना चाहती थीं। परंतु उसके भाई ऐसा नहीं  चाहते थे।  जब उसका स्वयंवर हुआ तो श्रीकृष्ण बलपूर्वक उसे हर लाए।
                    सत्या (नग्नजिवी) से विवाह
कौशल देश के राजा की एक अत्यन्त धार्मिक कन्या थी। राजा की प्रतिज्ञा थी कि जो कोई उसके सात दुर्दांत बैलों पर  विजय प्राप्त कर लेगा, वही उस कन्या से  विवाह  करेगा। परंतु  कोई भी राजा ऐसा करने में सफल नहीं  हो सका था। श्री कृष्ण जी भी वहां गए। राजा ने उनका आदर सत्कार किया।  भगवान ने खेल ही खेल में उन सात बैलों को नाथ लिया और फिर  सत्या से विधिपूर्वक विवाह किया।
                  भद्रा से श्री कृष्ण जी का विवाह
कैकेय  देश  की  राजकुमारी  थी  भद्रा।  उसका विवाह उसके संतरदन आदि  भाइयों ने श्री कृष्ण जी  से  करने  का  प्रस्ताव रक्खा था जो कि श्रीकृष्ण जी ने स्वीकार किया और  विधिवत भद्रा से भी विवाह कर लिया।
                        लक्षमणा से विवाह
यह मद्र प्रदेश के राजा की कन्या थी। उन्हें भगवान  श्री  कृष्ण जी ने जीता और विधि पूर्वक उनसे विवाह संपन्न किया।                            भगवान श्रीकष्ण की संतति
इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण जी की कुल आठ पटरानियां थीं। आठों पटरानियों के दस दस पुत्र  हुए।  जिनमें मुख्य  नाम थे:-
प्रद्युम्न, भानु, सांब, वीर, श्रुत, कवि और सुबाहु। सबसे प्रमुख नाम  प्रद्युम्न  का  था।  उसकी  दो पत्नियां थीं, मायावती और रुकमवती। प्रद्युम्न का पुत्र हुआ अनिरुद्ध।
                    भौमासुर उद्धार और 16000
                        राज कन्याओं से विवाह             
भौमासुर ने वरुण का छत्र, माता अदिति के कुण्डल  और  मेरु पर्वत पर स्थित देवताओं का  मणि  पर्वत  नामक  स्थान  छीन लिया था। भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी  सत्यभामा  के  साथ गरुड़ पर सवार होकर भौमासुर की  राजधानी  प्राग्ज्योतिषपुर में गए। चारों ओर पहाड़ों की किलेबंदी थी। उसके  बाद  शस्त्रों का घेरा, फिर जल से भरी  गहरी  खाई  भी  थी,  उसके  बाद  आग या बिजली की चार दिवारी थी।  उसके भीतर वायु (गैस) को  बंद करके रक्खा गया था। उसके  भीतर  दस  हज़ार फंदे (जाल) भी  बिछा रक्खे थे।  भगवान ने  अपनी  शक्ति से  यह सारा कुछ नष्ट कर डाला। वहां पर एक दैत्य था जो उस स्थान का  रक्षक था। भगवान के पांचजन्य शंख की ध्वनि से उसकी नींद टूटी तो वह बाहर  निकला।  उसके  पांच  मुख थे  जिनके द्वारा  उसने भयंकर सिंघ नाद करते हुए  त्रिशूल  उठाया  और गरुड़ जी पर टूट पड़ा। तभी भगवान ने बाण छोड़ कर  त्रिशूल के तीन टुकड़े कर दिए। फिर श्रीकृष्ण  जी  ने  उसके  मुख  में बहुत से बाण मारे। खेल  ही खेल में  उसके  पांचों  सिर  काट  दिए।  उसके पुत्र और बाकी दैत्य भी मारे  गए।  दैत्य  के  मारे जाने के बाद स्वयं  भौमासुर  ने बाहर निकल कर भगवान  पर आक्रमण कर दिया परंतु  वह  भी  उनके  सामने  अधिक  देर  तक  टिक  नहीं  पाया और  शीघ्र  ही  भगवान  ने  उसका  भी सिर काट डाला।  उस  समय स्वयं पृथ्वी देवी  ने  भगवान  की स्तुति की। जब भगवान ने  महल  के  अंदर  प्रवेश  किया  तो  पहले उन 16000 राज कुमारी  कन्याओं  को उसकी  कैद से स्वतंत्र करवाया। उनको  देखते ही  सब की  सब  कन्याओं  ने  भगवान श्रीकृष्ण जी  पर  मोहित  हो कर  उनको  मन  ही मन अपना प्रियतम मानते हुए उनसे आग्रह  किया कि वो उन सभी को पत्नी रूप में स्वीकार करें।  श्रीकृष्ण जी ने  उनकी  विनती को स्वीकार करते हुए उन सभी को  द्वारिका  भेज  दिया  और स्वयं अमरावती  की  ओर  चल  पड़े।  अमरावती  पहुंचने  पर देवताओं के राजा इन्द्र ने भगवान की  स्तुति  की।  अदिति को उसके  कुण्डल  वापिस  किए।  सत्यभामा  जी  के  कहने  पर भगवान ने स्वर्ग से कल्प वृक्ष को साथ ले जाने के लिए उखाड़ कर गरुड़ पर रख लिया। जब देवताओं ने इसका विरोध किया तो उनको भी युद्ध में धूल चटाकर कल्प वृक्ष को साथ ले आए और सत्यभामा के बगीचे में लगा दिया। द्वारिका में  पहुंच  कर भगवान ने अपने अनेक  रूप  बना  कर  सभी  सोलह  हज़ार  कन्याओं के साथ पानी ग्रहण किया।
                           जय श्रीकृष्ण जी की

मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या 34(द्वारिका गमन एवं श्रीकृष्ण रुक्मिणी विवाह)

                          जरासंध से युद्ध
     कंस की दो रानियां अस्ति और प्राप्ति, कंस की  मृत्यु  होने के पश्चात अपने पिता मगध राज जरासंध के  पास  चली  गईं। क्रोध में राजा जरासंध ने 23 अक्षोहिनी  सेना  लेकर मथुरा को घेर लिया। उधर भगवान की आज्ञा से प्रेरित होकर  आकाश से सूर्य के समान चमकते हुए  दो  रथ, युद्ध  की  सारी  सामग्रियों और सार्थिओं समेत, आ पहुंचे।  भगवान  के  सारे  दिव्य और सनातन आयुध भी अपने आप वहां आकर  उपस्थित  हो गए। अब दोनों भाइयों  ने कवच  धारण  किए।  वे  छोटी  सी  सेना लेकर मथुरा से निकले। दारुक भगवान कृष्ण  का  सारथी था। तब भगवान ने  अपना पांचजन्य शंख बजाया।  शंख की ध्वनि ने शत्रु को डरा दिया। भगवान ने शारंग धनुष का टंकार किया।
तरकश में से बाण निकाल  कर, उन्हें धनुष पर  चढ़ाकर,  झुंड के झुंड बाण छोड़ते हुए जरासंध की चतुरंगिनी सेना का संहार करने लगे। बलराम जी  ने अपने मूसल की चोट  से  बहुतों को मार दिया। दोनों भाइयों ने थोड़े ही समय में शत्रु  सेना  को नष्ट कर डाला। जरासंध को मारा नहीं अपितु  एक  दीन  कि भांति छोड़ दिया। इससे उसे बहुत लज्जा हुई और  उसने  सब  कुछ छोड़ कर तपस्या करने की सोची।  परंतु  दूसरों के  बहकावे में आकर तपस्या करने का विचार छोड़ कर  वापिस  मगध  चला गया। इधर मथुरा में विजय उत्सव मनाया गया।
     उधर जरासंध ने दोबारा  से नई सेना तैयार  की  और  फिर उसी तरह आक्रमण किया  जिसका परिणाम  भी  पहले वाला ही  निकला।  इस  तरह  17 बार  23 अक्षौहिणी  सेना  लेकर जरासंध ने आक्रमण किया और हर बार सारी की  सारी  सेना का संहार भगवान द्वारा किया गया  परंतु हर बार  जरासंध को छोड़ दिया। ऐसा बताया गया है कि भगवान उसको  इस  लिए छोड़ देते थे ताकि वो बार बार पापियों की सेना इकट्ठी  कर के लाए और उन सभी पापियों को समाप्त किया जा सके जिसके लिए भगवान ने अवतार लिया था।
                    काल्यवन का भस्म होना
     जब अठहरवां संग्राम छिड़ने वाला था, तभी  नारद  जी की प्रेरणा से एक बहुत शक्तिशाली  योद्धा  काल्यवन  जिसका पूरे संसार में कोई मुकाबला नहीं कर सकता था, वह  तीन  करोड़ मलेछों की सेना लेकर मथुरा को घेरने आ गया।  दोनों  भाईयों ने यह सोच कर कि दो दो शत्रु इकट्ठे आक्रमण कर  रहे हैं, वहां से अपनी प्रजा को कहीं दूर सुरक्षित  स्थान पर ले जाने को  ही उचित माना। इसी उद्देश्य से विश्वकर्मा जी को कह कर  उन्होंने द्वारिका पुरी का निर्माण  करवाया।  सारे  सगे  संबंधियों  और प्रजा को पहले ही द्वारिका पुरी  में  भेज दिया।  उनकी  सुरक्षा का उत्तरदायित्व बलराम जी को सौंप कर काल्यवन द्वारा युद्ध के लिए ललकारने पर भगवान स्वयं गले में कमलों  की  माला पहने हुए, बिना  कोई  अस्त्र  शस्त्र  धारण  किए  नगर  के बड़े दरवाजे से बाहर निकल आए। काल्यवन  ने पहचान लिया कि यही कृष्ण है और निश्चय किया कि यदि  यह बिना  अस्त्र शस्त्र के पैदल ही आ रहा है तो वह भी बिना अस्त्र शस्त्र के पैदल ही मुकाबला करेगा। जब वह कृष्ण  की ओर  दौड़ा  तो  श्रीकृष्ण दूसरी ओर मुख करके दौड़ पड़े।  उसने सोचा कि श्रीकृष्ण डर कर भाग रहे हैं। वह चिल्लाता हुआ और  युद्ध कर - युद्ध कर कहता हुआ श्रीकृष्ण जी के पीछे पीछे दौड़ा।  श्रीकृष्ण भागते भागते उसे एक पहाड़ी की गुफ़ा में ले गए।  वह समझ रहा था कि कृष्ण डर कर छिपे हुए हैं। अंदर जाकर उसने  एक  व्यक्ति को सोता हुआ  देखा  जिसके  ऊपर  भगवान ने  अपना  वस्त्र डाल  दिया था। उसने सोचा कि यही कृष्ण है। उसने  उसे  यह कहते हुए कि " अरे कृष्ण,  तू डर कर भाग  रहा  था और अब यहां आकार सोने का बहाना कर रहा है। तू जानता  है  कि  मैं सोए हुए शत्रु पर  वार  नहीं  करता।  उठ और  मेरे  साथ  युद्ध कर।" ज़ोर ज़ोर से उस व्यक्ति को हिला कर  जगा  दिया। जैसे ही उस व्यक्ति ने उठ कर उसकी और देखा वैसे ही  काल्यवन  जल कर भस्म हो गया।
                            मुचकुंद की कथा
     परीक्षित जी के पूछने पर कि वह व्यक्ति कौन था,  शुकदेव जी ने बताया कि वह इक्ष्वाकु वंशी महाराजा मान्धाता  का पुत्र मुचकुंद था। एक बार जब  उन्होंने बहुत  समय तक राक्षसों से देवताओं की रक्षा  की  थी।  जब  कार्तिकेय  जी  देवताओं  के सेनापति  बन गए तो देवता  सुरक्षित  हो गए। तब देवताओं ने राजा को पुरस्कार  स्वरूप  कोई  वर  मांगने  को  कहा।  राजा ने कहा कि मैं युद्ध करता करता बहुत  थक गया हूँ।  इस लिए मुझे देर तक सोते रहने का वरदान दो। देवताओं ने कहा जाओ किसी सुरक्षित स्थान पर जाकर सो जाओ।  जो कोई  भी तुम्हें जगाएगा वह तुम्हारी दृष्टि उस पर पड़ते ही भस्म  हो  जाएगा। तब से वह राजा  उसी  गुफ़ा  में  सोया  हुआ था। काल्यवन के भस्म हो जाने के बाद श्रीकृष्ण जी ने प्रकट होकर मुचकुंद जी  को दर्शन दिए और  अगले  जन्म  में  मोक्ष  का  वरदान  देकर तपस्या करने भेज दिया।
                          श्रीकृष्ण द्वारिका गमन
     काल्यवन के भस्म हो जाने के बाद  श्रीकृष्ण  मथुरा  लौटे। काल्यवन की सेना का संहार किया और उनका सारा धन छीन कर द्वारिका लौट चले। उसी समय जरासंध  ने  अठाहरवीं बार आक्रमण कर दिया। श्रीकृष्ण पैदल ही भागे जैसे  डर  गए हों। भागते हुए वे प्रवर्षण पर्वत पर चढ़ गए। उस पर्वत को जरासंध ने आग लगा दी। वहां से भी दोनों भाई भाग निकले  और फिर द्वारिका पहुंच गए। जरासंध ने सोचा कि वे आग  में  जल  कर भस्म हो गए हैं। ऐसा सोच कर वो वापिस मगध चला गया।
                         बलराम रेवती विवाह
     पूर्व काल में एक राजा हुए कुकुद्मी (रैवत)। वो ब्रह्मा जी के पास यह जानने के लिए पहुंच गए कि उनकी कन्या  रेवती का वर कैसा होगा। पृथ्वी और ब्रह्मलोक के  समय  में  बहुत अंतर है। ब्रह्मा जी ने हंसते हुए कहा कि जब से तुम  आए  हो  पृथ्वी पर तो 27 चतर्युगी बीत चुकी है। अब  तुम  ऐसा करो  कि इस समय भगवान ने बलराम के  रूप में  अंशावतार  लिया है, तुम जाकर उनसे अपनी कन्या का विवाह कर दो।  कुकुद्मि (रैवत) ने ऐसा ही किया और श्री बलराम  जी  से  अपनी  कन्या रेवती का विवाह कर दिया और स्वयं तपस्या करने बद्रीक  आश्रम में चले गए।
                       श्रीकृष्ण रुक्मिणी विवाह
     विदर्भ देश के राजा थे भीष्मक। उसके पांच पुत्र और एक कन्या थी। उसके बड़े पुत्र का नाम था रुक्मी। कन्या का नाम था रुक्मिणी जो स्वयं भगवती लक्ष्मी जी का ही अवतार थीं। रुक्मिणी जी ने श्रीकृष्ण जी की लीलाओं के बारे में सुन रक्खा था। वो मन ही मन उनसे प्रेम करती थीं और उन्हें अपना पति मान रक्खा था। परंतु रुक्मिणी जी का बड़ा भाई रुक्मी कृष्ण जी से द्वेष करता था। वह रुक्मिणी जी का विवाह चेदि नरेश राजा दमघोष के पुत्र शिशुपाल से करना चाहता था। रुक्मिणी जी के माता पिता तो बेटी की भावनाओं को समझते थे परंतु रुक्मी ने ठान लिया था कि रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से ही होगा।
     रुक्मिणी उदास हो  गईं  और उन्होंने  एक ब्राह्मण के हाथ श्रीकृष्ण जी को एक संदेश भेजा। संदेश  में  लिखा  था,"आप के गुणों को सुनने वाले के अंग अंग के ताप मिट जाते हैं  और जन्म जन्म की जलन बुझ जाती है।  मेरा  चित्त  लज्जा  छोड़  आप में ही प्रवेश कर रहा है। आप अद्वितीय हैं।  मैंने  आपको पति रूप से वरण कर लिया है। मैं आपको आत्म समर्पण कर चुकी हूँ।  दूसरा कोई पुरुष मेरा  स्पर्श ना  कर  सके  इस  लिए आप मेरे विवाह से एक दिन पूर्व गुप्त रूप  से  आ जाइए और शिशुपाल और जरासंध की सेना को  मथ डालिए।  मैं आपको गिरिजा देवी के मंदिर में मिलूंगी।" तभी श्रीकृष्ण जी ने सारथी दारूक को बुलवाया और शीघ्र गामी घोड़ों  वाले रथ  पर  एक ही रात में वहां पहुंच गए। बारात  कुंडिनपुर  पहुंची।  जरासंध, दंतवक्र, विदूरथ आदि भी अपनी अपनी सेना लेकर  शिशुपाल के साथ पहुंचे थे। जब बलराम जी को इस बात का पता  चला तो वो भी उनके पीछे पीछे चल पड़े। भीष्मिक  द्वारा  श्रीकृष्ण जी का सत्कार किया गया। उन्हें एक  सुंदर  भवन में  ठहराया गया। जब रुक्मिणी जी मंदिर गईं तो वहां  से श्रीकृष्ण  ने उन्हें रथ में बैठा लिया और सबके सामने बलपूर्वक लेकर चल दिए।   शिशुपाल, उसके साथी राजा और रुक्मी ने उनके साथ युद्ध किया परंतु कृष्ण और बलराम  जी के  सामने  उनकी  एक ना चली। द्वारिका पहुंचकर श्रीकृष्ण जी का रुक्मिणी जी के साथ विधिवत् विवाह सम्पन्न हुआ।
                प्रद्युम्न का जन्म और शंबरासुर वध
     श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी का पुत्र हुआ प्रद्युम्न। प्रद्युम्न के रूप में कामदेव ने ही जन्म लिया  था। जब  भगवान  शिव  के क्रोध से कामदेव देह रहित हो गए थे तब रती जो  कामदेव की पत्नी थी के शिवजी से प्रार्थना और अनुनय  विनय  करने  पर शिवजी महाराज ने उसे वरदान दिया था कि  द्वापर में  जब श्री कृष्ण अवतार होगा तब  कामदेव  उनके  पुत्र  के रूप में जन्म लेकर शरीर प्राप्त करेंगे।
     उधर उसी समय में एक मायावी राक्षस था  शंबरासुर।  वह बहुत बलवान था जो किसी से नहीं मरता था। उसको  पता था कि उसका वध श्रीकृष्ण  जी  के  पुत्र  प्रद्युम्न  द्वारा  होगा। वह जन्म लेते ही उसे समाप्त कर देना चाहता था।  उसने  छोटे  से प्रद्युम्न को अपनी माया से उठा कर समुद्र में फैंक दिया।  परंतु भगवान की माया तो अपरम्पार है। उस बालक को  एक  बड़ी मछली ने निगल लिया। और भगवान की माया  से  प्रेरित  एक मछुआरा उसे पकड़ कर शंबरासुर की रसोई में ले आया।  वहां एक दासी थी मायावती जो कि वास्तव  में  कामदेव  की पत्नी रती ही थी। वो दासी सब जानती  थी। उसने  उस  बालक  को निकाला जो भगवान की माया से पूरी तरह सुरक्षित था। दासी ने उस बालक को पाला और सब प्रकार की विद्याओं में उसको पारंगत किया। इसी बालक  ने  शंबरासुर का  वध  किया। तब मायावती आकाश मार्ग से प्रद्युम्न को द्वारिकापुरी लेकर  आई। वहां पर नारद  की  ने  प्रकट  होकर  सबको  बताया  कि  यही प्रद्युम्न है। सभी ने  उनका  पूरा  सम्मान  और  सत्कार  किया। भगवान के अन्य विवाह कहां कहां और कैसे हुए, अगले  लेख में पढ़ें।
                        जय श्रीकृष्ण जी की

   
   

सोमवार, 23 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या 33(गोपियों का विरह और उद्धव जी की व्रज यात्रा)

                   श्रीकृष्ण बलराम शिक्षा ग्रहण  
      वसुदेव जी ने अपने पुरोहित श्री गर्गाचार्य जी से दोनों पुत्रों का विधिवत यज्ञोपवीत संस्कार करवाया।  उसके  बाद  उनको गुरुकुल में निवास करने के लिए काष्यपगोत्री संदीपनी मुनि के पास भेजा जो आवंतिपुर (उज्जैन) में  रहते  थे।  उन्होंने अपने गुरुजी से  केवल 64 दिन  रात में पूरी की पूरी 64 कलाएं जैसे गान, वाद्य, नाट्य, चित्रकारी  आदि  सीख लीं। अपने गुरु द्वारा बताई गई गुरु दक्षिणा  देने  के  उपरांत वापिस मथुरा आ गए।
                      उद्धव जी की व्रज यात्रा
     उद्धव जी वृष्णिवंशियों में एक प्रधान पुरुष थे और साक्षात
बृहस्पति जी के शिष्य एवं परम बुद्धिमान थे। वह श्रीकृष्ण जी के प्यारे भक्त, सखा, एकान्त प्रेमी एवं मंत्री थे। वह बहुत  बड़े तत्व ज्ञानी और बुद्धिमान थे।
     एक दिन श्रीकृष्ण जी वृंदावन  की ओर मुख करके  उदास मुद्रा में ऐसे बैठे हुए थे जैसे उनको  वृंदावन की  गोधूलि का वो समय याद आ रहा हो जब वो  शाम  के  समय  गायों को  चरा कर वापिस घर आते थे। गांव की  सभी  ग्वालिनें  और  घर  में उनकी माता यशोदा उनका इंतजार कर रही होती थीं। भगवान प्रेम के वशीभूत होकर उन सभी लोगों को स्मरण कर  रहे  थे। उसी समय उधव जी का आना हुआ।  उन्होंने जब  भगवान से उदासी का कारण पूछा तो श्रीकृष्ण  जी ने उनको गोपियों और उनके माता पिता के  प्रेम  और  विरह के  बारे  में  बताया और कहा कि," मित्र व्रज जाओ, मेरे माता पिता को  आनंदित करो और गोपियों की विरह व्याधि मेरा संदेश  सुनाकर  दूर  करो।"
उद्धव जी तो पूर्ण ज्ञानी थे। उनको प्रेम का  क्या  पता  था। वो तो यह समझ रहे थे  कि  बेचारी  गोपियों  को  ज्ञान  की  परम आवश्यकता है। परंतु  भगवान  उद्धव  जी  को  सच्चे  प्रेम का पाठ पढ़ाना चाहते थे। वो  उनके  ज्ञान  का  अभिमान  भी  दूर करना चाहते थे। उद्धव जी ने कहा कि," मैं अभी जाता हूँ और उनको तत्व ज्ञान देकर उनकी विरह वेदना को समाप्त  कर  के शीघ्र वापिस आता हूँ। आप मुझे वहां जाने की आज्ञा दें।"
     रथ पर सवार होकर उद्धव जी नंद गांव  की ओर चल पड़े। जब वहां पहुंचे तो सूर्यास्त का  समय था।  गौएं लौट रही  थीं। गोधूलि उड़ रही थी। घर घर में गाएं  दुही जाने  लगी  थीं। गोप श्रीकृष्ण जी की लीलाएं गा रहे थे।
     उद्धव जी सीधे नंद बाबा के घर गए। नंद  बाबा  उन्हें  मिल कर बड़े प्रसन्न हुए। उनका  स्वागत  सत्कार  किया  गया  और खाना खिलाने के पश्चात कुशल क्षेम पूछी गई। नंद जी पूछ रहे थे कि क्या हमारा लाल हमें याद करता  है  या  नहीं।  स्वयं  ही कान्हा की लीलाओं का वर्णन करने लगे।  प्रेम  और  वात्सल्य भाव की बाढ़ सी आ गई। माता यशोदा की आंखों से  लगातार आंसू बह रहे थे। उद्धव जी यह सब देख कर आनन्द  मग्न  हो गए। उन्होंने दोनों को समझाया कि श्रीकृष्ण, भगवान्  हैं  और सर्वव्यापक हैं। कई प्रकार  से  उनके  बारे  में बड़ी  बड़ी   बातें बताई गईं। परंतु नंद बाबा और यशोदा के मन  में  उनके  लिए वही पुत्र भाव और वात्सल्य का समुद्र आंसुओं की धाराएं बन कर उनकी आंखों के रास्ते बह रहा है। उद्धव  जी ने  कहा  कि थोड़े ही दिनों में भगवान श्रीकृष्ण जी आप को आनंदित करने आएंगे। बातें करते करते यूं ही रात बीत गई।
     कुछ रात शेष रहने पर गोपियों ने उठ कर दीपक  जलाए,  वास्तुदेवता का पूजन कर सफाई करी और  दही  मथा।  सभी गोपियां यह सारा काम करती हुई साथ साथ श्री कृष्ण जी की लीलाओं को याद कर रही थीं।
     जैसे ही सूर्य उदय हुआ, उन्हें नंद जी के द्वार पर एक  सोने का रथ दिखाई दिया। किसी ने कहा कहीं  फिर  से  अक्रूर  तो नहीं आ गया। दूसरी ने कहा अब क्या लेने आया है। तीसरी  ने कहा अब क्या हमें लेजाकर कंस का पिंड दान करवाएगा।  वो यह बातें कर ही रही थीं कि उद्धव जी नित्य क्रिया से निवृत्त हो कर उधर आ पहुंचे।
                उद्धव और गोपियों की बातचीत
                          और भ्रमर गीत
     गोपियां सोच रही थीं कि यह  श्रीकृष्ण  जी  जैसी  आकृति वाला व्यक्ति कौन है। जैसे ही उद्धव जी उनके पास आए तो वे उन्हें घेर कर खड़ी हो गईं। जब पता  चला  कि  वो  कृष्ण  का संदेश लेकर आए हैं तब उन्होंने उनका अत्यन्त सत्कार किया। उन्होंने उनको आसन पर बैठाया और कहने लगीं:-
     हम जानती हैं, हे यदुनाथ के  पार्षद, आप  श्याम सुंदर का संदेश लेकर पधारे हैं। उन्होंने माता यशोदा और  पिता  नंद जी को सुख देने के लिए आपको यहां भेजा है।  परंतु  हमारे  साथ उनका प्रेम तो केवल स्वार्थ का ही था जैसे भौरों का  पुष्पों  से होता है। गोपियों के मन, वाणी और शरीर पूरी  तरह  श्रीकृष्ण में तल्लीन थे। वे श्रीकृष्ण की  सारी  लीलाओं  का  गान  करने लगीं और फिर आत्मविस्मृत हो कर रोने लगीं। एक गोपी  एक भौरे को गुन गुनाते हुए देख कर समझी कि जैसे श्रीकृष्ण ने ही उस भंवरे को उन्हें मनाने के लिए भेजा है। वो  कहने  लगीं कि तू भी तो कृष्ण जैसा ही कपटी है। उसने भी तो हमें  छोड़  कर मथुरा वासियों से नेह लगा लिया है। परंतु यदि तू कहे  कि  हम उसकी चर्चा क्यों करते हैं, तो सुन हम सच  कहती  हैं कि एक बार जिसको उससे प्रेम हो जाए वह उसे छोड़ नहीं  पाता। तूने कहना ही है तो कुछ और कह। अच्छा यह तो बता कि क्या वो कभी हम दासियों की भी बात करते हैं। क्या फिर से कोई ऐसा अवसर आएगा जब वो लौट कर हमारे पास आएंगे।
     उनकी तड़प देख कर उद्धव जी ने श्रीकृष्ण  जी का  संदेश सुनाया। उन्होंने कहा कि मैं श्रीकृष्ण जी  का  संदेश  लेकर  ही तुम्हारे पास आया हूँ।  भगवान  ने  तुम्हारे  लिए  कहा  है  कि,
"मुझसे तुम्हारा कभी वियोग नहीं हो सकता। जैसे सारे के सारे भौतिक पदार्थों में पञ्च भूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल  और पृथ्वी) व्याप्त हैं, वैसे ही मैं मन, प्राण, पञ्च भूत, इन्द्रियां  और उनके विषयों का आश्रय हूँ।  वे  मुझमें  हैं  और  मैं उनमें हूँ। मैं स्वयं ही उनका रूप होकर  उनका  आश्रय  बन  जाता  हूँ।  मैं नमित्त बन कर अपने आप को रचता हूँ, पालता हूँ  और  फिर समेट लेता हूँ। आत्मा माया और माया के कार्यों से  प्रथक  है। वह विशुद्ध, ज्ञान स्वरूप, जड़ प्रकृति, अनेक जीव तथा  अपने ही अवांतर भेदों से रहित सर्वदा शुद्ध है। माया  की  कुल  तीन वृत्तियां  हैं:-  सुषुप्ती,  स्वपन  और  जागृत।  इनके  द्वारा  वही अखंड अनन्त बोध स्वरूप  आत्मा  कभी  प्राज्ञ,  कभी  तैजस और कभी विश्व रूप से प्रतीत होता है।
     जागृत अवस्था में इन्द्रियों के विषय भी स्वपन की तरह  ही मिथ्या होते हैं। इस लिए विषयों की बजाए मनुष्य  को  चाहिए कि वह मेरा साक्षात्कार करे।
     मैं तुम से दूर इस लिए हूँ कि  तुम  निरंतर  मेरा  ध्यान  कर सको। तुम लोग मेरा अनुस्मरण करोगी, तब  शीघ्र  ही सदा  के लिए मुझे प्राप्त हो जाओगी।"
     श्री शुकदेव जी कहते हैं कि यह सुनकर गोपियों  को  बड़ा आनंद हुआ। प्रेम से  भरकर  उन्होंने  उद्धव जी  से  कहा,"यदु वंशियों को सताने वाला  कंस  मारा  गया, अच्छा  हुआ।  परंतु क्या अब वो कभी हमारे पास आवेंगे? वैसे तो संसार में  किसी से आशा ना रखना ही सब से बड़ा  सुख  है, परंतु  यह  जानते हुए भी हम कृष्ण के लौटने की आशा  छोड़ने  में  असमर्थ  हैं। यही आशा तो हमारा जीवन है। हम करें भी तो क्या करें। यहां के कण कण में हमें वही दिखाई देते हैं।
     हे कृष्ण हमारे तो तुम ही व्रज नाथ हो। तुम ही हमारे सच्चे स्वामी हो। तुम्हारा यह सारा गोकुल जिसमें तुम्हारे माता पिता, ग्वाल बाल, गऊएं और गोपियां सभी हैं, दुःख के  अपार सागर में डूब रहा है। तुम हमें बचाओ, आओ!  हमारी  रक्षा  करो। हे गोविन्द हम डूब रही हैं, हमारी रक्षा करो।
     श्री शुकदेव जी कहते हैं कि जब श्रीकृष्ण जी के संदेश  के प्रभाव से विरह की व्यथा शांत हुई तो वे इन्द्र्यतीत भाग्वान श्री कृष्ण को अपने आत्मा के रूप  में  सर्वत्र  स्थित  समझ  चुकी थीं। तब वे उद्धव जी का और भी सत्कार  करने  लगीं।  उद्धव जी, जो कुछ  समय  के  लिए  संदेश  देकर उन्हें शांत करने के भाव से आए थे, कई महीनों तक वहीं रहे। वे श्री कृष्ण जी की लीलाएं सुनाकर  ब्रजवासियों को आनंदित करते रहते थे और  श्रीकृष्ण द्वारा व्रज में की गई लीलाओं को सुन कर  स्वयं  भी  आनंदित होते रहे।
एक दिन गोपियों का कृष्ण  जी  के  प्रति  प्रेम  देखकर  कहने लगे:-
     शरीर धारण गोपियों का, सफल एवं श्रेष्ठ है।
     प्रेम के इस भाव में ही, स्थित हो जाना श्रेष्ठ है।।
     तप, तपस्या, यज्ञ का, अभिमान कोई ना करे।
     गोपियों के प्रेम का, इक भाव उनसे श्रेष्ठ है।।
     ज्ञान अमृत का ना हो, फिर भी अमर करता है वो।
     सरल मन और भाव से, गोविंद भज ले श्रेष्ठ है।।
     कथा, कीर्तन, भजन से ही, रास सुख मिलता सदा।
     भाव भक्ति प्रेम से, गोपी हो जाना श्रेष्ठ है।।
     मुझको भी, झाड़ी - लता, व्रज की बना देना प्रभु।
     गोपियों की चरण धूलि, हर तरह से श्रेष्ठ है।।
     वेद वाणी और श्रुतिएं, ढूंढती अब तक जिन्हें।
     गोपियों ने पा लिया, पाने को को भी श्रेष्ठ है।।
     गोपियों की चरण धूलि, को मेरा प्रणाम है।
     कृष्ण लीला गान उनका, हर तरह से श्रेष्ठ है।।
 इतना कहकर उद्धव जी सबसे  आज्ञा  लेने  लगे।  गोपियों  ने संदेश दिया कि हमें अब मोक्ष नहीं चाहिए  अपितु हमें  जो  भी जीवन मिले उसमें केवल और केवल श्रीकृष्ण में  ही  उत्तरोत्तर प्रीति बढ़ती रहे। सभी व्रज वासियों से विदा लेकर उद्धव जी ने मथुरा की ओर प्रस्थान किया। वहां पहुंचकर  श्रीकृष्ण  जी को प्रणाम किया और व्रज में जो देखा और समझा  वह सारा  कह सुनाया।
     इस कथा को पढ़ने वा सुनने से साधक के मन में भक्ति का भाव और भी प्रगाढ़ हो जाता है।
                        जय श्रीकृष्ण जी की