गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या 26(श्रीकृष्ण प्राकट्य)

       पिछले लेख में आपने पढ़ा था  कि किस  प्रकार  कंस  ने देवकी और वसुदेव जी  को  कारागार  में डाल  दिया था  और उनके प्रथम पुत्र को मार डाला था। अब आगे पढ़ें।
        देवकी का सातवां गर्भ रोहणी के गर्भ में स्थापित
       कंस ने एक एक करके देवकी के छ: पुत्रों को मार डाला। देवकी के सातवें गर्भ के रूप में  स्वयं  श्री शेषनाग  जी  पधारे, जिन्हें अनन्त भी कहा जाता है। भगवान  की आज्ञा से ही योग माया के द्वारा देवकी के सातवें  गर्भ को गोकुल में  रोहिणी  के गर्भ में स्थापित कर दिया गया, जिससे रोहिणी के पुत्र बलराम जी का जन्म हुआ। इनको देवकी के गर्भ से  रोहिणी के गर्भ में स्थापित करने के कारण ही संकर्षण नाम भी दिया गया। लोगों ने समझा कि देवकी का सातवां गर्भ नष्ट हो गया है।
        योगमाया का यशोदा की कन्या के रूप में जन्म
       उधर भगवान ने योग माया को आज्ञा दी कि  तुम यशोदा जी के गर्भ से जन्म लेना। उसके बाद तुम  लोगों को  मुंह मांगे वरदान देने में सामर्थ होंगी। मनुष्य तुम्हारी  पूजा करेंगे,  पृथ्वी पर तुम्हारे बहुत से स्थान बनाएंगे  और  तुम्हें  दुर्गा,  भद्रकाली, विजया,  वैष्णवी,  कुमुदा,  चंडिका,  कृष्णा,  माधवी,  कन्या, माया, नारायणी, ईशानी, शारदा और अंबिका आदि  कई नामों से पुकारा जाएगा।
                     भगवान का गर्भ प्रवेश
       इधर सारे जगत के मालिक ने माता देवकी, जिन्होंने  पूर्व जन्म में घोर तपस्या  की  थी, उनके  गर्भ  को  अपना  निवास स्थान बना लिया। उसी समय देवकी जी  का  शरीर प्रकाशमय हो गया। भगवान शंकर, ब्रह्मा जी और दूसरे देवता कैदखाने में आकर गर्भस्थ भगवान की स्तुति करने लगे:-
          ब्रह्माजी, शंकर जी और देवताओं द्वारा स्तुति
       " हे परम पुरुषोत्तम भगवान आप सत्य संकल्प हैं।  आप सर्वव्यापक हैं, अन्तर्यामी रूप से पृथ्वी, जल,  तेज  वायु  और आकाश  में  विराजमान हैं। आप  दृश्यमान  जगत के  परमार्थ स्वरूप हैं।  आप मधुर वाणी  और  सम दर्शन  के  प्रवर्तक  हैं। आप तो बस सत्य स्वरूप ही हैं। हम आपकी शरण में आए हैं।
       संसार एक सनातन वृक्ष है। इस वृक्ष  का आश्रय  है  एक प्रकृति। इस वृक्ष के दो फल हैं, सुख और  दुःख।  इसकी  तीन जड़ें  हैं, सत्व, रज  और  तम।  इसके  चार  रस हैं - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इसके ज्ञान प्राप्त  करने  के  पांच  प्रकार  हैं - श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और नासिका।  इसके छ: स्वभाव  हैं - पैदा होना, रहना, बढ़ना, बदलना, घटना  और  नष्ट हो  जाना। इसकी  छाल  हैं  सात  धातुएं - रस रुधिर,  मांस,  मेद, अस्थि माज्जा  और  शुक्र।  इसकी  आठ शाखाएं हैं - पांच महा भूत, मन  और अहंकार।  नौ द्वार - नेत्र,  नासिका,  कान, मुख, गुदा और  जननेन्द्रिय  अंग  इसके नौ खोडर हैं। इसके दस पत्ते हैं - प्राण,  अपान,  व्यान,  उदान,  समान,  नाग (डकारना),  कूर्म (झपकना),  छींकना,  जम्हाई,  और  धनंजय  ( दिल के वाल्व खुलता  व  बंद होना)  अर्थात  पांच  प्राण और पांच उप प्राण।
इस पर दो पक्षी बैठे हैं - जीव और ईश्वर।
       इस संसार रूपी वृक्ष की उत्पत्ति का आधार आप  ही  हैं।
इसकी रक्षा आप ही के अनुग्रह से होती है। और इसकी प्रलय भी आप में ही होती है।
       इस लिए तत्व ज्ञानी सब में  आपका  ही दर्शन  करते  हैं। केवल भक्ति और आपकी कृपा से ही आप की प्राप्ति होती है। आप  अजन्मा  हैं।  फिर  भी  पृथ्वी  पर  आकर अवतार लेना आपका एक लीला विनोद है।"
                      सारी प्रकृति की प्रसन्नता
       जब  भगवान  श्रीकृष्ण  का  प्राकट्य  होने  वाला  था तो समस्त  शुभ  गुणों  से युक्त सुहावना समय आया। आकाश के सभी नक्षत्र, ग्रह और तारे शांत  और  सौम्य  हो  रहे  थे।  जैसे अंत: करण शुद्ध होने पर उसमें भगवान  का  आविर्भाव  होता है, उसी प्रकार समष्टि की शुद्धि का वर्णन किया गया है। इसमें काल,  दिशा,  पृथ्वी,  जल,  अग्नि,  वायु, आकाश,  मन  और आत्मा इन नौ द्रव्यों का नाम उल्लेख  करके  साधक  के  लिए एक अत्यंत उपयोगी साधन पद्धति की ओर संकेत किया गया है।
       काल ने तब  श्रीकृष्ण जी  के  स्वागत  में  समस्त  सद्गुणों को  धारण  कर  लिया।  सभी  दिशाएं  प्रसन्न  हो  गईं।  पृथ्वी पतिदेव का स्वागत करने चलीं।  सभी  नदियां  आनन्द  से भर गईं। अग्निदेव भी प्रसन्न होकर प्रज्वलित हो उठे। वायु  सबकी सेवा करने लगा। आकाश श्रीकृष्ण जी का स्वागत करने लगा। रोहिणी नक्षत्र में जन्म होगा यह सोचकर सारे  नक्षत्र बहुत  ही खुश थे। वे आनंदित हो उठे। भाद्रमास  कल्याण  करने  वाला है। कृष्ण पक्ष स्वयं कृष्ण से संबंधित है। अष्टमी  तिथि  पक्ष के बीच  संधि स्थल पर पड़ती है  और रात्रि  योगीजनों  को  बहुत प्रिय है। निशीध, रात्रि  के  दो भागों  की संधि  है।  उस   समय श्रीकृष्ण के आविर्भाव का अर्थ है अज्ञान के अंधकार में ' दिव्य प्रकाश '।
                            श्रीकृष्ण प्राकट्य
       ऐसे समय पर सभी के हृदय में विराजमान भगवान विष्णु देवकी के गर्भ से कृष्ण रूप में प्रकट हुए।  वसुदेव जी ने  देखा कि उनके सामने एक अद्भुत बालक प्रकट हुआ है, जिसके नेत्र कमल के समान कोमल और विशाल हैं तथा उसके  चार सुंदर हाथों में शंख चक्र, गदा और  पद्म हैं। वक्ष स्थल में श्रीवत्स का चिन्ह (स्वर्ण मई रेखा) है। गले में कौस्तभ मनी  झिलमिला रही है।  श्यामल  शरीर  पर  पीताम्बर  फहरा  रहा  है।  कमर  में करधनी,  बाहों  में  बाजूबंद  और  कलाइयों  में  कङ्कण  से अनोखी छटा बन रही है। वसुदेव जी जान गए कि भगवान का प्राकट्य हुआ है और उसी समय दोनों पति - पत्नी भगवान की स्तुति करने लगे। स्तुति  करने  के उपरांत  देवकी  ने कहा," हे मधुसूदन,  इस पापी कंस को यह बात मालूम ना हो कि आपने ही मेरी  कोख  से जन्म लिया है। आपके  लिए  मैं कंस से  डर रही हूं।"
           माता पिता को उपदेश देकर शिशु रूप धारण
       श्री भगवान ने कहा," देवी  स्वयंभू मन्वन्तर  में  तुम प्रश्नी और वसुदेव सुतपा प्रजापति थे।  घोर  तप  करके  मुझे  प्रसन्न करने के बाद आपने मुझे पुत्र रूप में पाने  का  वर  मांगा  था। उस समय भी मैं प्रश्नी शर्मा के रूप में आपका  पुत्र  हुआ  था।
फिर दूसरे जन्म में जब आप अदिति और कश्यप थे, तब मैंने आप दोनों  के  पुत्र  उपेन्द्र (वामन अवतार) के  रूप  में  जन्म लिया था। अब  इस  जन्म  में भी मैं आप के पुत्र रूप में प्रकट हुआ हूं।  तुम  दोनों  मेरे  प्रति  पुत्र  भाव  रखना  तथा  निरंतर ब्रह्मभाव भी रखना।  इस प्रकार वात्सल्य, स्नेह और चिंतन के द्वारा आप दोनों को परम पद की प्राप्ति होगी।" इतना  कहकर भगवान ने साधारण  शिशु  रूप  धारण कर  लिया।  आगे  की कथा अगले लेख में।
                    जय श्रीकृष्ण जी की
      
       

       

बुधवार, 11 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या 25(श्रीकृष्ण प्राकट्य से पहले की स्थिति)

       भगवान  श्रीकृष्ण जी  के प्राकट्य के समय के  राज  वंश एवं महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व इस प्रकार थे:-
       एक वंश उस समय चल रहा था राजा शांतनु का।  उसके तीन पुत्र  हुए - चित्रांगद,  गंगा  पुत्र  भीष्म  और  वचित्र  वीर्य।
वाचित्र वीर्य की पत्नि अंबिका से हुए - धृतराष्ट्र, अंबालिका से पांडु और दासी से विदुर। धृतराष्ट्र की पत्नि गांधारी से दुर्योधन आदि 100 पुत्र हुए। पांडु की पत्नी  कुंती से  युधिष्ठिर,  अर्जुन और भीम और माद्री से नकुल और सहदेव हुए। अर्जुन का पुत्र हुआ  अभिमन्यु  और  अभिमन्यु का हुआ  परीक्षित।  यह वही परीक्षित है जिसको यह सारी  भागवत कथा श्री शुकदेव जी ने सुनाई थी।
       दूसरा वंश उस समय चल रहा था मगध के राजा जरासंध का। उसकी कन्या का विवाह कंस के साथ हुआ था। वह बड़ा ही क्रूर शासक था।
       तीसरा वंश था यदु वंश। यह आगे कई वंशों में विभक्त हो गया। इसी वंश में रोमपाद का वंश चला जिसमें  शिशुपाल भी हुआ जिसका वध श्रीकृष्ण द्वारा किया गया था।
       इसी वंश के एक उप वंश  में एक  राजा हुए उग्रसेन। उस का पुत्र हुआ कंस जो श्री कृष्ण का मामा था।
       उग्रसेन के भाई देवक की देवकी  समेत आठ पुत्रियां हुईं। इन सभी का विवाह श्रीकृष्ण जी के  पिता  वसुदेव जी से हुआ था।
       देवमीढ़ के पुत्र हुए शूरसेन। शूरसेन के वासुदेव समेत दस पुत्र हुए। शूरसेन की 6 पुत्रियां भी हुईं थीं,  जिनमें से एक कुंती नामक कन्या उसने अपने मित्र राजा कुंती भोज को गोद दे दी। यह वही कुंती है जो श्रीकृष्ण जी  की बुआ थीं और पांडवों की माता। शूरसेन  की  एक पुत्री  का विवाह चेदी राज दमघोश से हुआ और इसका पुत्र हुआ शिशुपाल  जिसका  वध श्रीकृष्ण ने किया था। शूरसेन की एक  पुत्री थी  श्रुतदेवा,  उसका  विवाह हुआ करूष देश के वृद्ध शर्मा के साथ। उसका एक  पुत्र  हुआ दंतवक्र। इसका वध भी  श्रीकृष्ण  द्वारा ही हुआ  था। ये  दोनों दंतवक्र और शिशुपाल उन्हीं जय और विजय का तीसरा जन्म हुआ था जिनको ऋषियों ने श्राप  देकर राक्षस  बना दिया था। इनका पहला जन्म हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु, दूसरा रावण तथा कुंभकर्ण और तीसरा दंतवक्र  और  शिशुपाल  के रूप में हुआ।
        देवकी और  वसुदेव  जी के आठ  पुत्र  हुए:-  कीर्तिमान, सुषेण, भद्र सेन,  रिजू,  समर्दन,  भद्र, बलराम  और श्रीकृष्ण। एक पुत्री भी हुई जिसका नाम सुभद्रा था।
        उस समय जब श्रीकृष्ण जी  का  प्राकट्य  हुआ था, तब ज्यादातर राजा बहुत ही क्रूर थे। उनमें से  कंस  बहुत ही  क्रूर  और निर्दई था। उसे जरासंध की सहायता भी प्राप्त थी। उसके दूसरे साथी थे, प्रलंबसुर, बकासुर,  चाणूर, तृणावर्त,  अघासुर, मुष्टिक, अरिष्टासुर, द्विविद,  पूतना,  केशी और  धेनुक।  इनके इलावा बाणासुर और भौमासुर दो दैत्य भी उसके मित्र थे। वह इन सभी की सहायता से  यदुवंशियों  को  नष्ट  करने  में  लगा हुआ था। वे लोग भयभीत होकर कुरु, पांचाल, कैकैय, शालव, विधर्भ, निषध, विदेह और कौशल आदि राज्यों में जा कर बस गए। कुछ लोग इसके साथ होने का दिखावा करके यहीं इसके साथ ही रह गए।  प्रजा त्राहि त्राहि कर रही थी।
       शुकदेव जी राजा परीक्षित को कथा सुनाते  हुए  कहते हैं कि उस समय लाखों दैत्यों के दल ने घमंडी राजाओं  का  रूप धारण कर लिया। पृथ्वी के लिए भी पाप का बोझ सहन करना असम्भव सा प्रतीत हो रहा था। वो ब्रह्मा जी की शरण में  गई। ब्रह्मा जी, शंकर जी, सभी देवता और पृथ्वी क्षीर सागर के तट पर गए। भगवान  द्वारा  आकाशवाणी  हुई  कि, " मैं  शीघ्र  ही वसुदेव  के  पुत्र  के रूप  में  अवतार ले  रहा  हूं।  हे  देवताओं तुम भी जाकर यादव कुल में  शरीर ग्रहण करो  ताकि तुम मेरी लीलाओं में सहयोग कर सको। देवांगनाएं  भी पृथ्वी पर  शरीर ग्रहण करें। शेषनाग  जी भी मेरे  से  पहले  ही मेरे बड़े भाई के रूप में अवतार ले लेंगे।  योग माया  भी  अंश रूप  में  अवतार लेंगी।"
                         देवकी वसुदेव विवाह
        उधर जब वसुदेव जी का विवाह देवकी से  हुआ और वो घर जाने लगे तो देवकी का भाई  कंस स्वयं  ही रथ  चलने  के लिए रथ पर बैठ गया और घोड़ों की रास  हाथ में  पकड़  ली। उसी समय आकाशवाणी हुई," अरे मूर्ख,  जिसे  तू रथ में बैठा कर  लेजा  रहा है,  उसी के  आठवें  गर्भ की संतान  तुझे  मार डालेगी।" आकाशवाणी  सुनते  ही  कंस  ने तलवार खींच ली। जब चोटी से पकड़ कर देवकी को मारने लगा तो वसुदेव जी ने उसे बहुत समझाया। परंतु उसकी समझ  में  कुछ  नहीं आया। वसुदेव को सत्यवादी माना जाता था।  उसने कंस को कहा कि वो चिंता ना करे, देवकी को छोड़ दे।  जब भी देवकी  की कोई संतान होगी वह स्वयं  ही लाकर उसे सौंप देगा। वसुदेव जी के सत्यवादी होने के कारण सभी  उसकी  बात का  पूर्ण  विश्वास करते थे। इस लिए कंस ने भी  विश्वास किया  और  उसे  छोड़ दिया।
       जब उनका पहला बालक हुआ तो वसुदेव  ने लाकर कंस को सौंप दिया। कंस ने उसे बालक वापिस कर दिया और कहा कि उसे तो केवल देवकी की आठवीं संतान से  मतलब है। इस लिए वो बालक को वापिस ले जाए।  तभी  वहां  पर नारद जी आए और उन्होंने कंस को समझाया कि जब आठ बालक होंगे तो उनमें से कोई भी  पहला और  कोई भी आठवां  हो  सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि देवताओं ने भी अनेकों  रूपों  में यहां जन्म लिए हैं।  कंस  को  यह  तो  ज्ञात  ही था कि पिछले जन्म में जब वो कालनेमी राक्षस था, उस समय भी विष्णु  जी ने ही उसे मारा था। नारद जी की बातें सुन कर कंस ने  वसुदेव और देवकी को बुलाकर वापिस कारागार में  डाल  दिया  और उस बच्चे को मार  दिया। तब कंस ने अपने  पिता  उग्रसेन को भी कारागार में बंद कर दिया और स्वयं राजा बन गया।
                          जय श्री कृष्ण जी की
       
       

मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या 24(श्रीरामावतार कथा)

      उस तपोभूमि पर एक दिवस, बट के नीचे बैठे हर थे।
      सच्चिदानंद के  चिंतन  में,  एकाग्रचित्त  भूतेश्वर  थे।।
   भगवान त्रिलोचन के समीप, भगवती  उमा थी भ्राज रही।
   मानो दाएं हों परम पुरुष, बाएं दिशी प्रकृति विराज रही।।
          खुली जभी योगेश की, वह समाधि  अविराम।
          मुख से निकला शब्द यह, जय मयापति राम।।
          गिरी गिरिसुता चरण में  तभी जोड़ कर हाथ।
          पूर्व जन्म  की याद  कर, बोल  उठी हे  नाथ।।
     मैंने जो की थी देह भस्म, मेरी इस बलि पर ध्यान करें।
     श्रीराम कथा रूपी  गंगा, अब  मेरे  लिए  प्रदान  करें।।

       राधेश्याम रामायण जी से इन पंक्तियों को लिया  गया है।   ऐसा कहा गया है कि राम कथा सबसे पहले भगवान  शिवजी ने  पार्वती  जी को  सुनाई  थी। इसी राम अवतार काल  में रुद्र अवतार भक्त हनुमान जी ने भी भगवान राम जी की  लीलाओं का  आनंद  लिया  था।  सबसे  प्रसिद्ध  रामायण  भगवान  श्री बालमिक जी द्वारा रचित रामायण है। श्री तुलसी दास जी द्वारा रचित  श्री रामचरितमानस  को  भी  बहुत  ही पवित्र ग्रंथ माना जाता है। जहां  तक  श्रीमद्भागवत महापुराण  की  बात  है  तो इसमें राम जी  की  कथा  ज्यादा  विस्तार  से नहीं कही गई है, क्योंकि भागवत में सभी अवतारों की कथा का संक्षिप्त  वर्णन ही मिलता है। केवल  श्रीकृष्ण  जी  की  लीलाओं  को  ज्यादा विस्तार से कहा गया है।  इस  लेख  में  राम अवतार के केवल कुछ मुख्य बिंदु ही प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
        रामावतार को विष्णु जी का पूर्ण अवतार  माना गया है।
राम कथा का  विस्तार  से  वर्णन तो अलग से  किया जाएगा । परंतु श्रीमद्भागवत महापुराण में इस कथा का बड़ा ही संक्षिप्त वर्णन मिलता है।
        सूर्य वंश में आपनें  इक्ष्वाकु  और  उसके वंश  के बारे  में पढ़ा है। इस वंश में भिन्न भिन्न समय पर  अनेक  महान  सम्राट हुए हैं। जैसे  कि  राजा सगर,  राजा रघु, और   हरिश्चंद्र आदि। इसी वंश में महाराज दशरथ जी  हुए। उनकी तीन रानियां थीं। कौशल्या माता, माता सुमित्रा और माता केकेई। कौशल्या जी के पुत्र रूप में भगवान राम जी। कैकेई के हुए भरत और माता सुमित्रा के दो पुत्र हुए लक्ष्मण और शत्रुघ्न।
        उस समय राक्षस राज रावण  और  उसके   साथियों का आतंक फैला हुआ था। ऋषि और देवता सब डरे हुए थे।  उन राक्षसों को दण्ड देने और ऋषि मुनियों को दर्शन देकर कृतार्थ करने के लिए ही भगवान विष्णु ने अपने ही चार रूप बना कर अवतार धारण किया था।
        रावण और कुंभकर्ण दोनों भाई पिछले जन्म में भी बहुत अहंकारी दैत्य  हिरण्याक्ष तथा  हिरण्यकशिपु थे।  ऋषियों  के श्राप के कारण ही उनको यह तामस देह मिली थी। अब उनको मारने के लिए भगवान को अवतार लेना पड़ा।
        अपने जीवन  काल में भगवान  राम ने कई बड़े ही उत्तम आदर्श स्थापित किए।  इसी लिए  उन्हें मर्यादा  पुरषोत्तम  राम कहा जाता है। एक पत्नी व्रत, पिता के वचन की पूर्ति के लिए राज्य का त्याग, शबरी के जूठे  बेर खाना, और  शरण  में आए हुए की रक्षा करना सत्य पर  चलना आदि अनेक उदाहरणों से उनका जीवन भरा पड़ा है।
         उनके जीवन काल में उनका गुरु  वशिष्ठ  जी  से  अल्प काल में ही सभी विद्याओं को ग्रहण कर  लेना,  विश्वामित्र  जी के साथ जाकर यज्ञ की रक्षा के लिए ताड़का, सुबाहु आदि का वध करना और मारीच आदि को दण्डित  करना,  अहल्या  का उद्धार करके स्त्री सम्मान बढ़ाना, राजा  जनक  की पुत्री  सीता जो कि लक्ष्मी जी का अवतार थीं के स्वयंवर में शिव धनुष  को भंग करके और परशुराम जी से संवाद करके संसार  को अपने बारे में संदेश देना, पिता के वचन का सम्मान करते हुए उनकी  आज्ञा का पालन करते  हुए  14 वर्ष  तक  वन में  चले  जाना, निषाद और खेवट से  मित्रता और  सौहार्दपूर्ण  संबंध  बनकर एक अच्छा सामाजिक समरसता का संदेश  देना, ऋषियों  की सेवा और सुरक्षा करना, सीता जी के  हरण  के बाद  बाली के पापों का दण्ड देना,  पापी  दैत्यों  रावण,  कुंभकर्ण,  मेघनाथ समेत अनेक  राक्षसों का  वध  करके  मानव  जाति  की  रक्षा करना, शत्रु के भाई विभीषण को शरणागति प्रदान करना और माता द्वारा वन में भेजे जाने के बावजूद  माता कैकेई  को  पूरा सम्मान देना आदि अनेक  उदाहरणों से  भगवान ने समाज  में मर्यादाओं की स्थापना की।  राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न, इन चारों भाइयों ने सेवा, त्याग और प्रेम की ऐसी उदाहरण दी है कि आज भी जो परिवार इन के द्वारा दर्शाए रास्ते का थोड़ा भी अनुसरण करते हैं उनका पारिवारिक जीवन आदर्श बन जाता है। उनके द्वारा किए शासन का अच्छा उदाहरण आज भी 'राम राज्य' कहकर दिए जाता हैं।
                     जय श्रीराम जी की
         

सोमवार, 9 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या 23(मत्स्य अवतार एवं परशुराम अवतार कथा)

                         मत्स्य अवतार कथा
      पिछले कल्प के अंत में ब्रह्मा जी के सो जाने पर जो ब्राह्म नामक नैमितक प्रलय होना था, उससे पहले जब ब्रह्मा जी को नींद आ रही थी, उसी समय हयग्रीव नामक दैत्य ने अपने योग बल से वेदों को ब्रह्मा जी से चुरा लिया था। श्री हरि ने यह जान लिया और इस संकट के निवारण हेतु एक  मछली के  रूप  में अवतार ग्रहण किया।
      उस समय सत्य व्रत नाम के राज ऋषि केवल जल पीकर तपस्या कर रहे थे। यह वही सत्यव्रत थे जो अब वर्तमान कल्प में श्राद्ध देव नाम से वैवत्सव मन्वन्तर के मनु बने हैं।
      एक दिन सत्य व्रत कृतमाला नदी से जल लेकर तर्पण कर रहे थे कि उसी समय उनकी अंजलि के जल  में एक छोटी  सी मछली आ गई। द्रविड़ देश के राजा सत्यव्रत ने अपनी अंजलि के जल के साथ ही फिर  से उसे पानी में डाल दिया।  तब  उस मछली ने बड़ी करुणा के साथ कहा, "राजन  आप बड़े दयालु हैं। बड़ी मछलियां मुझे खा जाएंगी। इस लिए कृपया मुझे जल में ना छोड़ें। दयालु सत्यव्रत ने दया करके  मछली को  कमंडल में डाल लिया और अपने साथ आश्रम ले गए। थोड़ी ही देर के बाद मछली ने कहा कि  कमंडल में  मुझे कष्ट  हो रहा है।  इस लिए कृपया आप मेरे लिए  कोई बड़ा स्थान  निश्चित  कीजिए। सत्यव्रत ने उसको मटके में डाल दिया। फिर थोड़ी देर में और बड़ी हो गई तो उसके लिए एक सरोवर बनवा दिया गया। फिर और बड़ा सरोवर बनाया गया परंतु मछली का आकार बढ़ता ही जा रहा था। अंत में इतना बड़ा आकार हो गया कि सत्यव्रत ने उसे फिर से समुद्र में छोड़ दिया। मछली ने जब फिर से कहा कि राजर्षी मुझे समुद्र में मत छोड़ो तो सत्यव्रत को बहुत  बड़ा आश्चर्य हुआ। वो मोह मुग्ध हो गए। उन्होंने पूछा कि आप कौन हैं ? कहीं आप श्री हरी तो नहीं ? यदि आप श्री हरी हैं तो आप ने यह शरीर क्यों धारण किया है ?
      भगवान ने कहा सत्यव्रत तुमने बिल्कुल सही पहचाना  है। आज से सातवें दिन भूर्लोक आदि  तीनों  लोक  समुद्र  में  डूब जाएंगे। जब यह डूबने लगेंगे, उस समय तुम्हारे पास एक बहुत बड़ी नौका आएगी तब  तुम सभी प्राणियों के सूक्ष्म शरीर और बीजों को साथ लेकर सप्त ऋषियों के साथ उस नौका पर चढ़ जाना। लहराते सागर में अंधेरा होगा।  प्रचण्ड  आंधी  से  नाव डगमगाने  लगेगी।  तब मैं  इसी  रूप में आऊंगा।  तुम वासुकी नाग से नाव को मेरे  सींग  के साथ  बांध देना। तब  सत्यव्रत ने भगवान की स्तुति की और उनसे तत्व ज्ञान प्राप्त किया।
      सही समय आने पर सब  कुछ वैसे  ही  घटित  हुआ  जैसे भगवान द्वारा बताया गया था। उसके बाद प्रलय  काल  आरंभ हो गया। जब प्रलय काल समाप्त हुआ तो भगवान ने  अवतार लेकर असुर हय ग्रीव को मार कर उससे  वेद  छीन  लिए  और ब्रह्मा जी को दे दिए।
   
                     भगवान परशुराम अवतार कथा
       भगवान सदा पृथ्वी  पर  संतुलन  बना के  रखते  हैं। उस समय के शासक बहुत ही अत्याचारी और अधर्मी हो  चुके  थे। उनमें से सबसे अधिक अत्याचारी राजा था सहस्त्रबाहु। वह है हय वंश का अधिपति  था।  उसका  असली  नाम  अर्जुन  था। दत्तात्रेय जी से उसने सहस्र बाहों का वरदान  पाया था।  इतनी शक्ति  पाकर  वह  बहुत  अभिमानी  हो गया  था।  उस  जैसे अभिमानी  राजाओं  को समाप्त  करने  के  लिए  ही  भगवान विष्णु जी ने परशुराम जी के  रूप में अंशावतार  ग्रहण  किया।
       भगवान परशुराम जी ने महर्षि जमदग्नि के  पुत्र के  रूप में जन्म लिया। बचपन में उनका  नाम राम था।  भगवान  शिव से शिक्षा ग्रहण की।  शिवजी से परसा  प्राप्त  किया।  भगवान शिव ने ही उन्हें सबसे पहले परशुराम नाम दिया था।
       सहस्त्रबाहु (अर्जुन) इतना  बलशाली  था कि एक बार तो उसने रावण को भी कैद कर  लिया था। बाद में  उसको  ऋषि पुलस्त्य जी ने स्वतंत्र करवाया था।  अभिमानी  होने  के  साथ साथ वह ऋषि मुनियों पर भी अत्याचार  करता  था।  एक बार वह ऋषि जमदग्नि के आश्रम पहुंचा तो वहां से  कामधेनु  गाए को जबरदस्ती अपने  साथ  ले गया। उसके दस  हज़ार पुत्र भी थे।भगवान परशुराम जी ने सहस्त्रबाहु का वध कर दिया।  उस समय उसके सारे पुत्र भाग गए। परंतु बाद में एक दिन  उन्होंने अवसर मिलने पर जमदग्नि का सिर काट दिया। परशुराम जी ने इसका बदला लिया और उन सभी  को मार  दिया। बाद  में  यज्ञ के द्वारा अपने पिता जमदग्नि  को फिर से  जीवित किया जो कि वर्तमान में सातवें सप्तऋषि भी बने हैं।
       कहते हैं राजाओं के अत्याचारों के कारण परशुराम जी ने पृथ्वी को कई बार ऐसे राजाओं से  मुक्त  किया।  जब भगवान श्रीराम जी का अवतार हुआ और उन्होंने मिथिला में धनुष भंग किया, उसी समय परशुराम जी ने उन्हें पहचाना कि विष्णु  जी का पूर्ण अवतार हो चुका है। यह जानकर वे  तपस्या करने के लिए चले गए।
                        जय श्री कृष्ण जी की

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या - 22( सूर्य वंश एवं चंद्र वंश)

कलयुग की आयु    =432000 वर्ष है,
द्वापर युग की आयु  =864000 वर्ष है,
त्रेता युग की आयु   =1296000 वर्ष है,
सतयुग की आयु    =1728000 वर्ष है,
चार युगों की कुल आयु=4320000 वर्ष (इसी को चतर्युगी कहा है।)

71 चतर्यूगी =01मन्वन्तर (एक मन्वन्तर की आयु हुई 4320000×71=306720000
14मन्वन्तर=सृष्टि (कल्प) की कुल आयु 306720000×14 = 4294080000 वर्ष
एक कल्प=ब्रह्मा जी का एक दिन कहलाता है।
इतनी ही बड़ी रात्रि होती है।
ब्रह्मा जी के जाग जाने पर फिर से सृष्टि शुरू होती है
हर कल्प के बाद सृष्टि समाप्त होती है। वर्तमान कल्प का नाम
श्वेत्वाराह कल्प है। इस कल्प के 14 मन्वन्तर और उनके नाम इस प्रकार हैं:-
पहले का   स्वायमभू
दूसरे का    स्वरोचिष
तीसरे का   औत्तमी
चौथे का     तामस
पांचवें का    रैवत
छठे का      चाक्षुष
सातवें का   वैवस्वत
आठवें का   सावर्णी
नौवें का      दक्ष सावर्णि
दसवें का     ब्रह्म सावर्णि
ग्यारहवें का धर्म सावर्णि
बाहरवें का   रुद्र सावर्णि
तहरवें का    देव सावर्णि
चौदहवें का   इन्द्र सावर्णि
       उपरोक्त मन्वन्तरों में से छ: मन्वन्तर निकल चुके हैं। और सातवें मन्वन्तर की 28वीं चतर्युगी के सत्युग, त्रेता, और द्वापर निकल चुके हैं और कलयुग का आरंभ हो चुका है।
      वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर के मनु  विवस्वान के  पुत्र  श्राद्ध देव हैं। वर्तमान मन्वन्तर ही इनका कार्यकाल है। इनके इक्ष्वाकु आदि दस पुत्र हुए। देवताओं के प्रधान गण आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरूद गण, अश्वनीकुमार  और रिभु हैं।  इस मन्वन्तर के इन्द्र पुरंदर हैं। सप्त ऋषि कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ,  विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज हैं।
       इस मन्वन्तर में राजाओं के मुख्यत: दो वंश चले जिनको सूर्य वंश और चंद्र वंश कहा गया है।
                               सूर्य वंश
       जैसे कि आप पढ़ चुके हैं कि भगवान की नाभि से  ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हुए मारिची। मारिचि के पुत्र हुए महर्षि  कश्यप।  कश्यप  जी  के  पुत्र  हुए  वीवस्वान। उनके पुत्र हुए सूर्य और सूर्य के  पुत्र  हुए  श्राद्ध  देव  जो  कि वर्तमान मनु हैं। इनके इक्ष्वाकु आदि दस पुत्र हुए। इसी वंश में आगे  चल  कर  सगर,  दलीप,  भगीरथ,  सौदास,  रघु,  अज, दशरथ,  श्री राम, कुश, अतिथि, निशध, नभ,  पुंडरीक  आदि कई राजा  हुए। कहा  गया  है  कि  इस वंश  के  अंतिम  राजा सुमित्र हुए थे।
                         राजा निमी का वंश
       राजा निमी भी इक्ष्वाकु के पुत्र थे। एक बार उन्होंने वशिष्ट जी के बजाए किसी और से यज्ञ  करवा  लिए  जिससे  कुपित होकर वशिष्ट जी ने श्राप दे दिया। मरने से  पहले राजा ने ऋषि को भी श्राप दे दिया। दोनों को शरीर त्यागना  पड़ा। वशिष्ट जी ने मित्रवरण और उर्वशी के पुत्र  के रूप  में जन्म  लिया। उधर राजा निमी के शरीर का मंथन  करके  ऋषियों  ने एक  बालक को उत्पन किया। नाम रखा जनक।  विदेह से  उत्पन्न  होने  के कारण उसको विदेह नाम पड़ा और मंथन  से  उत्पन्न  होने  के कारण  मीथिल  नाम  पड़ा।  इस  राजा ने  ही  मिथिला  नगरी बसाई।  इस  वंश  के  सभी  राजा  बहुत  विद्वान् हुए।  सबको जनक, मिथिलेश और  विदेह आदि नामों से पुकारा जाता था। इसी वंश में सीता माता जी  के पिता  सीरध्वज  हुए इनको भी राजा जनक के नाम से ही जाना जाता है। सीर  का अर्थ होता है हल। इन्होंने हल चलाया था और उससे ही  हल की नोक से माता सीता पृथ्वी से प्रकट हुई थीं। इस लिए  इनको सीरध्वज कहा जाता है।
                                चंद्र वंश
       अपने पहले पढ़ा है कि विराट पुरुष भगवान नारायण की नाभि से एक कमल प्रकट हुआ। उसमें से ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी के ही एक  पुत्र हुए थे  महर्षि अत्री जी। अत्री  जी के पुत्र  हुए  चंद्रमा।  इनका  जो  वंश  आगे चला उसको चंद्र वंश कहते हैं। चंद्रमा के पुत्र हुए बुध, उनके  पुरुरवा,  उसके  आयु, उसके नहुष, उसके ययाति और ययाति के  पुत्रों के नाम पर ही यादव, यवन, भोज, म्लेच्छ और हेहय  आदि वंशों  का  आरंभ हुआ। बाद में यही वंश कई और वंशों में विभक्त हो गए।
                     जय श्रीकृष्ण जी की

रविवार, 8 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या -21(वामन अवतार)

            दैत्यराज बली का अमरावती पर अधिकार
    समुद्र मंथन के बाद देवताओं और दैत्यों में घोर संग्राम हुआ
भगवान विष्णु जी की  सहायता  से देवता विजई रहे। बलि जो कि  मर  चुका  था,  उसको  उसके  गुरु  शुक्राचार्य  ने  फिर से जीवित कर दिया। बलि ने अपनी सारी सम्पत्ति  अपने गुरु को अर्पण कर दी। सारे भृगु वंशी ब्राह्मणों की वो स्वयं  सेवा करते थे। उन ब्राह्मणों ने प्रसन्न  होकर बलि से विश्वजीत नामक यज्ञ करवाया। उस  यज्ञ  से  बलि  को  एक  सोने से मढ़ा हुआ रथ, एक ध्वजा, एक धनुष, कभी खाली ना होने वाला तरकश और एक दिव्य कवच प्राप्त हुआ। शुक्राचार्य ने उसे एक शंख प्रदान किया। बलि ने फिर एक बार आसुरी सेना को साथ लेकर  इंद्र पुरी पर चढ़ाई कर दी।
    देवता अपने गुरु बृहस्पति जी के पास गए और प्रश्न  किया कि बलि में इतना तेज कहां से आ गया।  बृहस्पति जी ने उन्हें  बताया कि बलि के द्वारा करवाए गए विश्वजीत नामक  यज्ञ से ही उसे  यह  सारी  शक्तियां  प्राप्त हुई हैं। अब तुम  अमरावती छोड़ कर  कहीं  छिप  जाएं  और सही समय की  प्रतीक्षा करें, क्योंकि इस  समय  सिवाए   सर्वशक्तिमान  भगवान के उसके सामने कोई और ठहर नहीं सकता है।
    देवताओं ने ऐसा ही किया और बलि ने बड़ी ही आसानी से तीनों  लोकों पर  अधिकार  कर  लिया।  इस तरह उसने तीनों लोकों  की  राज्य  लक्ष्मी  का  बड़ी उदारता से उपभोग करना शुरू कर दिया।
                   दिती को भगवान का वरदान
    महर्षि कश्यप जी  की  दो पत्नियां थीं, दिती  और अदिति। राक्षस दिती  की और देवता अदिति की  संतान थे।  अदिति ने देवताओं के  उत्थान के  लिए  कश्यप जी  के  कहने पर विधि पूर्वक पयोवृत किया। इस पर प्रसन्न होकर  भगवान ने अदिति को  दर्शन  दिए  और  कहा  कि  तूने  अपने पुत्रों की रक्षा हेतु पायोवृत से मेरी पूजा एवं स्तुति की है अत: मैं तुम्हारे पुत्र रूप में अवतार  लेकर  तुम्हारे  पुत्रों की रक्षा करूंगा।  ऐसा कहकर भगवान अंतर्धान हो गए।
                     भगवान वामन का प्राकट्य
    समय आने  पर  भगवान  अदिति के गर्भ से प्रकट हुए और माता को आनंदित  किया। भगवान ने  देखते ही  देखते  वामन ब्रह्मचारी का रूप धारण कर लिया।
              भगवान का राजा बलि के पास जाना 
उस समय बलि सौवां यज्ञ  करने  जा  रहे  थे।  वामन  भगवान वहां  यज्ञशाला में पहुंच  गए। वो स्थान नर्मदा नदी के  तट  पर स्थित है  जिसका  नाम है भृगु कच्छ। वामन भगवान  के  हाथ में  छत्र और जल  से  भरा  हुआ  कमंडल, कमर  में  मूंज  की मेखला, गले  में  यज्ञोपवीत, बगल  में  मृगचर्म  और  सिर  पर जटाएं थीं।
                         तीन पग भूमि मांगना
    बलि ने उन्हें उत्तम आसन दिया, पांव पखारे और चरणामृत लेने के बाद बलि ने कहा," हे  विप्र जो मांगना  चाहते हो  मांग लीजिए। मैं आपकी हर तरह की मांग पूरी करने में सामर्थ हूँ।" वामन भगवान ने  कहा कि याचक को केवल इतना ही मांगना चाहिए जितनी  उसको आवश्यकता हो।  इस  लिए मैं  आपसे केवल तीन  पग भूमि  ही  मांगता हूं।  आप अपने हाथ में जल लेकर तीन पग भूमि का संकल्प करके मुझे  दान कर दीजिए। जैसे ही बलि संकल्प करने लगे उसी समय उनके गुरु शुक्राचर्य भी वहां  पहुंच गए।  उन्होंने  उसे ऐसे करने से रोक दिया और कहा कि तुम यह भूल कर रहे हो। यह कोई साधारण विप्र नहीं हैं। यह तो साक्षात भगवान् विष्णु हैं जो तुम्हारा सब कुछ छीन कर देवताओं  को देने के लिए ही यहां  आए हैं। बलि ने अपने गुरु  की बात सुन  कर कहा कि मैं  अपने द्वार  से  किसी  भी याचक को खाली हाथ नहीं भेज सकता। और यदि यह विष्णु जी भी हैं, तो भी इनको इनकार नहीं किया जा सकता क्योंकि यह तो मेरा सौभाग्य है कि स्वयं  भगवान मेरे द्वारे  पर याचक बन कर पधारे हैं। इसके इलावा यदि यह चाहें तो  वैसे भी मेरा सारा वैभव मुझसे छीन लेने की सामर्थ्य रखते हैं। इस लिए मैं अपना वचन पूरा करूंगा।
                   शुक्राचार्य द्वारा बलि को शाप
                  भगवान द्वारा बलि को वरदान
    इतना सुनते ही शुक्राचार्य ने बलि  को  श्राप दिया कि उसने अपने गुरु का कहना नहीं  माना है इस  लिए वह  शीघ्र ही  श्री हीन हो जावे। राजा बलि ने श्राप को सहर्ष स्वीकार किया और वामन जी को तीन पग भूमि संकल्प करके दे दी और कहा कि वो तीन पग भूमि अपने पगों से माप लें। अब वामन भगवान ने अपने शरीर को बढ़ाना शुरू कर दिया।  इतना  ज्यादा  बढ़ाया कि उन्होंने अपने दो पग में ही तीनों  लोक माप लिए। भगवान ने बलि से कहा  कि हे बलि बताओ  अब मैं अपना तीसरा पग कहां रक्खूं।  कोई स्थान शेष  नहीं रहा। इस लिए  तुम  अपना संकल्प पूरा नहीं कर सकते। अब तुम्हें नरक में  जाना  पढ़ेगा। बलि ने भगवान की  स्तुति करते  हुए  कहा  कि  भगवन्  अब आप  कृपया   तीसरा  पग  मेरे सिर  पर रख दीजिए। भगवान प्रसन्न हुए उन्होंने तीसरे पग  से  बलि  के  सिर  को स्पर्श करते हुए कहा कि हे बलि मैं जिस  पर  कृपा करता हूं  पहले उसकी संपत्ति को  हर  लेता हूं। अब  मैं तुम्हे  वरदान  देता हूँ कि  तुम अगले सावर्णी मन्वन्तर के इन्द्र होंगे। तब तक तुम सूतल लोक में जाओ जिस लोक की देवता भी कामना करते हैं।
                       जय श्रीकृष्ण जी की
    

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण, लेख संख्या 20 (समुद्र मंथन या आत्म मंथन)

                भगवान द्वारा देवताओं को निर्देश
 परीक्षित के पूछने पर कि क्षीर सागर का मंथन कैसे हुआ, श्री शुकदेव जी  ने  उत्तर दिया कि  यह उस समय की बात है जब असुरों ने देवताओं को पराजित कर दिया था। दुर्वासा ऋषि के श्राप से तीनों लोक श्री हीन हो गए थे।  धर्म का  लोप  हो गया था। तब सभी देवता ब्रह्मा जी की  सभा  में  पहुंचे  और  सारा संकट बताया। भगवान शंकर जी भी वहीं उपस्थित थे। संकट काल जान कर ब्रह्मा जी  ने  भगवान विष्णु  का  ध्यान किया। भगवान विष्णु  भी  वहीं प्रकट हो गए।  भगवान विष्णु जी  ने सारी बात सुन कर  और विचार करने पर कहा  कि इस  समय असुरों पर काल की कृपा है। इस लिए तुम उन से संधि कर लो और उचित समय  की  प्रतीक्षा  करो।  उनको  साथ  मिलाकर समुद्र मंथन करने के लिए प्रेरित करें । आलस्य और प्रमाद को छोड़ो और अपने आप को उत्साह  से भरकर  उद्योग  में  लगा दो। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूं कि मंथन करने के उपरांत देत्यों को तो मिलेगा केवल श्रम और क्लेश और  आप को  मैं अमृत पिला कर अमर कर दूंगा।  परंतु  ध्यान रखना, पहले पहल तो निकलेगा कालकूट  विष,  उससे डरना नहीं।  और दूसरी बात यह कि किसी वस्तु के लिए कभी लोभ मत करना। कामना तो करनी ही नहीं चाहिए। और यदि कोई कामना मन  में  आ  भी जाए तो पूरी ना होने पर क्रोध तो कभी करना ही नहीं चाहिए।
            देवता और दैत्यों में सहमति मंथन आरंभ
       इन्द्र और दैत्य राज बलि में समुद्र मंथन के लिए मिल कर प्रयत्न करने पर समझौता  हो गया। मंद्राचल  पर्वत को  देवता और दैत्यों की शक्ति से उखाड़ दिया गया।  परंतु समुद्र  तक ले जाने में सफल नहीं हुए। उस समय भगवान  विष्णु  प्रकट  हुए और अपने वाहन गरुड़ जी पर रख कर  पर्वत  को  समुद्र  तट पर ले गए। भगवान स्वयं कच्छप अवतार लेकर  समुद्र में  चले गए और स्वयं आधार बन कर पर्वत को अपने ऊपर मथानी के रूप में धारण कर लिया। नाग राज वासुकी को  नेति के समान मन्द्राचल पर लपेट लिया। सर्व व्यापक  भगवान ने  मथानि को ऊपर से भी पकड़े रक्खा तांकि इधर उधर ना डोल सके। और
भगवान ने स्वयं ही असुरों में आसुरी बल के,  देवों में  दैवी बल के, और वासुकी में  निद्रा  के  रूप में  प्रवेश  किया।  देवताओं और दैत्यों के मंथन करने  पर  भी जब  अमृत नहीं निकला तो भगवान  स्वयं मंथन में सहयोग करने लगे।
           मंथन करने से निम्नलिखित वस्तुएं निकलीं
       मंथन करने पर सबसे पहले हलाहल नामक अत्यन्त उग्र  विष निकला। इसको सबका कल्याण करने वाले प्रभु सदाशिव भगवान शंकर जी ने धारण कर  सब  की रक्षा की। उस  समय भगवान विष्णु और ब्रह्मा जी भी उनकी प्रशंसा करने लगे।
       विष के बाद कामधेनु प्रकट हुई जिसे ब्रह्म वादी ऋषियों को दे दिया गया क्योंकि केवल वे ही उसका लोक कल्याण के लिए उचित प्रयोग कर सकते थे। उच्चै:श्रवा नाम का घोड़ा भी निकला जिसे बलि ने ले लिया। ऐरावत नाम का हाथी निकला जो इन्द्र को दे दिया गया। उसके बाद कौस्तुभ नामक पद्मराग मणि निकली जो भगवान अजित (विष्णु जी के उस समय के अंशावतार) को सौंप दी। कल्प वृक्ष और अप्सराओं को  स्वर्ग में भेज दिया गया। जब  साक्षात लक्ष्मी जी निकलीं तो उन्होंने भगवान विष्णु जी का वरण किया।  उसके  बाद  विष्णु जी के अंशावतार धन्वंतरी जी हाथों में  अमृत कलश लिए हुए  बाहर निकले।  उसी  समय  दैत्यों ने  अमृत कलश  ज़बरदस्ती  छीन लिया और भाग निकले। भगवान ने उनमें ऐसी  भावना भर दी कि वे आपस में ही पहले मैं - पहले मैं कहते हुए लड़ने लगे।
       भगवान विष्णु ने उसी समय लोक कल्याण के लिए और यह समझते हुए कि  यदि इन्होंने  अमृत ग्रहण कर लिया तो ये अमर होकर मानवता को नष्ट कर देंगे, एक बहुत ही सुंदर और मनमोहक स्त्री बनकर दैत्यों का ध्यान अपनी ओर खींचा। इसी रूप को भगवान का मोहिनी  अवतार  कहा  गया  है।  मोहिनी रूप अत्यन्त अद्भुत और अवर्णनीय था।  वो  सारे के सारे दैत्य मोहिनी रूप पर ऐसे आसक्त हो गए  कि  अमृत की  बात  को भूल कर जैसे  जैसे  मोहिनी  कहती वैसे  वैसे  ही  वे  व्यवहार करने लगे। दैत्यों ने  उसी सुंदरी  को कहा कि वो स्वयं ही सभी को अमृत पान करवाए। मोहिनी ने कहा कि पहले  आप  सभी नहा धो कर शुद्ध हो जाओ। उसके बाद सबको अमृत पिलाया जाएगा।  जब तक  दैत्यों को  होश आती  तब तक  भगवान ने सभी  देवताओं को  सारा अमृत  पिला दिया।  जब राहु ने  भी देवता का रूप धारण कर धोखे से अमृत पी लिया तो भगवान विष्णु जी ने उसकी गर्दन काट दी।
       यह तो सच है कि श्रम तो दोनों पक्षों ने  किया परंतु  फल केवल एक को ही मिला। इसका कारण यह है कि फल  प्राप्ति का उद्देश्य दोनों का भिन्न था। इसमें देवताओं का  उद्देश्य  जन कल्याण था जब कि दैत्यों का केवल अपना ही स्वार्थ था।
               साधकों के लिए मंथन का भाव
       साधक के लिए क्षीर सागर के  मंथन  का  अर्थ है  आत्म मंथन। असुर या दैत्यों का अर्थ है मन में उठने वाले बुरे  विचार और कामनाएं। देवताओं का अर्थ है अच्छे, विशुद्ध और  दिव्य विचार। अमृत का भाव है चित्त शुद्ध हो जाने पर मुक्ति के लिए भगवत साक्षात्कार। जब कभी मनुष्य को किसी योग्य संत की कृपा से भक्ति योग का मार्ग मिल जाए और वो आत्म मंथन के लिए प्रयत्न करना शुरू करता है, तो फिर भगवान भी  उसका साथ देना शुरू कर देते हैं। हर एक  मनुष्य के अपने अंतर मन में अमृत भरा पड़ा है। केवल  इसको  खोजने  की  आवश्यक्ता है। परंतु जितना सुगम कहने को लगता है, उतना है नहीं।  पूर्व जन्म में किए हुए कोई  अच्छे कर्म जागृत हो जाएं, कोई  योग्य गुरु मिल जाए, तब जाकर इस ओर जाने का रास्ता खुलता है।            अंतर मन में भरा पड़ा है, अमृत ढूंढो जाय।
             गुरु कृपा बिन ना मिले बैठे ज़ोर लगाए।।
        संत संग, सेवा, श्रवण, जप और हरी गुण गान।
            शील, सरल, संतोष हो, सबमें देखे राम।।
         मन मंथन, चिंतन सदा, हर पल हरि का ध्यान।
         श्री हरि और गुरु कृपा से मिले पूर्ण विश्राम।।
       जब मनुष्य सच्चे संत की  और भगवान की कृपा से मन का  मंथन करना शुरू करता है  तो सबसे पहले उसके  सामने अपने द्वारा किए हुए बुरे कर्म विभिन्न रूपों  में सामने आते हैं। यही विष है। साधक को चाहिए कि वह डरे  नहीं  और गुरु के बताए मार्ग पर अग्रसर रहे। कामधेनु गाय निर्मलता का प्रतीक है। धीरे धीरे मंथन करते करते  निर्मलता आ जाती है।  उसके बाद समुद्र मंथन से जैसे घोड़ा  निकला जो गति का प्रतीक है। इस अवस्था में साधक अपने  मन की गति  को रोक  लेता  है। उसके  बाद  ऐरावत  हाथी  निकलने  की बात कही गई है जो प्रतीक है बुद्धि के दोषों का जो धीरे धीरे  मिट जाते हैं।  उसके बाद बात आती है कौस्तुभ मनी  की जो भक्ति की  प्रतीक  है। इस अवस्था में भक्ति  और  प्रगाढ़  हो  जाती है।  उसके  बाद कल्प वृक्ष, रम्भा, लक्ष्मी जी आदि की बात आती है तो वो सारे के सारे सुख सुविधाओं और वैभव आदि के प्रतीक हैं। साधक को चाहिए कि वो किसी भी वस्तु की ओर ध्यान ना देता हुआ अमृत अर्थात उस परम पुरुष  परमात्मा  का निष्काम  भाव से ध्यान करता रहे। अंततोगत्वा जब ईश्वर कृपा करते  हैं तो  यदि कोई दोष बाकी रह भी गया हो तो उसको वो ऐसे काट  देते  हैं जैसे उन्होंने राहु  का  सिर  काट  दिया  था।  उसके  बाद  जब साधक पूरी तरह से शुद्ध हो जाता है तो उसे दर्शन देकर  मुक्ति प्रदान कर देते हैं।
                      जय श्रीकृष्ण जी की

गुरुवार, 5 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या - 19 (भक्त प्रह्लाद की कथा एवं हिरण्यकशिपु वध)

      लेख  संख्या 07 में आपने पढ़ा था कि सनत कुमारों द्वारा दिए गए श्राप के कारण भगवान विष्णु जी के पार्षदों जय और विजय  को  राक्षस  होकर  पृथ्वी  पर (एक को हिरण्याक्ष और दूसरे  को  हिरण्यकशिपु  के  रूप में)  जन्म  लेना  पड़ा  था। हिरण्याक्ष को  भगवान ने  वाराह अवतार  में ही मार दिया था।
               हिरण्यकशिपु द्वारा वर प्राप्त करना
 उसकी मृत्यु के पश्चात  हिरण्यकशिपु  ने  अमर  होने  के लिए तपस्या करने की बात  सोचकर  किसी  एकान्त स्थान पर घोर तपस्या की। उसकी तपस्या को देख कर देवता भी भयभीत हो गए। वे डरे हुए ब्रह्मा जी के पास गए और याचना की कि कोई ऐसा उपाय  करें जिससे  उसकी  तपस्या भंग हो जाए अन्यथा इसकी तपस्या से इसकी शक्तियां बढ़ती जाएंगी और यह दैत्य अपनी शक्तियों का  दुरुपयोग करके  सृष्टि  का विनाश करेगा। ब्रह्मा जी  ने कहा  कि  जो भी प्राणी  तपस्या  करता है उसका फल तो उसको देना ही  पड़ता है। इतना कहकर ब्रह्मा जी उसे मनवांछित फल देने के लिए उसके पास चल दिए। ब्रह्मा जी ने उसे वर  मांगने  के लिए कहा  तो उसने अमर  होने का वरदान मांग  लिया।  इस  पर  ब्रह्मा  जी  ने  कहा  कि  यह  वर उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। इस लिए कुछ और मांग लो। इस पर उसने जो  वर मांगा वो इस तरह से था, " मुझे ऐसा वर दीजिए कि आपके द्वारा बनाए हुए किसी भी प्राणी, चाहे वो मनुष्य हो या पशु,  प्राणी हो या अप्राणी,  देवता हो या देत्य, अथवा नाग आदि किसी से भी मेरी मृत्यु ना हो। भीतर, बाहर, दिन में, रात में, जीव से, अस्त्र - शस्त्र से, पृथ्वी या आकाश में कहीं भी मेरी मृत्यु ना हो।  युद्ध में मेरा कोई सामना ना कर सके।  मैं समस्त प्राणियों का  एक छत्र  सम्राट होऊं। आप जैसी ही मेरी महिमा हो। मुझे अक्षय ऐश्वर्य की प्राप्ति हो।"
       ब्रह्मा जी ने कहा,"ऐसा ही हो"
                              घोर अत्याचार
       उसके बाद तो हिरण्यकशिपु  घोर  अत्याचार करने लगा। तीनों लोकों को उसने अपने वश में कर लिया। वह तीनों लोकों का एक छत्र सम्राट बन गया। सभी देवताओं ने मन ही मन श्री हरि की शरण ले ली।
       उधर  हिरण्यकशिपु  ने  अपने  आप को  भगवान घोषित कर दिया।  जो भी  इस बात  का  विरोध करता  कड़ी से कड़ी सजा पाता। तीनों लोकों में  उसी के नाम का डंका बजता था।
          भक्त प्रह्लाद का भगवान पर अटूट विश्वास 
उसके दस पुत्रों में से सबसे  छोटे पुत्र का नाम था प्रह्लाद।  वह हिरण्यकशिपु  की पत्नि  कयाधु का पुत्र था।  वह  राक्षस  पुत्र होते हुए भी एक सच्चा  विष्णु भक्त था। बचपन  से ही  प्रह्लाद भगवान  के  ध्यान  में  तन्मय  रहते थे।  थोड़ा  बड़ा  होने  पर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अपने गुरु शुक्राचार्य के  आश्रम  में शिक्षा लेने के लिए भेज दिया। वहां पर शुक्राचार्य के  पुत्र  शंड और आमर्क को  उसे  शिक्षा  प्रदान  करने  का  दायित्व  दिया गया।
       कुछ काल व्यतीत होने के उपरांत एक दिन हिरण्यकशिपु ने अपने प्रिय पुत्र प्रह्लाद से पूछा, " बेटा तुम्हें  सबसे प्रिय बात कौन सी लगती है ?"
       प्रह्लाद ने कहा," पिता जी  संसार  में  प्राणी व्यर्थ ही ' मैं और मेरे ' के झूठे  आग्रह  में  पड़कर  सदा ही उद्विग्न रहते हैं। ऐसे प्राणियों के लिए मैं यही ठीक समझता हूँ कि इनको अपने कल्याण  के  लिए  शीघ्र  ही  श्री  हरि  की  शरण ग्रहण करनी चाहिए।"
       हिरण्यकशिपु  यह  सुन  कर  आश्चर्यचकित  रह गया कि उसका ही पुत्र  उसके शत्रु  श्री हरि की शरण  ग्रहण करने  की बात कह रहा है। फिर उसने सोचा कि शायद किसी ने  उसको बहका दिया  होगा।  प्रह्लाद को  फिर से आश्रम में  भेज  दिया गया। वहां भी  प्रह्लाद  ने  उनकी  बात  का  विरोध  किया कि उसके पिता ही भगवान हैं। उसने अपने गुरुओं को बताया कि परमात्मा केवल एक ही है। एक दिन  जब शंड  और  आमर्क आश्रम में नहीं थे तो प्रह्लाद ने सभी विद्यार्थियों को हरी  भक्ति का ज्ञान प्रदान किया।
       एक दिन फ़िर से प्रह्लाद के पिता ने उससे पूछा कि  इतने दिनों तक अपने गुरुओं से शिक्षा ग्रहण करके तुमने क्या सीखा है ? प्रह्लाद ने अपने पिता को कहा, " पिता जी विष्णु भगवान की  भक्ति के बिना  मनुष्य के लिए और कोई  उपयुक्त  साधन नहीं है। केवल वही एक सच्चिदानंद स्वरुप परमात्मा हैं। उनके सिवाए और कोई भगवान नहीं है। उनकी नौ प्रकार की  भक्ति बताई गई है। अर्थात  भक्त लोग अपने  अपने तरीके से उनकी उपासना करते हैं। उनकी भक्ति के नौ प्रकार कहे गए हैं:-
       श्रवण,  कीर्तन,  स्मरण,  सेवा,  पूजा,  वंदन, दास्य भाव, सख्य  भाव  और  आत्म निवेदन।  यही  एक  मात्र  साधन  है जिससे मनुष्य अपना उद्धार कर सकता है।
       इतना सुनते ही हिरण्यकशिपु आग बबूला हो गया। और  ब्राह्मण पर क्रोध करते हुए उसने कहा कि " क्या आप इस को यही शिक्षा दे रहे हो ?" गुरु ने कहा,"नहीं राजन यह तो इसकी जन्म जात प्रवृत्ति है। हमने इसको ऐसी शिक्षा  कभी नहीं  दी है। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा कि तुमने यह शिक्षा  कहां से प्राप्त की है ?
       प्रह्लाद ने कहा पिता जी," संसार के लोग तो पिसे हुए को पीस रहे हैं। चबाए हुए को ही चबा रहे हैं। उनकी इन्द्रियां  वश में ना होने के कारण वे कई बार भोगे  हुए विषयों  को ही  बार बार भोगने के लिए संसार रूप घोर  नरक  की ओर जा रहे हैं। ऐसे लोगों की बुद्धि भगवान  में नहीं लगती।  उनको यह  बात मालूम ही नहीं कि हमारे  स्वार्थ और  परमार्थ केवल  भगवान विष्णु ही हैं।"
       हिरण्यकशिपु ने क्रोध में आकर प्रह्लाद को अपनी गोद से उठा कर भूमि पर पटक दिया  और दैत्यों को आदेश दिया  कि उसे मृत्यु दंड दिया जाए।  अनेकों  बार कई  शस्त्रों का  प्रयोग करने पर भी वो प्रह्लाद का कुछ नहीं बिगाड़ पाए।  उसे  मारने के अनेकों उपाए निष्फल होने पर  उसे  अंधेरी  कोठरी  में बंद कर दिया गया। उसका खाना तक बंद कर दिया गया।  पर  वो अडिग रहा। उसका निश्चय पक्का था।  हिरण्यकशिपु ने  कहा कि तीनों लोक मुझसे डरते हैं परंतु तू मेरा ही पुत्र होकर मेरे ही शत्रु की बड़ाई करता है। इस पर प्रह्लाद ने कहा  पिता जी जब आप अपनी इन्द्रियों को ही अपने वश में नहीं कर सके तो तीन लोक को वश में कर लेने से क्या लाभ। क्योंकि भगवान विष्णु सर्व शक्तिमान और सर्वत्र हैं।
                       हिरण्यकशिपु का उद्धार
        हिरण्यकशिपु ने कहा," यदि सर्वत्र हैं तो इस खंबे में क्यों नहीं ?" प्रह्लाद ने कहा," इस  खंबे में भी भगवान हैं।  वो कण कण में हैं।" इतना सुनते ही हिरण्यकशिपु ने क्रोध और आवेश में आकर पूरे ज़ोर से खंबे पर एक घूंसा मारा। उसी  समय एक भयानक शब्द हुआ। ऐसी ध्वनि उत्पन हुई जैसे ब्रह्मांड ही फट गया हो। प्रह्लाद को मारने के लिए आगे  बढ़ने ही वाला था कि उस भयंकर शब्द को सुन कर सन्न रह गया।  इधर उधर देखने लगा। कुछ दिखाई नहीं दिया।
      उसी  खंबे  में  से  एक  बड़ा ही वचित्र रूप धारण  करके भगवान  प्रकट हुए। भयंकर  सिंघनाद करते हुए  मनुष्य  और सिंह का विचित्र  रूप लेकर  भगवान नृसिंह  हिरण्यकशिपु के सामने खड़े  थे। भयानक  पीली  आंखें, लहराते हुए   गर्दन के बाल, छुरे जैसी जिह्वा, फूली हुई नासिका और पहाड़ की गुफ़ा के समान खुला हुआ मुख। अहंकार में बेसुध हिरण्यकशिपु ने देखते ही आक्रमण कर दिया। भगवान ने उसे पकड़ा, उठाया और सभा के दरवाजे पर लेजाकर अपनी जंघा पर लिटा लिया और अपने तीखे नखों से उसके पेट को चीर डाला। इस तरह से उस दैत्य का अंत हुआ। भगवान का रूप इतना डरावना था कि उनके सामने जाने की किसी की हिम्मत  नहीं  हो रही थी। तब ब्रह्मा  जी ने भगवान का क्रोध शांत करने के  लिए  प्रह्लाद को उनके सामने भेजा। प्रह्लाद को सामने पाकर भगवान शांत हो गए। प्रह्लाद ने भगवान की स्तुति की। उन्होंने उसे वर मांगने के लिए कहा। प्रह्लाद ने कहा कि मुझे कुछ नहीं चाहिए। अगर आप देना ही चाहते हो तो ऐसा वर  दीजिए  कि  मेरे  हृदय में कभी किसी कामना  का  बीज ही  अंकुरित  ना हो।  फिर  भी भगवान ने कहा कि मुझे पता है कि  तुम पुरी तरह से निष्काम हो, परंतु  मेरी प्रसन्नता  के  लिए  तुम  एक  मन्वन्तर  के लिए देत्याधिपती बने रहो और फिर मेरे पास आ जाओगे। तुम सदा मेरा ही ध्यान करते रहना। प्रह्लाद ने  भगवान को प्रणाम करके अपने पिता की शुद्धि के लिए प्रार्थना की। भगवान ने कहा कि जिसका वध मेरे द्वारा होता है  उसका उद्धार तो मैं उसी समय कर  देता हूँ।  ब्रह्मा जी  सहित  सभी ने  भगवान की स्तुति की और सब को आशिर्वाद देकर भगवान  अपने धाम को जाने के लिए अन्तर्ध्यान हो गए।
                    जय श्रीकृष्ण जी की

सोमवार, 2 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण, लेख संख्या-18 (अजामिल की कहानी)

       परीक्षित जी ने श्री शुकदेव  जी से पूछा कि ऐसा कौन सा उपाय है,  जिसके  करने से मनुष्य अपने द्वारा किए गए अधर्म के कारण  मिलने वाली  भयंकर  यातनाओं  से अपने आप को बचा सके। इसके लिए क्या प्रायश्चित करना चाहिए?
       श्री शुकदेव जी ने कहा:- " वस्तुत: कर्म  के  द्वारा ही कर्म का निर्बीज नाश नहीं होता क्योंकि कर्म का अधिकारी अज्ञानी है। अज्ञान  रहते  पाप  वासनाएं  सर्वथा मिट नहीं सकतीं। इस लिए सच्चा प्रायश्चित तो तत्व ज्ञान ही है। धर्मज्ञ और श्रद्धावान धीर पुरुष  तपस्या,  ब्रह्मचर्य,  इन्द्रिय दमन,  मन की  स्थिरता, दान, सत्य, बाहर-भीतर की पवित्रता  तथा  यम एवं नियम इन नौ साधनों से  मन वाणी और शरीर  के द्वारा किए गए  बड़े से बड़े पापों  को भी  नष्ट कर देते हैं।  भगवान की शरण  में रहने वाले  भक्त जन  जो विरले ही होते हैं  केवल भक्ति और आत्म समर्पण से ही उसी प्रकार भस्म कर देते हैं जैसे सूर्य कुहरे को।
       हे परीक्षित,  इस  विषय  में  महात्मा  लोग  एक  प्राचीन इतिहास कहा करते हैं। ध्यान से सुनो:-
                       अजामिल की कहानी
       कान्य कुब्ज  नगर (कन्नौज)  में  एक  अजामिल नाम का शास्त्रज्ञ  ब्राह्मण  रहता था। शील, सदाचार और सद्गुणों का तो वह ख़ज़ाना  ही  था।  ब्रह्मचारी,  विनई,  जितेंद्रिय, सत्य निष्ठ, मंत्रवेता  और  पवित्र  भी था।  उसने गुरु, अग्नि, अतिथि और वृद्ध जनों  की बड़ी ही सेवा  की  थी। अहंकार तो उसमें था ही नहीं।  वह  सबका  हितू,  कम  बोलने वाला,  दूसरों में दोष ना ढूंडनें वाला एवं उपकार करने वाला था।
                    अजामिल का नैतिक पतन
       एक दिन पिता के  आदेशानुसार  वह  वन  में होकर लौट रहा था। रास्ते में  उसने  एक  निर्लज्ज पुरुष को एक वैश्या के साथ विहार  करते  देख  मोहित  होकर   काम के  वशीभूत हो गया। वहीं अजामिल सब धर्म कर्म छोड़ केवल उसी का चिंतन करता। उसने प्रति दिन उसके पास जाना शुरू कर दिया। यहां तक कि अपनी पत्नी को भी छोड़ दिया  और अपने पिता की सारी संपत्ति भी उस वैश्या पर ही खर्च कर डाली। जब संपत्ति सारी समाप्त हो गई तो चोरी डकैती शुरू  कर  दी।  पिता  की मृत्यु के बाद तो वो  उसे  अपने  घर  पर ही ले आया। उसी से उसके 10 पुत्र भी हुए।
                 अजामिल पर एक साधु की कृपा
       जब अंतिम पुत्र होने वाला  था  तो  एक दिन  उसके  घर एक  साधु  पुरुष  रात  ठहरे। अजामिल  और उसकी पत्नी  ने उनकी बहुत सेवा की। साधु जाते जाते उस पर एक कृपा  कर गए। उसको  कह गए कि आने वाली संतान का नाम नारायण ही रखना। साधु की बात को  आशिर्वाद  मान  कर  अजामिल और उसकी पत्नी ने ऐसा ही किया।
                 यमदूतों और पार्षदों की बातचीत
       जब  अजामिल  की  वृद्ध  अवस्था  हो गई और मृत्यु की घड़ी पास आ गई तो एक दिन बहुत ही भयावने यमदूत उसको लेने के लिए आ गए। उनको देख  कर  वह  इतना डर गया कि घबरा कर पूरे ज़ोर से उसने अपने सबसे छोटे पुत्र नारायण को आवाज़ लगाई। नारायण! नारायण! जब उसके प्राणों को  बल पूर्वक  यमदूत  खींच  ही रहे  थे  तो  उसी समय श्री हरी के दो पार्षद भी  वहां  पहुंच  गए  और  उन्होंने  यमदूतों  को  उसका सूक्षम शरीर निकालने से रोक दिया। यमदूतों ने कहा कि," तुम कौन हो और हमें अपना  कार्य  करने से  क्यों  रोक  रहे  हो?"
इस पर  पार्षदों  ने  अपना  परिचय  देते  हुए  बताया  कि  हम भगवान विष्णु  के  दूत हैं और साथ ही पूछा कि आप हमें यह बताओ कि  " दण्ड  का  पात्र  कौन है?  क्या  सभी पापाचारी दंडनीय होते हैं ?" यमदूतों ने उत्तर दिया कि जितना पाप कोई करता है उसको उसका बनता दण्ड दिया जाता है।  यह पापी है तो दण्ड तो इसे मिलेगा ही। भगवान यमराज इसे दण्ड देंगे।
       पार्षदों ने कहा कि  इसने अपने पापों का  प्रायश्चित  कर लिया है। क्योंकि इसने विवश होकर ही सही, भगवान के परम कल्याण मय  मोक्षप्रद नाम का उच्चारण तो किया है। पाप की निवृत्ती  के  लिए तो  भगवान के नाम का एक अंश ही पर्याप्त है। भगवान का नाम अपना फल देकर ही रहता है।
                        अजामिल का उद्धार
       यह सुनकर यमदूत वहां से चले गए। अजामिल ने  स्वस्थ होने के बाद उस सत्संग के  प्रभाव से  तत्व ज्ञान  प्राप्त  करके प्रायश्चित आरंभ किया। योग के द्वारा  इन्द्रियों  को  विषयों  से हटाकर भीतर लीन कर लिया। मन और बुद्धि  को  मिला  कर भगवान परब्रह्म में  जोड़  दिया।  इस तरह  अंत में  वह  बैकुंठ धाम को प्राप्त हुआ।
       इसी लिए  कहते  हैं  कि  भगवान के  नाम  से ही  मनुष्य परमपद को प्राप्त कर लेता है। इस से बड़ा और कुछ भी  नहीं है। प्रायश्चित का भी यही  सबसे उत्तम  साधन है।  पर  इसका अर्थ यह  कदापि  नहीं लेना  चाहिए  कि  पाप  करते  रहें  यह समझ कर  कि  बाद  में  प्रयाष्चित  कर लेंगे। क्योंकि जिसको सच्चा पश्चाताप हो जाता है वह दोबारा कभी पाप नहीं करता।
                        जय श्रीकृष्ण जी की

रविवार, 1 दिसंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण - लेख संख्या -17( भगवान ऋषभ देव और उनके पुत्र भरत जी की कहानी )

                 भगवान ऋषभदेव जी का प्राकट्य
     मनु और शतरूपा के दो पुत्र हुए, प्रियव्रत और उत्तानपाद।
 उत्तान पाद के वंश का वर्णन आप ने पढ़ लिया है। अब आप पढ़ेंगे प्रियव्रत के वंश के बारे में। प्रियव्रत का पुत्र अग्निध्र हुआ और  उसका  हुआ नाभि  और उसके हुए भगवान ऋषभ देव।
ऋषभ  का अर्थ होता है,  श्रेष्ठ।  पुराण  में  बताया गया है कि जन्म से  ही  उनके अंगों पर  विष्णु जी के  वज्र, अंकुश आदि चिन्ह  दिखाई देते थे।  एक बार ईर्ष्या वश  इन्द्र ने  बारिश नहीं की। तब भगवान ऋषभदेव ने योग माया से ख़ूब जल बरसाया
था। ऋषभदेव जी का  विवाह  इन्द्र की कन्या जयंती से हुआ।
इनके 100 पुत्र हुए।  सबसे बड़े पुत्र थे  भरत  जिनके नाम से हमारे भारत वर्ष का नाम पड़ा था।
                      ऋषभदेव जी का उपदेश
     ऋषभदेव जी का अपने पुत्रों के नाम  उपदेश  साधकों  के लिए  बहुत ही  प्रेरणादायक  है।  उन्होंने  कहा है," देहाभिमान् और दाम्पत्य भाव दुर्भेद्य ग्रंथियां हैं। इनको बेधने पर ही मनुष्य ' मैं और मेरे पन ' को त्याग कर परम पद को प्राप्त कर सकता है।
     मनुष्य को चाहिए  कि वह तत्व जिज्ञासा, तप, कर्म, कथा, सकाम् कर्म  का  त्याग,  भक्तों का संग, वैर त्याग, संयम और ब्रह्मचर्य आदि से मेरे ही परायान हो जावे और योग साधना से अहंकार रूप अपने लिङ्ग शरीर को लीन कर दे। इस तरह कर्म बंधन जो  अविद्या  से प्राप्त है,  उसे काट  डाले। अर्थात हृदय ग्रंथी को काट डाले। और फिर साधन को भी त्याग दे।
     जो  मनुष्य  अपने  प्रिय  संबन्धी  को  बड़े  ही  प्यार  से  भगवतभक्ति का उपदेश देकर मृत्यु की फांसी से नहीं छुड़ाता, वह सच्चा सज्जन, पिता, माता, गुरु या इष्ट नहीं है।
     ऋषभदेव जी  द्वारा  लंबे  समय  तक शासन करने के बाद उन्होंने अपने  बड़े  पुत्र भरत को राज्य सौंपा और स्वयं विरक्त और दिगम्बर  हो  गए।  अंत में  जंगल की  अग्नि में  ही अपने शरीर का त्याग किया और परमपद प्राप्त किया।
                          भरत चरित्र
     भरत का  विवाह  विश्वरूप की  कन्या  पंचजनी  से हुआ। इनके पांच पुत्र हुए। अजनाभ क्षेत्र का नाम भारत वर्ष इन्हीं के समय में पड़ा। चिर काल तक  धर्म पूर्वक  राज्य भोग कर हरि हर क्षेत्र के पुलहा आश्रम में चले गए। तपस्या के बल पर सभी अभिलाषाओं  से  निवृत्ती  पा  ली ।  उनमें  भक्ति  योग  का आविर्भाव हुआ।
        भरत जी को अगले जन्म में हिरन का शरीर मिला
      एक  दिन  एक  गर्भवती हिरनी नदी को पार कर रही थी। पानी के वेग के  कारण  उसका गर्भ गिर गया।  हिरनी तो मर गई  परंतु बच्चे को भरत जी ने बचा लिया। यह सोच कर  कि  इसकी  रक्षा  करना  अब  उनका  उत्तरदायित्व है उन्होंने  उसे  अपने  साथ  ही  रख  लिया और उसकी सेवा करने लगे। धीरे धीरे  उस  बच्चे से  मोह जागृत हो गया। हर  समय  उसी  का  ध्यान  रहता।  एक  दिन  जब  वो थोड़ा  बड़ा  हुआ  तो  दूसरे हिरनों के झुंड के साथ ही कहीं चला गया। बहुत ढूंडने पर भी वो हिरन का बच्चा नहीं मिला। भरत की स्मृति में वो ऐसा बैठा कि मृत्यु के समय भी उनको उसकी स्मृति बनी रही।  कहते हैं कि  मृत्यु के समय  जैसी स्मृति बनी हो वैसा ही अगला शरीर प्राप्त  होता है।  इस तरह भरत जी को भी दूसरे जन्म में हिरन का शरीर  प्राप्त  हुआ  परंतु उनको पहले जन्म की स्मृति बनी रही  और  वो  भगवान  का  ध्यान  करते रहे। इस लिए उनका अगला जन्म फिर से मनुष्य के रूप में हुआ।
               तीसरा जन्म जड़ भरत के रूप में
     इस जन्म में उनका नाम था जड़ भरत। उन्होंने सांसारिक विद्या ग्रहण नहीं की। वे सदा सब की सेवा करते और बड़ी ही सादगी और नम्रता  से रहते थे।  पिता की मृत्यु  के बाद  खेतों में ही रखवाली करते रहते थे।  सब की  सेवा करना ही उनका काम था। एक दिन  कुछ लोग  देवी को बलि देने के लिए उसे पकड़ कर ले गए।  जैसे ही  उनकी बलि दी जाने लगी, देवी ने प्रकट होकर बलि देने वाले सभी लोगों का वध कर डाला और जड़ भरत को  छोड़ दिया।  वहां से  फिर वो वापिस घर नहीं गए और आगे जंगल की ओर चल दिए।
                 जड़ भारत और राहुगण संवाद
     सिंधु सौवीर नाम के देश का राजा राहुगण पालकी में बैठ कर जा रहा था। जब इक्षुमती नदी के किनारे पहुंचा तो उसका एक कुहार बीमार हो गया।  राजा की आज्ञा से उसके आदमी जड़ भरत को  पकड़  कर ले आए  और उसे कोहार के स्थान पर पालकी उठाने के  लिए लगा दिया।  अब  जड़ भरत धरती पर छोटे छोटे  जीवों को  बचाते हुए चलने लगे।  जब पालकी अधिक हिल जाती और संतुलन बिगड़ जाता तो राजा नाराज होकर उसे बुरा भला कहते।  जब ऐसा बार बार हुआ तो राजा ने कहा," तुम्हें अधिक भार लग रहा है! इतने मोटे हो तुम! उस पर तू मेरी आज्ञा  का  उलंघन  भी  कर रहा है! तुझे पता है मैं तुझे मौत की सज़ा भी दे सकता हूं।
     जड़ भरत ने उत्तर दिया," यदि भार नाम की कोई वस्तु है तो ढोने वाले के लिए है।  यदि कोई मार्ग है तो वो चलने वाले के लिए है। यदि मोटापन है  तो  शरीर के लिए कहा जाता है, आत्मा के लिए नहीं। ज्ञानी जन ऐसी बात नहीं करते।
     स्थूलता, कृशता, आधि, व्याधि, भूख, प्यास, भय, कलह, इच्छा, बुढ़ापा, निद्रा, प्रेम, क्रोध, अभिमान  और शोक आदि सब धर्म देहाभिमान को लेकर उत्पन्न होने वाले जीव में रहते हैं। मुझ में इनका लेशमात्र भी नहीं है।
     जहां तक मरने की बात है तो  सभी  विकारों वाले  पदार्थ आदि और अंत वाले हैं। जहां तक  स्वामित्व  और  सेवक की बात है,  तो परमार्थ  की  दृष्टि  से  तो  कोई  भेद  नहीं। अगर व्यव्हार में ऐसा है भी तो मुझ जड़ और प्रमादी को शिक्षा देना, पिसे हुए को पीसना ही होगा।"
     शुकदेव जी कहते हैं कि जड़ भरत  इतना कह कर मौन हो गए।  राहुगन  था  तो  श्रद्धावान,  अहंकार  का  पर्दा  हटा  तो तत्काल पालकी से उतर पड़ा। चरणों में सिर नवाकर पूछा तुम कौन हो? कहीं मेरा कल्याण करने के लिए आप कपिल जी ही तो नहीं हैं?
                राहुगण को भरत जी का उपदेश
    " विश्यासक्त  मन  जीव  को संसार संकट में डाल देता है। विषय हीन होने  पर  वही उसे शांतिमय मोक्ष पद प्राप्त करवा देता  है।  दस  इन्द्रियां  और  एक अहंकार मन की वृत्तियां हैं। पांच प्रकार के कर्म , पांच तन्मात्रा और एक शरीर यह ग्यारह उनके आधारभूत विषय कहे जाते हैं।
     ज्ञान इन्द्रियों के विषय हैं:- गंध, रूप, स्पर्श, रस और शब्द। यही पांच तन्मात्रा भी कहलाते हैं।
    कर्म इन्द्रियों के विषय हैं:- मल त्याग, संभोग, गमन, भाषण और लेना- देना।
    शरीर को यह मेरा है इस प्रकार स्वीकार करना अहंकार का विषय है।
      यह मन की ग्यारह वृत्तियां द्रव्य (विषय), स्वभाव, आशय (संस्कार), कर्म और काल के द्वारा करोड़ों भेदों में परिणित हो जाती हैं। किन्तु इनकी सत्ता जीवात्मा की सत्ता से ही है। स्वत: या परस्पर मिल कर नहीं। विशुद्ध जीवात्मा, साक्षी रूप से मन की वृत्तियों को देखता रहता है।
      यह क्षेत्रज्ञ परमात्मा (जीवात्मा)  सर्वव्यापक,  जगत  का आदि कारण,  परिपूर्ण, अपरोक्ष, स्वयं प्रकाश, अजन्मा, ब्रह्मा आदि का  भी नियंता  और अपने  आधीन रहने वाली माया के द्वारा सबके भीतर  रहकर जीवों  को प्रेरित करने वाला समस्त भूतों का आश्रय रूप भगवान वासुदेव है।
     यह भी सत्य है कि  भगवान  इस संपूर्ण प्रपंच में ओतप्रोत भी हैं। इस लिए  हे राजन  जब  तक मनुष्य  ज्ञानोदय के द्वारा इस माया  का तिरस्कार कर,  सबकी  आसक्ति छोड़ कर तथा काम, क्रोध आदि छ: शत्रुओं को जीतकर आत्म तत्व को नहीं जान लेता और  जब  तक  वह आत्मा  के उपाधि रूप मन को संसार - दुःख का कारण  नहीं समझता तब तक वह इस लोक में यों ही भटकता रहता है। क्योंकि यह चित्त उसके शोक, मोह रोग, राग, लोभ और  वैर  आदि  के  संस्कार  तथा  ममता की वृद्धि  करता  रहता  है।  मन  यद्यपि स्वयं तो सर्वथा मिथ्या है, तथापि इसने तुम्हारे आत्म  स्वरूप को आच्छादित कर रख्खा है।  इस लिए  तुम सावधान होकर गुरु और श्री हरि के चरणों की उपासना के अस्त्र से इसे मार डालो।"
                         जय श्रीकृष्ण जी की