शनिवार, 30 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या-16(मैं कौन हूं, राजा पुरांजन की प्राचीन कथा)

       पिछले लेख में आप ने पढ़ा था कि ध्रुव जी के बाद उनके वंश में कौन  कौन से राजा हुए। भगवान पृथु जी के बारे में भी पढ़ा और  लेख के अंत में  आप  राजा बहीर्शद (प्राचीन बर्हि) को  नारद  जी द्वारा दिए  उपदेश  के बारे में पढ़ रहे थे।  राजा प्राचीन बर्हि  ने  अपने जीवनकाल में अनेक यज्ञ किए। नारद जी ने एक  दिन  प्रकट होकर  राजा को  उपदेश दिया कि " हे राजन  आप  केवल   कर्म  ( यज्ञ आदि )  कर  रहे  हो।  और परमानन्द केवल कर्मों से नहीं मिलता। यज्ञों में जो तुम पशुओं की बलि देते हो, वो तुम से बदला लेने की फ़िराक में हैं।"
       राजा ने  कहा," हे ऋषिवर  मेरी बुद्धि  तो केवल कर्मों में बंधी हुई है। मुझे परम कल्याण का कुछ भी ज्ञान नहीं है। अब आप ही कृपा करके मुझे परमानन्द प्राप्ति का साधन बता कर कृतार्थ करें।"
       नारद जी कहते हैं," अच्छा अब मैं तुम्हें जीव,  परमात्मा, कर्म,  यज्ञ,  बली  और  परमानन्द आदि के बारे में एक प्राचीन उपाख्यान  सुनाता हूँ, जो राजा  पुरञ्जन  का  चरित्र  है।  तुम सावधान होकर सुनो।"
               पुरंजनोपाख्यन् ( पुरंजन की कथा )
       पूर्व  काल में पुरांजन्  और  उसका मित्र अविज्ञात  इकट्ठे रहते थे। वे  दोनों  चिर काल तक  बड़े  सुख पूर्वक  रह रहे थे।
पूरंजन् के मन में अचानक भोग भोगने की इच्छा हुई। मित्र के रोकने पर भी वह नहीं माना और ऐसी पुरी(नगर) की खोज में निकल पड़ा  जिस में  वह  संपूर्ण भोगों को, जी भर कर  भोग सके। वह  नगर नगर घूमा।  अंत में उसे एक ऐसा प्रदेश मिला जहां उसे  लगा कि  उस स्थान पर  वह इच्छा अनुसार जितना चाहे भिन्न भिन्न भोगों का भोग कर सकता है। उस नगर के नौ दरवाजे थे। यह नगर नागो की राजधानी  भोगपुरी  के  समान जान पड़ता था जो कि बहुत ही सुंदर और कुदरत का खजाना था। जैसे ही नगर की ओर राजा ने कदम बढ़ाया वहां पर उसने एक सुंदरी को देखा। उसके दस सेवक और एक प्रधान सेवक था जो कि महाबली था। एक पांच मुख  वाला  नाग  भी  नगर की रक्षा करता था। राजा ने उस सुंदरी से पूछा कि वह कौन है और यह भी बताया कि वह उस पर  मोहित  हो  गया  है। उस स्त्री ने उत्तर दिया कि  वह  स्वयं  नहीं  जानती  कि  वह  कौन है,किसने उसे उत्पन्न किया है और यह पुरी किसने बनवाई है।
उसने यह भी कहा कि जब वह सो जाती है तब भी  यह  पांच मुख वाला नाग उसकी रक्षा करता है। यह भी कहा कि वह भी उस नौजवान पर मोहित है और वे दोनों एक साथ  उस  नगरी में चिर काल तक इकट्ठे निवास कर सकते हैं। उसने आगे कहा कि," आप को विषय भोगों की इच्छा है और मैं अपने साथियों के साथ सभी  प्रकार  के  भोग  प्रस्तुत करती रहूंगी। आप नौ द्वारों वाली  इस  पुरी  में  प्रस्तुत  किए  हुए  इच्छित भोगों को भोगते हुए सेंकड़ों वर्षों तक निवास कीजिए। इसके इलावा दो अंधे  नागरिक  हैं  जो  बाहर  जाने  आने और  कार्य  करने में आपकी सहायता करेंगे। जब आप अंत:पुर में होंगे तो मैं और हमारी होने वाली संतानें आपको प्रसन्नता एवं हर्ष देंगे।"
       राजा ने  उस सुंदरी की बात मानकर  उसी पुरि में  रहना आरंभ कर दिया।  भोग  विलास  पूर्ण  जीवन  जीते हुए जैसा जैसा रानी कहती वैसा वैसा ही राजा करता। उन्हीं नौ द्वारों से राजा  बाहर  जाता और वापिस अंत:पुर में आ जाता। अपनी स्त्री और संतानों में उसका मन पूरी तरह रम् गया।
       उधर उसकी नगरी पर गंधर्व राज चंडवेग ने अपनी बहन काल कन्या,  भाई प्रज्वार,  पैदल  सैनिकों,  360 सेवक और 360 सेविकाओं के साथ  पुरी  को  समाप्त करने के लिए बार बार आक्रमण  करने शुरू  कर दिए।  प्रति  दिन पुरी का पतन होना शुरू हो गया। आखिर एक दिन  आक्रमणकारियों ने बूढ़े सांप से सुरक्षित पुरी  को चारों ओर से घेर लिया। काल कन्या बलात् उस पुरी  की  प्रजा  को  भोगने लगी।  राजा पीड़ा और चिंता में डूब  गया। उस समय ' मैं और मेरे पन'  का भाव बड़ा ही तीव्र था।  आक्रमणकारियों  ने  पुरी  को चारों ओर से आग लगा दी।  उसी  समय  उसकी  रक्षा करने  वाला सांप भी उसे छोड़ कर भाग गया। राजा को उस समय भी स्त्री की याद बनी हुई थी। इस प्रकार राजा की मृत्यु हो गई। कोई पुण्य ना किया होने के कारण नरक में जाना पड़ा। तत्पश्चात उसे विधर्भ राज की कन्या के  रूप में स्त्री शरीर  मिला।  बड़ी  होने पर उसका विवाह महाराज मलय ध्वज  के साथ हुआ।  संतान प्राप्ति भी हुई। इस जन्म में उसने भगवान  की  अराधना की। जब मलय ध्वज अपनी संतान को  राज्य सौंप कर तपस्या के लिए वन में गए तो वह भी उनके  साथ ही  गईं।  जब मलय ध्वज की मृत्यु हुई तो उसने भी सती होने की सोची।उस समय उसने ईश्वर को याद  किया। उसी  समय एक आत्म् ज्ञानी  ब्राह्मण वहां आया और उसने उस स्त्री को कहा कि 'मैं तेरा पुराना मित्र आविज्ञात हूं। तुम  पृथ्वी के भोग भोगने के लिए  निवास स्थान की खोज में मुझे  छोड़  कर चले गए थे। हम  एक  दूसरे  के मित्र मानस निवासी हंस थे।हम सहस्र वर्षों तक बिना निवास स्थान के ही रह रहे थे।संसार में आकर तुम अपने स्वरुप को भूल गए।'
       तुम अपने आप को ना तो स्त्री समझो और ना पुरुष। मैं ईश्वर हूं और तुम जीव हो। अपने आप को मुझ से अलग मत समझो। इस तरह आत्म ज्ञान प्राप्त कर पुरञ्जन् भी हंस बन कर अपने स्वरुप में स्थित हुआ।
                   पुरंजनोपाख्यान का तात्पर्य
       नारद  जी  कहते  हैं कि  जीव सबसे बड़े सुख, नित्यानंद परमात्मा  के पास  ही  रहता  है।  परंतु  जब  माया के प्रभाव से उसे भोग  भोगने  की इच्छा होती है और वो समझता है कि सुख केवल शरीर प्राप्त करने से ही मिलता है तो वह शरीर की तालाश करने के लिए निकलता है। शरीर धारण करने के बाद वह भूल जाता है कि सभी सुखों का जनक केवल ईश्वर ही है। माया के प्रभाव में पड़ कर भोग विलासों में डूबा रहता है। और फिर अपने द्वारा किए गए अच्छे  और बुरे कर्मों के कारण बार बार जन्म लेता और  शरीर छोड़ता रहता है अर्थात आवागमन के चक्कर  में पड़ा  रहता  है। इस  कुचक्र से निकलने के लिए केवल ईश्वर की आराधना ही एक मात्र उपाय है।
       राजा पुरञ्जन् की कहानी में भी यही बताया गया है। इस कहानी में  अविज्ञात  ईश्वर को कहा गया है। पुरांजान जीव है। पुरी (नगर), पिंड  अर्थात  शरीर को कहा गया है। सुंदरी, बुद्धि या अविद्या को कहा है।  इसी से 'मैं और मेरे पन' का अहसास होता है। 10 सेवक,  इन्द्रियों ( पांच ज्ञान इन्द्रियां - कान,नाक, जिह्वा, नेत्र और त्वचा एवं पांच कर्म इन्द्रियां - मुख, हाथ, पैर, गुदा और जननेन्द्रिय) को कहा गया है। रक्षा करने वाला पांच फन वाला नाग, प्राणवायु (पञ्च प्राण) को कहा गया है। प्राण पांच प्रकार के हैं -
1. प्राण - यह नाक के अगले भाग में रहता है, सामने से आता है।  2. अपान - गुदा आदि  स्थानों  में  रहता  है। यह नीचे को जाता है। 3. व्यान - संपूर्ण  शरीर  में रहता है। सब ओर जाता है। 4. उदान - गले में रहता है। ऊपर की ओर जाता है।
5. समान - भोजन को पचाता है।
ग्यारवें सेवक के रूप में ' मन ' को कहा गया है।
नगरी या पुरी के 9 द्वार हैं - दो आंखें, दो कान, दो नासिका छिद्र, मुख, गुदा और जननेन्द्रिय।
अंधे नागरिक जो राजा की सहायता करते है वो हैं हाथ और पैर।
         इस  प्रकार राजा (जीव),  सुंदरी (बुद्धि या अविद्या)  के अधीन हुआ, प्रधान सेवक (मन) और दस सेवक (इन्द्रिओं) के वश  में होकर  संतान (विकारों) को  जन्म देता है। और सारी आयु  उन्हीं के साथ खेलता रहता है। इस तरह हर्ष, दुःख,सुख आदि में जीवन व्यतीत करता है  और अनेक जन्मों तक  इसी चक्र में पड़ा रहता है।
गंधर्व राज चंड वेग,  मृत्यु रूप काल चक्र को ;  काल कन्या, वृद्धावस्था  को ;   प्रज्जवर, शीत  एवं  उष्ण ज्वर को;  पैदल सैनिक,  आधि (मानसिक रोग)  और  व्याधि (शारीरिक रोग) को; 360 सेवक, साल के दिनों और 360 सेविकाएं, साल की रात्रियों को कहा गया है। चंद्र वर्ष में 360 दिन होते हैं। इसी लिए चंद्र वर्ष में अधिक मास भी आता है।
       जैसे ही जीव शरीर धारण करता है, उसी दिन से ही मृत्यु रूप काल चक्र का कार्य भी शुरू हो जाता है। काल के रूप में दिन  और  रात्रियां  निकलती जाती हैं। शरीरक और मानसिक रोग  उसे  वृद्धावस्था और  मृत्यु की ओर ले जाना  आरंभ कर देते हैं  परंतु  जीव माया के जाल में  फंसे होने  के  कारण इस चक्र को  समझ  नहीं  पाता है  और  अपने  असली घर  और परमात्मा को भूला रहता है। बार बार इसी जन्म मरण के चक्र में घूमता रहत है।
        इस  प्रकार  नारद  जी ने  राजा बरहिषद को बताया कि केवल  कर्मों के द्वारा  तुम शांति,  परमपद या मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते।  व्यक्ति की  मृत्यु कभी भी हो सकती है। इस लिए उसे  समय रहते  अंतर्मुखी  हो जाना चाहिए।  यह स्थूल शरीर लिंग शरीर के आधीन है।
       लिङ्ग शरीर  का  अर्थ :-  पांच  तनमत्राओं  (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध) से बना और मन, बुद्धि, पांच ज्ञान इंद्रियों, पांच  कर्म इंद्रियों  एवं  पांच प्राण से विकसित यह त्रिगुणमय संघात ही लिङ्ग  शरीर है।
       लिङ्ग शरीर ही - शोक,  दुःख,  सुख आदि अनुभव करता है। मृत्यु  के बाद जब तक  दूसरा  स्थूल शरीर नहीं मिल जाता तब तक  इसका संबंध पिछले शरीर की यादों से बना रहता है। इस लिए तुम कर्मों का त्याग करो और अंतर्मुख होकर भगवान की  आराधना  करो।  इस  उपदेश  को  सुनते ही प्राचीन बर्हि  (बारहिशद) को समझ में आ गया कि ' मैं कौन हूँ '। वह सभी प्रकार के सांसारिक साधनों का परित्याग करके तपस्या करने कपिल आश्रम चले गए।
                          जय श्रीकृष्ण जी की
     
     



गुरुवार, 28 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या-15(ध्रुव वंश एवं विष्णु अवतार, सम्राट पृथु जी)

                         ध्रुव जी उत्तराधिकारी
       ध्रुव जी  के बाद  उनके बड़े पुत्र  उत्कल ने राज्य स्वीकार नहीं किया।  ध्रुव जी के छोटे पुत्र  वात्सर राजा बने उनके बाद उनके पुत्र पुष्पार्ण और फिर उनके पुत्र व्युष्ट राजा बने।व्युष्ट के सर्वतेजा  और आगे  उनके  चक्षु  नामक  पुत्र राजा बने। यही राजा चक्षु ही चक्षुष नामक मन्वन्तर के मनु भी हुए। उनके पुत्र उल्मुक और उनके आगे अंग नामक पुत्र राजा बने।
       अंग की  पत्नी सनीथा ने  क्रूर कर्मा  वेन को जन्म दिया। वेन के कर्मों से तंग आकर  अंग ने भी  अपने नगर का  त्याग कर दिया। नगर को राजा वहीन देख कर भृगु आदि मुनियों ने माता सुनीथा से परामर्श कर वेन को राजा बना दिया। वह बड़ा ही निरंकुश राजा साबित हुआ। उसके द्वारा प्रजा पर किए जा रहे  अत्याचारों  को  देखते  हुए  ऋषियों  ने उसे समझाने का प्रयत्न  किया  तो  उल्टा  उसने  उनको  ही  मूर्ख बताया। तब ऋषियों के श्राप से वेन की मृत्यु हो गई।
                      भगवान पृथु का प्राकट्य
       राजा के ना रहने पर ऋषियों के द्वारा मरे  हुए  राजा वेन की भुजाओं  को  मथने  से  भगवान  विष्णु जी ने पृथु नामक बालक के रूप में अपना अंशावतार धारण किया। बंदिजनों ने उसी समय भगवान की स्तुति की।
       जब पृथु राजा बने उस  से  पहले  पृथ्वी अन्न पैदा करना बंद कर  चुकी  थी।  जब  राजा  पृथु  पृथ्वी पर कुपित हुए तो पृथ्वी ने प्रकट होकर भगवान की स्तुति की। पृथु जी प्रसन्न हुए और उन्होंने पृथ्वी को  पुत्री  के रूप में  स्वीकार किया। इसके बाद राजा  पृथु  ने पृथ्वी  को  समतल  किया। उसमें से अनेक प्रकार  की  औषधियों  का  दोहन किया। पृथ्वी ने भरपूर अन्न उगाना शुरू कर दिया।
       राजा पृथु ने 100 अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प लिया। 99  यज्ञ  पूरे होने  के पश्चात  जब वो सौवां यज्ञ करने लगे तो इन्द्र देवता ने विघ्न डालना शुरू कर दिया। जब राजा को पता चला तो  वो  इंद्र का वध  करने के लिए  तैयार  हो गए।  तभी ब्रह्मा जी ने उन्हें समझाया और ऐसा करने से रोका।
       तभी  यज्ञशाला में ही  भगवान विष्णु  का प्रादुर्भाव हुआ। इन्द्र ने अपने किए पर पश्चाताप किया।
       राजा पृथु  ने  अपनी प्रजा का  सनेहपूर्वक  पालन किया, उनको भगवान में  प्रीति रखने और अच्छे आचरण का उपदेश भी किया। राजा स्वयं कर्म करते हुए भी निर्लेप रहते थे।
       पृथु के  पांच पुत्र  हुए।  लंबे समय तक  शासन करने  के उपरांत  राज्य  भार  पुत्रों  को सौंप कर  अपनी भार्या के साथ तपोवन चले गए। पहले कंद मूल खाकर, फिर पत्ते आदि, फिर जल  पीकर  और फिर केवल वायु के सहारे  घोर तपस्या की। अंततोगत्वा दोनों भगवान के परमधाम को पधारे।
       पृथु के बाद उनके पुत्र विजाश्व राजा बने। उन्होंने इन्द्र से अन्तर्ध्यान  होने की  शक्ति पाई।  इस लिए  उनको  अन्तर्ध्यान नाम से भी  जाना जाता है।  इन्होंने भी तपस्या करके परमपद प्राप्त किया।  उनके  पुत्र हुए हविर्धान  और उनके बहिर्षद जो प्रजापति भी बने।  उन्होंने  बहुत से यज्ञ किए। प्रचिंबरही नाम से भी  प्रसिद्ध  हुए।  ब्रह्मा जी  के कहने पर  समुद्र की  कन्या शतदृती  से  उन्होंने  विवाह  किया  जिससे  प्रचेता  नाम   से विख्यात दस पुत्र हुए। वो दसों समुद्र में तपस्या करने चले गए।उन्होंने  महादेव जी से  तत्व का उपदेश पाया और महादेव जी के  बताए  दिशानिर्दशों  के अनुसार  दस हज़ार  वर्ष तक घोर तपस्या की। बहिर्शद के छ: और पुत्र भी हुए।
       इसी राजा बहीर्षद को नारद जी ने राजा पुरंजन की बहुत ही रुचिकर  और प्रेरणादायक कहानी सुनाई जिसको सुनने से आज  भी  व्यक्ति  को  ' मैं क्या हूं '  का ज्ञान हो जाता है। इस कहानी का वर्णन अगले लेख में किया जाएगा।
                       जय श्रीकृष्ण जी की

गुरुवार, 21 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण, लेख संख्या - 14 (भक्त ध्रुव जी की कथा)

                  ध्रुव से सौतेली माता दुर्व्यवहार
भागवत के अनुसार ब्रह्मा जी ने अपने में से ही एक पुरुष  मनु और एक स्त्री शतरूपा को  उत्पन्न किया।  मनु और  शतरूपा की तीन पुत्रियां हुईं। उनके बारे में पिछले लेखों में  बता  दिया गया है। मनु के दो पुत्र हुए, जिनके नाम  थे, एक  का  प्रियव्रत और दूसरा उत्तान पाद। राजा ऊत्तान पाद की दो पत्नियां  थीं। उनके नाम थे सुनीति और सुरुचि।  सुरुचि  राजा  को  अधिक प्रिय थी। उसके पुत्र का नाम  था  उत्तम।  सुनीति  के  पुत्र  का नाम था ध्रुव। सुरुचि, सुनीति और उसके  पुत्र  ध्रुव  से  नफरत करती थी। एक दिन जब ध्रुव केवल पांच वर्ष  का  ही  था, वह अपने पिता जी के पास उनकी गोद में बैठने की इच्छा से गया। पास ही उसकी दूसरी माता सुरुचि भी बैठी  थीं।  राजा  ने  भी ध्रुव का स्वागत नहीं किया और सुरुचि  ने  तो  यहां  तक  कह दिया कि," बच्चे तू राज सिंहासन पर बैठने का अधिकारी नहीं है।  तू भी, है तो राजा का ही बेटा, परंतु मैंने तुझे अपनी कोख में धारण नहीं किया। अर्थात तू मेरा बेटा नहीं  है। अरे  तूने  तो किसी दूसरी स्त्री के गर्भ से जन्म लिया है, और नादान होने के नाते ही तू ऐसे दुर्लभ विषय की इच्छा कर  रहा  है।  यदि  तुझे राज सिंघासन की इच्छा है तो  जा  और  तपस्या  करके  परम पुरुष श्री नारायण की आराधना कर और उनकी  कृपा  से  मेरे गर्भ में आकर जन्म ले।"
           माता के वचन सुनकर तपस्या के लिए जाना
सुरुचि की इस बात पर पिता कि चुप्पी यह सिद्ध करती थी कि वो भी इस बात से सहमत हैं।  ध्रुव  चुप  चाप  वहां  से  अपनी माता सुनीति के महल में चले गए। सारी बात माता सुनीति को बताई। माता ने सुना तो व्याकुल हो गईं। अश्रुधारा  बहने  लगी परंतु पुत्र से कहने लगीं, " हां बेटा तेरी  दूसरी  माता  ठीक  ही कहती हैं। राजा तो मुझे दासी के लायक भी नहीं मानते।  यदि तू उत्तम के समान राज सिंघासन पर बैठना चाहता  है  तो  श्री नारायण भगवान की आराधना में लग जा। तेरे  परदादा  ब्रह्मा जी और दादा स्वायंभुव मनु जी ने भी यही किया था। इस लिए तू भी भगवान का आश्रय ले। तू केवल अपने पवित्र  हुए  चित्त में पुरषोत्तम भगवान को बैठा ले, अन्य  सब  का  चिंतन  छोड़ कर, केवल उन्हीं का भजन कर।" यह सुनकर, ध्रुव ने माता के वचनों को हृदय में धारण किया और  जंगल  की  ओर  निकल पड़े।
                 ध्रुव को नारद जी का आशिर्वाद
जंगल की ओर जाते हुए रास्ते में ध्रुव को आशीर्वाद  देने  नारद जी का आगमन हुआ। आते ही नारद जी ने अपना पापनाशक कर कमल मस्तक पर फेरा। नारद जी ने कहा, " बेटा तू  अभी बच्चा है,कर्मों के अनुसार मान अपमान  मिलता  है।  तुम  हर परिस्थिति में संतुष्ट रहो। यह तपस्या की डगर बड़ी कठिन  है। बड़ा होकर तपस्या भी कर लेना। तुम्हारे लिए यही शुभ है  कि तुम सभी से मित्रता का भाव रक्खो।"
        ध्रुव ने कहा," मुझ अज्ञानी को आप  का  ज्ञान  समझ में नहीं आएगा। हे ब्राह्मण मैं उस पद पर अधिकार करना चाहता हूं जो त्रिलोकी में सब से श्रेष्ठ है और जिस पर  मेरे  बाप  दादा भी आरूढ़ नहीं हो सके। आप मुझे उसी की  प्राप्ति  का  कोई अच्छा सा मार्ग बता दीजिए।  क्योंकि  संसार  के  कल्याण के लिए ही आप तो त्रिलोकी में विचरते हैं।"
       नारद जी ध्रुव का दृढ़ संकल्प देख  कर  अति  प्रसन्न  हुए और उपदेश करने लगे कि जैसा तेरी माता सुनीति ने कहा है तू वैसा ही कर। अभिलाषा पूरी करने के लिए श्री हरि  के  चरणों का सेवन ही एक मात्र उपाय है। अब तुम श्री यमुना जी के तट वर्ती परम पवित्र मधुवन में जाओ, क्योंकि वहां पर श्री हरी का नित्य निवास है। नारद जी ने तपस्या  करने  की  विधि  बताई। रूप ध्यान करने के लिए  भगवान  का  स्वरूप  भी  बतलाया। रूप ध्यान और मंत्र जाप  की  विधि  समझाते  हुए, जपने  के लिए द्वादश अक्षर मंत्र  भी दिया,"ॐ नाम: भगवते वासुदवाय"
             उत्तानपाद को नारद जी द्वारा सांत्वना
इतना कहकर नारद जी अन्तर्ध्यान हो गए और उधर घर में भी उत्तानपाद को अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ। तभी नारद जी ने प्रकट हो कर उसको सांत्वना देते हुए कहा कि  तेरा  पुत्र शीघ्र ही सफल होकर वापस आएगा। इस लिए तुम  चिंता  को त्याग दो और शुभ समय की प्रतीक्षा करो।
                      ध्रुव द्वारा घोर तपस्या
उधर ध्रुव ने मधुवन पहुंचकर यमुना जी में स्नान करने के  बाद एकाग्रचित्त होकर उपासना शुरू की।  चार  महीने  तक, पहले फल खाकर, फिर केवल  सूखे  पत्ते  और  घास  खाकर,  फिर केवल पानी पीकर और फिर केवल हवा ग्रहण  कर  उपासना, भजन और आराधना की। पांचवें महीने में श्वास  जीतकर, पार ब्रह्म का चिंतन करते हुए एक पैर पर निश्चल भाव  से  खड़े  हो गए। मन को सब ओर से खींच लिया। तीनों  लोक  कांप  उठे। उनके अंगूठे से आधी पृथ्वी झुक गई। अनन्य बुद्धि से श्री  हरि का ध्यान करने लगे। उनकी समष्टि प्राण से अभिन्नता  हो गई। सभी जीवों का प्राण रुकने लगा। श्री हरि प्रसन्न हुए।
            ध्रुव को भगवान के दर्शन और आशिर्वाद
श्री हरि ध्रुव को दर्शन देने के लिए आ पहुंचे। जैसे ही  श्री  हरी ने ध्रुव को आंखें खोलने के लिए कहा तो आंखें खोलते ही ध्रुव ने वही मूरत बाहर भी देखी जिसको वह थोड़ी देर  पहले  तक अंदर देख रहे थे। ध्रुव हरि दर्शन करके आनंदित हो  गए। अब
छोटे से बालक ध्रुव भगवान की स्तुति  करना  चाहते  हैं  परंतु  करनी नहीं  आती।  भगवान  ने  जान  लिया  कि  ध्रुव  अपनी प्रसन्नता व्यक्त करना चाहते हैं परंतु उनके पास  शब्द  नहीं हैं। भगवान ने जैसे ही अपने शंख से ध्रुव जी  को  छुआ, वैशे  ही  उनके ज्ञान चक्षु खुल गए और वो स्तुति करने लग गए।
                   ध्रुव द्वारा भगवान की स्तुति 
"हे हरि, आप ही अंत: करण में प्रवेश कर अपने तेज  से, सोई हुई वाणी को जगाते हैं और इन्द्रियों को  चेतनता  प्रदान  करते हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूं। आप एक हैं, परंतु  अनेक रूप हैं। आप अन्तर्यामी हैं। ब्रह्मा जी ने भी  आपकी  ही  शरण  ली थी। सकाम मनुष्य माया से ठगा जाता है। इस लिए आप  मुझे विशुद्ध हृदय भक्तों का संग दीजिए। आप जीव से सर्वदा भिन्न हैं। परमानन्द मूर्त्ति हैं। मैं आपकी शरण लेता हूं।
                  भगवान द्वारा ध्रुव को वरदान
भगवान ने कहा," तेरा कल्याण हो, मैं तुझे वह पद देता हूँ जो सबसे ऊंचा है और जिसके  गिर्द  नक्षत्र  एवं  सप्त  ऋषि  भी प्रदक्षिणा करते हैं। इस लोक में भी तू  धर्म  पूर्वक  पृथ्वी  का पालन करेगा।"भगवान इतना कहकर अंतर्ध्यान हो गए।
                     घर पहुंचने पर स्वागत
ध्रुव के घर पहुंचने पर बहुत स्वागत  हुआ।  पिता  ने  पश्चाताप किया। ध्रुव राजा बने। उनका विवाह शिशुमार की पुत्री भ्रमी से हुआ। दो पुत्र हुए कल्प और वत्सर। दूसरी पत्नी वायु की  पुत्री इला से उत्कल नाम का पुत्र और एक कन्या भी हुई।
                 चिरकाल तक धर्म पूर्वक शासन
भाई उत्तम को एक यक्ष ने मार दिया। उत्तम की माता  का  भी जंगल की आग में जल कर देहान्त हो गया। अपने भाई के वध का बदला लेने के लिए  ध्रुव  का  यक्षों  से  भयानक  युद्ध  भी हुआ।  कुबेर से वरदान  पाया  कि "सदा  भगवत  समृती  बनी रहे।"
                        परमपद की प्राप्ति
अंततोगत्वा जब वैराग्य हुआ तो बद्रिक आश्रम चले गए।  वहां अपने आप को विराट स्वरूप में स्थिर कर लिया।  फिर उसका भी त्याग कर दिया। अपने ध्रुव  होने का भी  त्याग  कर  दिया। अंततः एक दिन, भगवान विष्णु के पार्षद उन्हें लेने के लिए आ गए। उनकी माता सुनीति को भी भगवतधाम  की  प्राप्ति  हुई। आज भी महान भक्त ध्रुव जी को साधक आदर्श मानते हैं।
                       जय श्रीकृष्ण जी की

रविवार, 17 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण - लेख संख्या- 13 (शिव कथा- ३)

         हिमालय की पुत्री के रूप पार्वती जी का जन्म
सती जी ने अगला जन्म पर्वत राज हिमालय की पुत्री  के  रूप में लिया। जब से पार्वती जी ने जन्म  लिया,तब  से  वहां  सारी सिद्धियां और संपत्तियां छा गईं।
                   नारद जी द्वारा भविष्य बताना
 एक दिन नारद जी का उधर आना हुआ। पार्वती जी की माता के पूछने पर नारद जी ने बताया कि तुम्हारी पुत्री सुंदर, सुशील और समझदार है। उमा, अंबिका और भवानी इसके  नाम  हैं। यह अपने पति को बहुत ही प्यारी होगी।  सुहाग  सदा  अटल रहेगा। परंतु इसका जो पति  होगा  वो  गुणहीन,  माता- पिता विहीन, उदासीन, संश्यहीन (लापरवाह), योगी जटाधारी, नंगा, निष्काम हृदय, और अमंगल वेश वाला होगा।
            पार्वती जी का तपस्या करने वन में जाना
यह बातें सुनकर माता पिता को बड़ा कष्ट  हुआ, परंतु  पार्वती जी ने इन बातों को धारण कर लिया। इतना  सब कुछ  सुनकर हिमराज और उनकी पत्नी मैना ने  नारद  जी  से  कोई  उपाय पूछा तो नारद जी ने बताया कि शिवजी भगवान के लक्षण भी ऐसे ही हैं। अगर पार्वती तप करेगी तो वह साक्षात शिवजी को पति रुप में प्राप्त कर सकती है। फिर  समय  आने  पर  माता पिता  को  समझाकर  और  उनकी  आज्ञा  लेकर  पार्वती  जी शिवजी महाराज को पति रूप में पाने के  लिए  तपस्या  करने वन में चली गईं। वहां पर उन्होंने घोर तपस्या की। पहले पहल फल फूल आदि खाकर, फिर साग आदि  खाकर, फिर  केवल जल पीकर और उसके बाद कठोर उपवास करके  चिर  काल तक तपस्या करती रहीं।
            एक दिन उनको आकाशवाणी सुनाई दी
 "अब तुम्हारा  मनोरथ  पूर्ण  होगा।  अब  तुम्हें  त्रिपुरारी  मिल जाएंगे। जब तुम्हें तुम्हारे पिता बुलाने आएं, जिद छोड़ कर  घर चली जाना। और जब सप्त ऋषि तुम्हें मिलने  आएं तो  इसको प्रमाण समझ लेना।"
            सप्त ऋषियों द्वारा पार्वती जी की परीक्षा
उधर भगवान शिव राम भजन में ही लगे रहे। एक दिन राम जी ने स्वयं प्रकट हो कर भगवान  शिव  को  पार्वती जी  के बारे में समझाया और कहा कि अब तुम मेरी आज्ञा से पार्वती  जी  से  विवाह कर लो। तब शिवजी  ने सप्त ऋषियों  को  पार्वती  जी के पास परीक्षा लेने के लिए  भेजा।  ऋषियों ने  कई  प्रकार से पार्वती जी की परीक्षा ली और पाया कि  पार्वती जी तो  अपने इरादे पर पूर्णतया अडिग हैं। तब वे  हिमाचल  के  पास  पहुंचे और उन्हें पार्वती जी को घर लाने के लिए कहा। जब  शिवजी को सारी बात पता चली तो  वे  भी  बहुत  प्रसन्न  हुए।  उसके  बाद शिवजी समाधि में चले गए।
             शिवजी भगवान द्वारा कामदेव भस्म
उसी समय तारक नाम का असुर हुआ  जो  बहुत  ही  बलवान था। उसने सब देवताओं को जीत लिया था। तब हारे हुए सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने बताया कि तारक को केवल शिवजी का पुत्र ही मार सकता है।  यह भी  बताया  कि सती ने ही पार्वती के रूप में जन्म लिया है। अगर तुम कामदेव को शिवजी के पास भेज कर उनकी समाधि भंग करवा सकते हो तो तुम्हारा कार्य शीघ्र हो  सकता है।  देवताओं  ने  कामदेव को भेजा। कामदेव के इस प्रयास से समाधि तो भंग  हुईं  परंतु निष्काम भगवान ने क्रोध में कामदेव के शरीर को ही भस्म कर दिया। कामदेव की पत्नी रती की प्रार्थना पर भगवान  शिव  ने कहा कि यह बिना शरीर के ही व्यापेगा। और तुम्हें  यह  द्वापर युग में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में मिलेगा।
          ब्रह्मा जी द्वारा मनाने पर शिवजी सहमत हुए
वहां पर सभी देवताओं के साथ ब्रह्मा जी का भी आना  हुआ। उन्होंने शिवजी महाराज जी  को  सृष्टि  के  कल्याण  के  लिए पार्वती जी से विवाह के लिए कहा जिस पर  भगवान  शिवजी  ने अपनी सहमति दे दी। ऋषियों ने हिमाचल  के  पास  जाकर लगन लिखवाए।
                       अनोखी शिव बारात
 अनोखी बारात चली। विष्णु जी और सभी देवगण साथ चले। उनके इलावा सभी गण एवं भूत प्रेत आदि भी उनके साथ थे।  तुलसी जी ने लिखा है कि किसी का हाथ नहीं तो कोई मुख के बिना ही चला जा रहा है। वहां  लगन पत्री ब्रह्मा जी ने पढ़ कर सुनाई।
                     भगवान शिव का श्रंगार
जटा मुकुट, ऊपर सांपों का मौर सजाया  है, सांपों  के  कुंडल, शरीर पर विभूति रमाई है। बाघाम्बर लपेटा हुआ है, मस्तक पर चंद्रमा और सिर पर गंगा जी सुशोभित हैं। तीन नेत्र  सांपों  का जनेऊ, गले  में  विष, छाती  पर  नरमुंडों  की  माला, मेरे  प्रभु कल्याण के धाम हाथ  में  त्रिशूल  और  डमरू  लिए  बैल  पर सवार हैं। पहले तो आगवानी करने वाले डर  गए।  परंतु  कुछ समझदार लोग डटे रहे। स्वागत का पूरा प्रबंध  किया गया था। मैना को चिंता होने पर नारद जी ने पिछले जन्म की  सब कथा सुनाकर सभी संदेह दूर कर दिए। सब को  संतोष  हुआ। सुंदर मंडप सजाया गया। पार्वती जी की  सुंदरता  देखते  ही  बनती थीं।
                कार्तिकेय जी द्वारा तारकासुर वध
 विवाह उपरांत विदाई हुई। और भगवान शिव माता पार्वती के साथ हिमालय पहुंचे और वहां निवास करते हुए भगवान  शिव ने पूरी राम कथा माता पार्वती जी को सुनाई।  रामचरितमानस में ऐसा दर्शन आया है कि भगवान शिव राम जी का और  राम भगवान शिवजी भगवान का ध्यान लगाते हैं। जब शिव पार्वती जी के पुत्र कार्तिकेय जी का जन्म हुआ तब  कार्तिकेय  जी  ने ही तारकासुर का वध किया और  इस  तरह  देवता  भय  मुक्त हुए। अगले लेख में हम भक्त ध्रुव जी की कथा पढ़ेंगे।
                        जय श्रीकृष्ण जी की
      

शनिवार, 16 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण - लेख संख्या -12 (शिव कथा -२)

                सती जी का दक्ष के यज्ञ में जाना
 दीर्घ काल के पश्चात जब भगवान शिव की  समाधि  खुली  तो वो सती जी को राम जी की नित्य नई नई कथाएं  सुनाने  लगे। एक दिन सती जी को पता चला कि उनके  पिता  दक्ष ने  एक यज्ञ का अनुष्ठान किया है। सती जी  का  मन  किया  कि  पुत्री होने के नाते पिता के घर अनुष्ठान में वो भी सम्मिलित हों। इस बात का आग्रह उन्होंनेे भगवान  शिवजी  से  किया। परंतु  तब शिवजी उनकी इस बात से इस लिए सहमत नहीं  हुए  क्योंकि दक्ष ने उनको बुलावा नहीं भेजा था। बेशक पिता के घर  बिना बुलावे के भी जाना गलत नहीं है, परंतु जब  आपस  में  कटुता आ गई हो तो इस बात का विचार कर लेना ही उचित है। इतना कह कर शिव मौन हो गए।
       जब सती जी ने देखा कि शिवजी नहीं मानेंगे  तो  उन्होंने अकेले ही जाने का निर्णय कर लिया। सती जी अकेली ही चल पड़ीं। उनको अकेली जाते देख  कर, मद  एवं  मनिमाद  आदि हजारों सेवक व्रशभराज को आगे कर और अनेकों पार्षद और यक्षों को साथ ले निर्भयता पूर्वक उनके पीछे  हो  लिए।  माता सती को बैल पर सवार करा दिया। श्वेत छत्र, चंवर और  माला आदि राज चिन्ह साथ लिए तथा दुंदभी शंख और बांसुरी आदि से सुसज्जित हो उनके साथ चल दिए।
      सती जी का अपने आप को योगाग्नि में भस्म करना
माता सती को भ्रम था कि दक्ष उनके पिता होने के नाते उनका आदर सत्कार अवश्य करेंगे। परंतु जब वो  दक्ष के  यहां  पहुंचे तो किसी ने भी उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। केवल एक माता ने ही उनसे आगे आ कर बात की। यज्ञ भूमि में पहुंचीं तो देखा कि यज्ञ में शिवजी का भाग भी नहीं निकाला गया। और ना ही उनके लिए कोई स्थान ही रक्खा गया था। उल्टा दक्ष ने उनको बातों ही बातों में बहुत अपमानित भी किया।
       जब माता सती ने देखा कि यहां पर तो भगवान शिव का इतना अपमान हो रहा है, तो उन्होंने उसी समय योगाग्नि प्रकट की और उसी यज्ञशाला में अपने आप  को  भस्म  कर  दिया।
साथ गए पार्षदों ने जब यह सब देखा तो उन्होंने आक्रमण कर दिया। उधर भृगु ने रिभु नाम के हजारों देवता पैदा करके  वहां से सारे शिव गणों को भगा दिया।
                     वीरभद्र द्वारा दक्ष का वध
       उधर जब भगवान शिव को इस बात  का  पता  चला  तो क्रोध में उन्होंने अपनी जटाओं से वीर भद्र को पैदा  किया और दक्ष  के  समूल  विनाश  का आदेश देकर उसे वहां भेज दिया। वीरभद्र ने भृगु की दाढ़ी और मूंछ नोच  लीं, क्योंकि जब  शिव भगवान को प्रजापतियों की सभा में शाप  दिया  गया  था, तब उसने ही मूंछें ऐंठते हुए शिवजी  का  उपहास  किया  था। भग देवता की आंखें निकाल लीं। दक्ष की गर्दन काट दी।  सब  को यथा योग्य सज़ा दी।
             ब्रह्मा जी और देवताओं द्वारा शिव स्तुति
       यज्ञ संपूर्ण नहीं हुआ। सभी डरे और सहमे हुए थे।  सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि आप ही इस समय कष्ट का निवारण कर  सकते  हैं, क्योंकि और  कोई भी इस प्रकार के हालात  में  भगवान शिवजी  के  सामने जाने की हिम्मत नहीं कर सकता। सभी देवताओं के साथ ब्रह्मा  जी शिवजी के पास गए। भगवान शिव की स्तुति की और  प्रार्थना की कि जन कल्याण के लिए यज्ञ का  सम्पूर्ण  होना  बहुत  ही आवश्यक है। यदि आप कृपा करके दक्ष को जीवित कर दें तो यह कार्य संपूर्ण हो जाएगा।  उन्होंने  भृगु  और  भग  देवता के लिए भी प्रार्थना की। और कहा कि हे  महादेव  यज्ञ  संपूर्ण  हो जाने पर जो भाग बचा रहेगा वो भी आप का ही होगा।
         शिव कृपा से दक्ष को जीवन दान और यज्ञ संपूर्ण
       इस प्रकार ब्रह्मा जी समेत सभी देवताओं  द्वारा  भगवान शिवजी की स्तुति से भगवान  प्रसन्न हुए और कहा कि दक्ष का सर जल गया है इस लिए उसे बकरे का सर लगा  दिया  जाए। भग देवता, मित्र देवता की आंखों से अपना  भाग  देखे।  पूषा, पिसा हुआ अन्न ग्रहण करने वाले हैं, इस लिए वो  यजमान  के दांतों से भक्षण करे। बाकी देताओं  के  अंग  स्वस्थ  हो  जावें। भृगु के बकरे की सी दाढ़ी मूंछ हो जावे।
       शिवजी भगवान ने जैसा कहा वैसा हो गया। तब  दक्ष  ने शिवजी भगवान की स्तुति की और क्षमा याचना भी की। उसी समय श्री हरी विष्णु प्रकट हुए और उन्होने सब को  समझाया कि मैं ही ब्रह्मा हूँ और मैं ही शिव भी हूँ। अज्ञानी लोग ही  हमें भिन्न भिन्न देखते हैं। वास्तव में हम तीनों एक ही हैं।
                        पार्वती जी का जन्म
       उधर सती जी ने शरीर त्यागते  समय  भगवान  से  जन्म जन्म तक शिवजी भग्वान् का ही  साथ  मांगा  था।  इस  लिए उन्होंने अगले जन्म में पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती जी के रूप में जन्म लिया। अगले लेख में हम  शिव  पार्वती  जी  की कथा के बारे में पढ़ेंगे।
                           क्रमशः

शुक्रवार, 15 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण - लेख संख्या- 11 (शिव कथा - १)

                  दक्ष द्वारा भगवान शिव को शाप
      जैसे कि पिछले लेख में आप ने पढ़ा है कि प्रजापति  दक्ष की पुत्री सती का विवाह भगवान शिवजी से  हुआ  था।  मैत्रेय जी कहते हैं कि एक बार प्रजापतियों का यज्ञ था। उसमें  शिव भगवान भी बैठे थे। जब दक्ष प्रजापति सभा में आए तो  सभी ने उठ कर उनका स्वागत किया। परंतु भगवान शिव खड़े  नहीं हुए। दक्ष को यह बहुत बुरा लगा कि  उसका  दामाद  होते  हुए भी शिवजी ने खड़े होकर उसका सम्मान नहीं किया। क्रोध  में आकर दक्ष ने शिवजी को श्राप दे दिया कि भविष्य में  जो  भी यज्ञ होगा उसमें बाकी देवताओं के साथ यज्ञ का भाग  शिवजी को प्राप्त नहीं होगा।
       भगवान शिव तो सदा कल्याण करने वाले हैं परन्तु उनके परम सेवक नंदीश्वर जी को क्रोध  आ  गया।  उन्होंने  भी  दक्ष और उनकी बात का अनुमोदन करने वाले ब्राह्मणों को शाप दे दिया कि:- "तुम सभी तत्व ज्ञान से विमुख हो  जाओ, अत्यन्त स्त्री लंपट हो जाओ, दक्ष का मुख भी  शीघ्र  ही बकरे जैसा हो जाए। तुम सभी आवागमन के  चक्र में  पड़े  रहो  और  शंकर द्रोही होने के कारण कर्मों के जाल में ही फंसे रहो। तुम केवल पेट पालने के लिए ही तप करो और सांसारिक सुख के गुलाम हो कर भीख मांगते भटका करो।" इस पर भृगु ने कहा  कि " शिव भक्त और उनके अनुयाई सतशास्त्रों के विरूद्ध  आचरण करने वाले और पाखंडी हों।"
           माता सती द्वारा भगवान राम जी की परीक्षा
       इस तरह से शिव - सती का दक्ष के यहां आना  जाना  ही समाप्त हो गया। कोई संबंध ना रहा। बहुत  समय  व्यतीत  हो जाने के बाद, त्रेता युग में, जब भगवान राम अवतार हुआ, उस समय भगवान  शिवजी  सती जी के साथ  ऋषि  अगस्त्य  जी  के आश्रम में पधारे। क्योंकि राम उनके आराध्य हैं और उनकी कथा सुनना और सुनाना उनको बहुत प्रिय है । इस लिए उन्हों ने महर्षि  अगस्त्य जी से राम कथा सुनी और बाद में ऋषि  के प्रार्थना करने पर उनको  हरि भक्ति का ज्ञान प्रदान किया। तुलसी दास जी ने इस पर लिखा है कि:-
" एक बार त्रेता जुग माहीं। शंभु गए कुम्भज ऋषि पाहीं।।
संग सती जग जननी भवानी। पूजे ऋषि अखिलेश्वर जानी।।
राम कथा मुनि बरज बखानी। सुनी महेस परम सुख मानी।।
ऋषि पूछी हरि भक्ति सुहाई। कही संभू अधिकारी पाई।।"
      कुछ दिन ऋषि आश्रम में रहने के पश्चात सती जी के साथ वापिस कैलाश लौटते हुए सोचते जा रहे थे  कि  गुप्त  रूप  से अवतरित प्रभु राम के दर्शन कैसे प्राप्त हों। अगर उनके सामने जाता हूँ तो सब लोग जान जाएंगे। शिव  ऐसा  सोच  ही रहे थे कि उन्होंने उसी समय श्री राम और लक्ष्मण जी के दर्शन किए।
"संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हिएं अती हर्ष बिसेषा।"
शिवजी महाराज ने मन ही मन प्रणाम किया और पुलकित हो गए। परंतु सती जी को संदेह हुआ क्योंकि यह बात उस समय की है जब सीता माता का हरण हुआ था और भगवान श्रीराम 
माता सीता जी के वियोग में दुःखी हो रहे थे। तब सती जी को लगा कि एक साधारण व्यक्ति की तरह दुःखी होने  वाले  राम, महादेव जी के इष्ट देव कैसे हो सकते हैं। और शिवजी कह रहे हैं कि: "सोई मम इष्टदेव रघुबीरा।" सती जी के संदेह करने पर भगवान् शिव ने उन्हें समझाया लेकिन सती जी संदेह निवारण चाहती थीं।  सती जी ने माता सीता का भेस बनाया और  राम भगवान  के सामने चली गईं।  लक्ष्मण जी को तो  संदेह  हुआ, लेकिन राम जी को कोई सन्देह नहीं हुआ। वो बोले कि " माता जी आप अकेली क्यों इस जंगल में घूम  रही हैं, और  शिवजी महाराज कहां हैं ?"
" राम बचन मृदु गूढ़ सुनि, उपजा अति संकोच।
सती सभीत महेस पहिं, चलीं हृदय बढ़ सोच।। "
और सोचने लगीं कि:-
" मैं संकर कर कहा ना माना, निज अज्ञान राम पर आना।"
उसी समय सती जी ने एक कौतक देखा कि उनके  आगे  राम और सीता जी दोनों जा रहे हैं। पीछे देखा तो दोनों  भाई  खड़े हैं। उसी समय उन्होंने राम वंदन करते हुए अनेकों ब्रह्मा, विष्णु और शिव देखे। 
" सती बिधात्री (ब्रम्मानी) इंदिरा (लक्ष्मी), देखीं अमित अनूप ।
जेहि जेहि बेष अजादी सुर (देवता), तेहि तेहि तन अनुरूप ।।"
      सभी को कई कई रूप में देखा परंतु राम का रूप एक  ही है। बार बार सिर निवा कर शिवजी के पास चली गईं। जब उन को शिवजी भगवान ने पूछा तो कहा कि कोई परीक्षा नहीं ली। परंतु भगवान ने सब जान लिया। 
" परम पुनीत ना जाई तजी, किए प्रेम बढ़ पाप।
प्रकट ना कहत महेश कछु, हृदय अधिक संताप।।"
सामने तो शिवजी महाराज कुछ नहीं कह रहे परंतु मन ही मन दुःखी हो रहे हैं। सती जी को सुख देने के लिए अनेकों कथाएं कहीं। कैलाश पहुंच कर समाधि में बैठ गए।
                               क्रमशः

गुरुवार, 14 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण - लेख संख्या - 10 (मनु - शतरूपा की कन्याओं के वंश का वर्णन)

मनु और शतरूपा के दो पुत्र, प्रिय व्रत और उत्तानपाद थे और तीन पुत्रियां थीं, अकूति, देवहूति और प्रसूति। पुत्रों के वंश  का वर्णन अगले लेखों में किया जाएगा। इस लेख में  मनु  जी  की कन्याओं के केवल मुख्य मुख्य वंशजों के बारे में जानकारी  दी जाएगी:--
 1. अकूती का विवाह प्रजापति रुचि से हुआ। इनके पुत्र  रूप में भगवान विष्णु जी ने यज्ञ नाम से  अवतार  लिया।  भगवान यज्ञ के बारह पुत्र हुए।  यही स्वायंभुव मन्वन्तर  में  तुषित नाम के देवता हुए। यज्ञ भगवान ने अपने इन्हीं पुत्रों  के  साथ  मिल कर स्वायंभुव मनवन्तर की रक्षा की थी। उस समय के इन्द्र भी भगवान यज्ञ स्वयं ही थे।
 2. देवहूति का विवाह महर्षि कर्दम से हुआ जिसके  संबंध  में आप लेख संख्या नौ में पढ़ चुके हैं। इनके पुत्र  के  रूप  में  ही भगवान कपिल प्रकट हुए, जिन्होंने सांख्य दर्शन  का  सिद्धांत दिया। देवहूति की नौ कन्याओं का वंश वर्णन इस प्रकार है:
  १. कला का विवाह मरीचि ऋषि से हुआ। इनके दो पुत्र  हुए, कश्यप तथा पूर्णिमा। पूर्णिमा की  कन्या  हुई  देव  कुल्या  जो दूसरे जन्म में देव नदी गंगा के रूप में प्रकट हुई।
  २. अनसुईया का विवाह ऋषि अत्री से हुआ। इनके घर विष्णु जी ने दत्तात्रेय, शंकर जी ने दुर्वासा, और ब्रह्मा जी ने चंद्रमा के रूप में अंशावतार धारण किए।
  ३. श्रद्धा का विवाह ऋषि अंगिरा से हुआ।  इनके दो पुत्र एवं चार  कन्याएं हुईं।
  ४. हविर्भू का विवाह ऋषि पुलस्त्य जी से हुआ। इनके दो पुत्र हुए, महर्षि अगस्त्य और महा तपस्वी विष्वश्रवा।  विश्वश्रवा के इडविडा के गर्भ से  कुबेर का जन्म  हुआ  और  उनकी  दूसरी पत्नि केशिनी (कैकसी) से रावण कुंभकर्ण एवं विभीषण  हुए।
  ५. गति का विवाह ऋषि पुल्ह से हुआ। इनके तीन पुत्र हुए
  ६. क्रिया का विवाह कृतु से हुआ। इन्होने 60 हज़ार ऋषियों को जन्म दिया।
  ७. ऊर्जा (अरुंधति) का विवाह ऋषि वशिष्ठ जी से  हुआ था। इनके सात ब्रह्म ऋषि पुत्र हुए जिनके नाम हैं चित्रकेतु, सुरोचि, विरजा, मित्र, उल्बन, वसुभ्रधान  और  ध्युमान।  इनकी  दूसरी पत्नी से शक्ति आदि और भी पुत्र हुए।
  ८. चित्ती का विवाह अथर्व ऋषि से हुआ।  इनका  पुत्र  हुआ दधीचि जिसका दूसरा नाम अश्वशिरा भी था।
  ९. ख्याति का विवाह हुआ महर्षि भृगु जी से। इनके  वंश  में ही  आगे चलकर ऋषि मार्कणडेय और शुक्राचार्य भी हुए।
  3.मनु और शतरूपा की तीसरी पुत्री प्रसूति  का  विवाह  दक्ष प्रजापति से हुआ।  इनकी 16 कन्याएं हुईं।  स्वाहा  का विवाह हुआ अग्नि से, स्वधा का विवाह हुआ पितृ गणों से, और  सती का विवाह हुआ महादेव शिवजी से। इसके अलावा बाकी तेरह कन्याओं का विवाह धर्म से हुआ। इनमें से मूर्त्ति के गर्भ  से  दो पुत्र उत्पन्न हुए नर और नारायण। यह दोनों महान ऋषि थे। ये दोनों भी भगवान का ही अवतार माने जाते हैं। इन दोनों ने  ही द्वापर युग में अर्जुन और श्रीकृष्ण  के  रूप  में  अवतार  ग्रहण किया।
     दक्ष एवं प्रसूति की जिस कन्या का विवाह भगवान शिवजी भगवान से हुआ, उनकी कथा का विस्तार सहित वर्णन  अगले लेख में किया जाएगा।
                      । जय श्रीकृष्ण जी की ।

बुधवार, 13 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण - लेख - 9 (कपिल जी द्वारा माता देवहूति को ज्ञान)


             भगवान कपिल को माता देवहूति के प्रश्न  
माता देवहूति जानती थी कि उसका पुत्र भगवान  का  अवतार है। एक दिन माता देवहूति ने कपिल जी को एक ऊंचे  आसन पर बैठा कर प्रश्न किए कि "हे देव 1. इन देह गेह आदि में  जो, मैं और मेरे पन का दुराग्रह होता है यह क्या है ? 2. मेरा  महा मोह कैसे दूर होगा ? 3. प्रकृति और पुरूष का ज्ञान क्या है ?" यह प्रार्थना भी की कि "मुझे अपनी शरण में ले लो"।

                   कपिल जी का माता को ज्ञान
 " हे माता, 1. अध्यात्म योग ही मनुष्य के कल्याण  का  मुख्य साधन है। 2. बंधन,  विषयों  में  आसक्ति  के कारण  होता  है, मोक्ष,  परमात्मा में  अनुरक्त  होने  पर प्राप्त होता है और  इन दोनों का कारण मन है। 3. विकारों  से  मुक्ति, सुख - दुःख  से मुक्ति, और  सम अवस्था  बनाने  के लिए मन को मारना  नहीं होता अपितु सही दिशा देनी होती है।
इसे कविता के रूप में इस तरह से कहा है :
क्यों चाहे रे मन को मारण, मन ही बंधन मोक्ष का कारण।
विष्यासक्ती  बंधन  ल्यावे,  हरि  अनुरक्ती मोक्ष दिलावे ।।
जो विकार से मुक्ति पावे, सुख-दुःख छोड़ के सम हो जावे।
ज्ञान,  वैराग्य,  भक्ति  से  पूर्ण,  आत्मा  को माने संपूर्ण।।
प्रकृति  से  है  परे  आत्मा,  भेद  रहित  इकमात्र  आत्मा।
सूक्षम,  सव्यांप्रकाश  आत्मा,  उदासीन आखंड आत्मा।।
शक्तिहीन प्रकृति  है मानों, ऐसा अनुभव करो  तो  जानों।
सबसे  मंगल  मार्ग है भक्ति, हरि  में  केवल  हो अनुरक्ति।।
सन्तों  के संग मन  हो जावे, मार्ग  मोक्ष  का  संत  बतावे।
संत  अकारण  हितु  होता है,  सहनशील, दयालु  होता है।।
शत्रुभाव  से  मुक्त  संत  है,  प्रेमी,  त्यागी,  सरल  संत  है।
चिंतन,  श्रवण,  कीर्तन  गावे,  शांत  रहे  संसार  भुलावे।।
त्रिगुन, त्रिताप, कष्ट  ना आवे,  संतों का संग हरि को भावे।
आसन,  प्राणायाम  करे  जो, अंग अंग का ध्यान  करे जो।।
आत्म विभोर  हो कर  जो रोवे, ऐसे अपना  आप भिगोवे।
अंत: करण  शुद्ध  हो  जावे, हरि कृपा  से  हरि  पद  पावे।।

उन्होंने यह भी बताया कि प्रकृति  से अलग  है  चित्त, चित्त  से अलग है आत्मा, और आत्मा से अलग  है ब्रह्म।  इस  तरह  से देवहूति को ज्ञान देकर कपिल जी ने माता  से आज्ञा  ली  और घर छोड़ दिया। माता ने जो ज्ञान  प्राप्त  किया  था, उसका  ही अनुसरण करते हुए उन्होंने परमपद को प्राप्त किया।
                       जय श्रीकृष्ण जी की

श्रीमद्भागवत महापुराण - लेख संख्या- 8 (महर्षि कर्दम जी की कथा)

   
            ब्रह्मा जी द्वारा गृहस्थ जीवन जीने की आज्ञा
कर्दम ऋषि ब्रह्मा जी के पुत्र थे। वे सदा  तपस्या में  लीन  रहते थे। एक बार सृष्टि को बढ़ाने के लिए ब्रह्मा जी  ने  उन्हें  विवाह करने के लिए आज्ञा दी। पिता की आज्ञा का  पालन  करने  के लिए उन्होंने उनके आदेश को स्वीकार कर लिया।
                    सुयोग्य कन्या के लिए तपस्या
सुयोग्य कन्या की प्राप्ति के लिए उन्होंने सरस्वती ज के किनारे भगवान की आराधना करते हुए घोर तपस्या की।  उनकी  घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें दर्शन दिए। भगवान ने वर  मांगने के  लिए कहा तो कर्दम जी ने प्रार्थना की," भगवन मेरे पिता ब्रह्मा जी की आज्ञा का पालन  करने  के  लिए  मुझे  ऐसा वर दीजिए कि मुझे एक ऐसी सुशील और मेरे अपने जैसे स्वभाव की कन्या मिले जिससे विवाह  करके  मैं  अपने  पिता की इच्छा को भी पूरा कर सकूं।" भगवान ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि पर्सों ही मनु जी अपनी पुत्री  देवहूति  के  विवाह  का प्रस्ताव लेकर तुम्हारे पास आएंगे। तब तुम इनकार मत करना।  इतना कहकर भगवान अन्तर्ध्यान हो गए।
                   मनु जी का कर्दम के पास आना
मनु जी अपनी पुत्री देवहूति के विवाह का प्रस्ताव लेकर आए। दोनों का विवाह हुआ। देवहूति ने अपने पति की बड़ी ही सेवा की। एक राजा की पुत्री होते हुए भी एक साधु  पति  के  साथ आनन्द के साथ रहतीं और अपने तपस्वी पति की सेवा करती थीं। कोई चाह ना थी। पति की तपस्या में देवहूति सेवा रूप से सहयोग देती थीं।  सेवा  करते  करते  वह  काफी  कमज़ोर हो चुकी थीं।
                 सुंदर भवन और विमान का निर्माण
एक दिन कर्दम ऋषि को अपनी पत्नी पर बड़ी ही  दया  आई। उन्होंने विचार किया कि इतने बड़े राजा की पुत्री होकर भी वो मेरे साथ ऐसी दयनीय दशा में रह रही है। उन्होंने अपने तप के बल से एक बहुत ही सुंदर भवन का निर्माण किया।  एक सुंदर विमान  भी बनवाया। उसमें कई प्रकार की दासियां भी सेवा में लगी हुईं थीं। सब प्रकार की सुविधाओं से  सुसज्जित  विमान से कर्दम जी ने देवहूति को अनेक  रमणीक  स्थलों का भ्रमण करवाया।
                कर्दम ऋषि और देवहूति की संतति
कर्दम तथा देवहूति को नौ कन्याओं के बाद एक पुत्र का जन्म  हुआ। कन्याओं के बड़ी हो जाने पर उनका विवाह नौ ऋषियों के साथ किया गया। उनके नाम इस प्रकार हैं: कला का विवाह मारीची, अनसुईया का अत्री, श्रद्धा का  अंगिरा,  अविर्भूव  का पुलस्त्य, गति का पूलह, क्रिया का कृतु, ख्याति का भृगु ऋषि से, अरुंधति का वशिष्ट और शांति का अथर्व ऋषि से  विवाह हुआ।
                भगवान कपिल देव जी का जन्म
ऋषि कर्दम जी की 9 कन्याओं  के  बाद, भगवान विष्णु जी ने स्वयं उनके घर कपिल देव जी के रूप में अवतार धारण  किया था।  जो बाद में कपिल मुनि के नाम से विख्यात हुए।  बचपन  में ही भगवान कपिल बड़े बुद्धिमान थे। कर्दम जी ने सन्यास ले लिया, जंगल में जाकर घोर तप किया  और अंत में  परम  पद को प्राप्त हुए।  कपिल जी के ज्ञान को सांख्य दर्शन के नाम से जाना जाता है। उन्होंने अपनी माता देवहूति को भी ज्ञान दिया जिससे उन्हें भी परमपद की  प्राप्ति  हुई।  इसका  विस्तार  से वर्णन अगले लेख में होगा।
                     (जय श्रीकृष्ण जी की)
         

रविवार, 10 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण - लेख संख्या - 7 (सनक आदि ऋषियों द्वारा जय, विजय को शाप)

              सनकादि ऋषियों का बैकुंठ में प्रवेश 
एक बार सनक आदि ऋषि कुमार जो कि विष्णु जी के  प्रथम अवतार  माने  जाते हैं  और  अखंड ब्रह्मचर्य का  पालन करते हैं, भगवान विष्णु जी  के  शुद्ध सत्वमय बैकुंठ धाम में  पहुंचे। भगवान विष्णु  के दर्शन की  लालसा से अन्य दर्शनीय सामग्री की उपेक्षा  करते  हुए  बैकुंठ  धाम की छ: द्योडियां पार करके जब वे  सातवीं  डियोड़ी  पर  पहुंचे, तब वहां पर उन्हें हाथ  में गदा  लिए  हुए  दो  समान  आयु  वाले  देवश्रेश्ठ दिखाई दिए। उनके  चेहरे  पर  कुछ  क्षोभ  के  से  चिन्ह  दिखाई  दे रहे थे। सनकादिक ऋषियों को निसंकोच रूप से भीतर जाते देख उन द्वार पालों ने उन्हें, उनकी हंसी उड़ाते हुए, रोका।
               ऋषियों द्वारा जय विजय को शाप
 मुनियों ने कहा," जो लोग भगवान के इस लोक को प्राप्त होने पर यहां निवास करते हैं, वे तो भगवान् के समान ही  समदर्शी  होते हैं। किन्तु  तुम्हारे  स्वभाव  में  यह  विषमता क्यों है ? तुम हो तो बैकुंठ  नाथ के पार्षद, किन्तु तुम्हारी बुद्धि बहुत मंद  है। इस  लिए  तुम्हारा कल्याण करने के लिए ही  हम  तुम्हारे  इस अपराध के योग्य दण्ड का विचार करते  हैं।  तुम अपनी  बहुत ही मंद और भेद बुद्धि दोष के कारण इस लोक से निकल  कर उन पापमय योनिओं में जाओ जहां पर काम, क्रोध, लोभ नाम के तीन शत्रु निवास करते हैं।" ऐसे  वचन सुनकर  उन्होंने  बड़े आतुर  होकर  कहा, " भगवन  हम  अवश्य  अपराधी हैं। और आपने  हमें  उचित  दण्ड दिया है, किन्तु हमारी इस दुर्दशा पर विचार  करके यदि आपको, करुणा वश थोड़ा सा भी अनुताप हो तो  ऐसी  कृपा  कीजिए, जिससे उन अधमाधम योनियों में जाने पर भी  हमें  भागवत  स्मृति को नष्ट करने वाला मोह ना प्राप्त हो।"
               भगवान द्वारा ऋषियों को दर्शन देना 
उसी समय भगवान  स्वयं वहां पहुंचे और चारों  सनत कुमारों ने उनके दर्शन किए।  भगवान  ने कहा  कि मेरे ही लोगों द्वारा आप का  अपमान मेरे लिए असहनीय है। परंतु मेरे अनुरोध से आप केवल इतनी कृपा कीजिए, जिससे  इनका निर्वसन काल शीघ्र ही समाप्त हो जाए। मुनियों ने कहा कि  आप  सर्वेश्वर हो कर भी हमारे परम  हितकारी  हैं। आप साक्षात धर्म स्वरुप हैं। हमने आपके  इन निरपराध  अनुचरों को शाप दिया  है,  इसके लिए आप हमें उचित दण्ड दें। भगवान ने कहा कि यह सब तो मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। अब ये दोनों  शीघ्र ही दैत्य योनि को प्राप्त  होंगे  और वहां  पर क्रोधावेश  में बढ़ी  हुई एकाग्रता के  कारण सुदृढ योग संपन्न होकर जल्दी ही मेरे पास लौट आएंगे।
            हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का जन्म 
वे दोनों दैवश्रेश्ठ जय और विजय ब्रह्म श्राप से उस अलंघनिय भगवतधाम में ही  श्रीहीन  हो गए तथा उनका सारा का  सारा गर्व जाता रहा। देखते  ही देखते वे बैकुंठ  लोक  से  नीचे  गिर गए और दोनों ने  ही महर्षि कश्यप जी की पत्नी दिती के  गर्भ में प्रवेश किया। उस समय वो यही सोच रहे थे कि  अगर  यही हरि इच्छा है तो इसमें हमारा कल्याण ही होगा। समय आने पर दिती के दो यमज  (जुड़वां) पुत्र  उत्पन्न  हुए  उनके  नाम  हुए  हिरण्याक्ष  और  हिर्रण्यकशिपु।   हिरण्याक्ष  का  वध भगवान  वाराह ने  किया और हिरण्यकशिपु  का  वध  भगवान  नृसिंह  ने किया था। इन दोनों ने ही त्रेता युग में  रावण और  कुंभकर्ण के रूप में जन्म लिया और इनका वध भगवान राम  ने  किया। द्वापर युग में इन्होंने ही शिशुपाल एवं दंतवक्र के रूप में जन्म लिया और उस समय इनका वध श्रीकृष्ण जी द्वारा  हुआ  था। इनके बारे विस्तार से चर्चा अगले अलग अलग लेखों में करेंगे।
                     । जय श्रीकृष्ण जी की
   

शुक्रवार, 8 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण -- लेख संख्या --6 ( भगवान के चौबीस अवतार )

  पुराणों के अनुसार जब जब धर्म का ह्रास होता है और पृथ्वी पर  पाप  बढ़  जाता  है  तो  भगवान्  भांति भांति के अवतार धारण  करके  लोगों  की  पीड़ा हरते हैं। भगवान विष्णु जी के कुल चौबीस अवतार  कहे गए हैं।  इनमें  से दस अवतार मुख्य अवतार माने जाते हैं।  यह हैं, वाराह अवतार, मत्स्य अवतार,  कच्छप अवतार,  नृसिंह अवतार,  भगवान वामन का अवतार, परशुराम अवतार, राम अवतार, कृष्ण अवतार,  बुद्ध अवतार, और कल्कि अवतार।  श्री राम अवतार और श्री कृष्ण जी  के अवतार को पूर्ण अवतार माना गया  है  और  बाकी  के  सभी अवतारों  को  अंशावतार  कहा  गया है।  यह चौबीस अवतार इस तरह हैं:
  1. सनक, सनंदन, सनातन, सनत कुमार:    इन चारों को भगवान का  पहला  अवतार  माना गया है। इन्होंने अखंड ब्रह्मचर्य का पालन किया। वे सदा भगवान के ध्यान में मग्न रहते हैं।
  2. सूकर (वाराह)  अवतार:      इन्होंने  पृथ्वी  को  रसातल  से  बाहर लाने का कार्य किया था।  जब ब्रह्मा जी अपनी सृष्टि  के रहने  के  स्थान  के  बारे  सोच ही  रहे  थे, उसी समय  उनकी  नासिका  से भगवान  विष्णु अंगूठे  के आकार  के  प्रकट  हुए जिन्होंने  देखते  ही  देखते अपना  विशाल  रूप  बना   लिया।  उसी  समय  सभी देवताओं द्वारा उनकी स्तुति की गई। तब भगवान ने  सृष्टि  के रहने के लिए पृथ्वी को स्थापित किया। और  इसी अवतार  में भगवान ने हिर्रण्याक्ष का वध भी किया।
  3. देव ऋषि नारद जी:   इन्होंने पांच  रात्र  का उपदेश दिया  जिसमें कर्म के द्वारा ही कर्म बंधन से  मुक्ति  के  बारे  कहा  गया  है। पिछले जन्म में इन्होंने घोर तप किया था जिससे ब्रह्मा जी  ने इनको अपने मानस पुत्र के रूप  में  प्रकट  किया।  नारद  जी सदैव धर्म को गति प्रदान करने  और लोक कल्याण करने  में लगे रहते हैं।
  4. नर - नारायण अवतार:    भगवान ने दो ऋषियों  के  रूप  में  अवतार धारण कर मन- इन्द्रियों के संयम से घोर तपस्या की और धर्म की स्थापना की।
  5. कपिल देव अवतार:   महर्षि कर्दम और माता  देवहुती के  पुत्र के रूप में भगवान ने पांचवां अवतार लिया। कपिल  मुनि  जी  सिद्धों के स्वामी कहे जाते हैं। इन्होंने सांख्य शास्त्र का उपदेश किया है। 
  6. दत्तात्रेय जी:   इन्होंने देवी अनसूया और ऋषि अत्री जी के पुत्र के रूप  में  अवतार  लिया। और  अलर्क  आदि  ऋषियों  को उपदेश भी दिया।
  7. यज्ञ अवतार:   इन्होंने ही अपने पुत्रों को साथ लेकर  स्वयंभुव मन्वन्तर की रक्षा की थी।
  8. ऋषभ देव अवतार:   इन्होंने ही परमहंसों का मार्ग दिखलाया है।
  9. राजा पृथु अवतार:   इन्होंने ही पृथ्वी से समस्त औषधियों का दोहन किया था।
  10. मत्स्य  अवतार :     पृथ्वी  रूपी  नौका  पर  बैठाकर  अगले मन्वन्तर के अधिपति वैवस्वत मन्वन्तर की रक्षा की।
  11. कच्छप अवतार:   समुद्र मंथन में आधार का कार्य किया।
  12. धन्वंतरी अवतार:   समुद्र मंथन के समय समुद्र में से  अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। आज भी धनतेरस के दिन इनकी पूजा की जाती है।
  13. मोहिनी अवतार:   अमृत लेकर भागे रक्षाशों  से अमृत  लेकर देवताओं को पिलाया।
  14. नृसिंह अवतार:   हिरण्यकशिपु को मार कर प्रहलाद की रक्षा की।
  15. वामन अवतार:   बली से दान मांगकर बली और देवताओं का कल्याण किया।
  16. हयग्रीव अवतार:   इन्होंने दैत्यों से वेदों की रक्षा की।
  17. श्री हरि अवतार:   गजेन्द्र नामक हाथी और मगरमच्छ दोनों का ही उद्धार किया।
  18. श्री परशुराम अवतार:।  इन्होंने उनके समकालीन क्षत्रियों, जो कि पापी और अत्याचारी हो चुके थे, को मारकर उनसे लोगों की रक्षा की।
  19. भगवान व्यास जी:   ऋषि पाराशर जी और सत्यवती जी के पुत्र के रूप में प्रकट हुए। 18 पुराणों और महाभारत की रचना की। वेद को भी चार भागों में विभाजित किया।
  20. हंस अवतार:   इस अवतार में भगवान ने सनत कुमारों और नारद जी को उपदेश दिया।
  21. श्री राम अवतार:   रावण आदि राक्षसों का वध किया, संतों को दर्शन दिए और समाज में मर्यादा स्थापित करके मर्यादा पुरषोत्तम कहलाए।
  22. श्री कृष्ण अवतार:   कंस आदि पापियों का वध किया, गीता का उपदेश दिया, और दैवी प्रेम की मर्यादा बताई। पृथ्वी को पाप मुक्त किया।
  23. बुद्ध अवतार:   कलयुग आ जाने पर देवताओं के द्वेशी दैत्यों को मोहित करने के लिए अजन के पुत्ररूप में अवतार धारण करते हैं।
  24. कल्कि अवतार :   कलयुग के अंत में भगवान जगत की रक्षा के लिए कल्कि अवतार धारण करते हैं।
        इस तरह से पुराणों में चौबीस अवतारों का वर्णन मिलता है। कुछ अवतारों के बारे  में कई पुराणों के मत भिन्न  हैं। ऐसा इस लिए है क्योंकि कुछ अंश अवतारों को कई ग्रंथों ने अवतार माना है और कईयों ने नहीं माना। परंतु ज्यादा अवतारों के बारे ऐसा नहीं है । यहां पर  संक्षिप्त  में  अवतारों के बारे में  बताया गया है। अगले लेखों में  जहां जहां पर जिस  अवतार की कथा आएगी उसको विस्तार से बताएंगे। अगले लेख में मनु जी और शतरूपा जी से आगे सृष्टि कैसे बढ़ी, इसके बारे में वर्णन किया जाएगा।
                      जय श्रीकृष्ण जी की
      

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण - लेख संख्या - 5 (सृष्टि का विस्तार)

                        ब्रह्मा जी की उत्पत्ति
पिछले लेख  में हमने सृष्टि की रचना के बारे में पढ़ा  था।  इस लेख में हम ब्रह्मा जी की उत्पत्ति और उनके  द्वारा  किए  सृष्टि के विस्तार के बारे चर्चा करेंगे। सृष्टि  के  पूर्व  यह  संपूर्ण  विश्व जल में डूबा हुआ था। नारायण देव शेष शैया पर लेटे  हुए  थे। ज्ञान शक्ति को अक्षुण्ण रखते हुए ही, योग निद्रा का आश्रय ले अपने नेत्र मूंदे हुए थे। उन्हें सृष्टि काल आने पर पुन: जगाने के लिए केवल काल शक्ति को  ही  जागृत  रक्खा  हुआ  था। एक सहस्र चतुर्युग बीत जाने के बाद और शयन के  उपरांत  उनकी काल शक्ति ने उन्हें जीवों के कर्मों  की  प्रवृति  के  लिए  प्रेरित किया। तभी उनकी ही प्रेरणा से उनकी  नाभि  से  एक  कमल का पुष्प उत्पन्न हुआ। फिर उसमें से ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए। ब्रह्मा जी ने उस कमल का आधार ढूंढना चाहा। वे दूर तक नीचे गए परंतु उनको कमल का कोई आधार नहीं मिला। अंत में उनको तपस्या करने की प्रेरणा हुई। तपस्या करने पर उनको  भगवान और उनके धाम बैकुंठ के  दर्शन  हुए। उन्होंने  देखा  कि  वहां  पर  काल, माया और तीनों गुणों का कोइ प्रभाव नहीं है। वहां  पर  लक्ष्मी जी एवं नंद, सुनंद आदि पार्षद भी  हैं  जो  भगवान की सेवा कर रहे हैं।  महतत्व  आदि 25 शक्तियां  भी  भगवान की सेवा में   ही रहती हैं। भगवान नित्य स्वरुप में निमग्न रहते हैं।  ब्रह्मा जी  ने भगवान से प्रार्थना  की कि,"हे भगवान  मुझे  अपने  सगुण  और निर्गुण  स्वरुप  का  ज्ञान  प्रदान  करने  की कृपा  करें,  जिससे  मैं  सृष्टि  विस्तार  का   मर्म   जान   सकूं और  मुझे अभिमान भी ना आए। तब भगवान ने ब्रह्मा जी को भागवत का ज्ञान दिया।
                      चतु:  श्लोकी भागवत
भगवान ने कहा " हे ब्रह्मा मेरी कृपा से तुझ में पहले से  ही वेद का ज्ञान है।  तुम अब मेरे  विस्तार का  ज्ञान  ग्रहण  करो।
1. सृष्टि से पूर्व केवल मैं ही था।  सत् , असत  और  उससे परे, मुझ से भिन्न, कुछ भी नहीं था।  सृष्टि  ना  रहने  पर  भी  मैं ही रहता हूँ। यह सब सृष्टि रूप भी मैं ही हूँ। जो कुछ सृष्टि, स्थिति (पालन) और प्रलय से बचा रहता है, वह भी मैं ही हूँ।
2. जो मुझ मूल तत्व के अतिरिक्त  सत्य  सा  प्रतीत  होता  है, परंतु आत्मा में प्रतीत नहीं होता, उस अज्ञान  को  आत्मा  की  माया  समझो, जो प्रतिबिंब या अंधकार की  भांति  मिथ्या  है।
3. जैसे  पंच  महाभूत  ( पृथ्वी,  जल, अग्नि,  वायु,  आकाश) संसार के छोटे बड़े सभी पदार्थों में  प्रविष्ट  होते  हुए भी  उनमें प्रतीत नहीं होते, वैसे ही मैं भी सब में व्याप्त होने पर भी सबसे प्रथक हूँ।
4. आत्म तत्व को जानने की इच्छा रखने वाले के  लिए  इतना ही जानने योग्य है कि सृष्टि अथवा प्रलय क्रम में जो तत्व सर्वत्र एवं सर्वदा स्थान और समय से परे रहता है वही आत्म तत्व है। भगवान ने इस चतु: श्लाेकी भागवत के  द्वारा  उपदेश  देने  के बाद अपना रूप छिपा लिया।
            ब्रह्मा जी द्वारा नारद जी को भागवत ज्ञान
ब्रह्मा जी नारद जी को 10 लक्षण वाली  भागवत  सुनाते  हुए  कहते हैं कि  इन 10 लक्षणों  से  पूरे  सृष्टि  चक्र  का  बोध  हो जाता है। यह इस प्रकार हैं:
1. सर्ग :-- महत्तत्व आदि की उत्पत्ति (जो लेख - 4 में विस्तार से बताई गई है)
2. विसर्ग:-- विभिन्न सृष्टिओं का ब्रह्मा जी द्वारा निर्माण।
3. स्थान : प्रति पल विनाश  की  ओर  बढ़ने  वाली  सृष्टि  को  मर्यादा में स्थिर रखने की भगवान विष्णु की श्रेष्ठता।
4. पोषण:-- भगवान की भक्तों पर कृपा।
5. मन्वन्तर:-- मन्वन्तरों के अधिपति जो भगवद्भक्ति और शुद्ध धर्म अनुष्ठान आदि करते हैं।
6. उती:    जीवों की वे वासनाएं जो कर्म के द्वारा उन्हें बंधन में डाल देती हैं।
7. ईश कथा: भगवान के अवतारों एवं भक्तों की कथाएं।
8. निरोध:  जब भगवान योग निद्रा स्वीकार करके शयन करते हैं, तब जीव का अपनी उपाधियों के साथ उनमें लीन हो जाना ही ' निरोध ' कहलाता है।
9. मुक्ति: अज्ञान का परित्याग और वास्तविक स्वरुप परमात्मा में स्थित होना ही मुक्ति है।
10. आश्रय:-- परम ब्रह्म ही आश्रय है।  विराट  पुरुष  के  रूप में  कहीं रहने की इच्छा से जल उत्पन्न हुआ। विराट  पुरुष  नर से उत्पन्न होने के  कारण  ही  जल  का  नाम  नीर  पड़ा।  एक हजार वर्षों तक जल में रहने के  कारण  ही  विराट  पुरुष  का नाम नारायण  पड़ा।  उनकी  कृपा  से  ही  द्रव्य,  कर्म,  काल, स्वभाव और जीव आदि की सत्ता है।
 विराट पुरुष का स्वरुप बाहर की ओर से महत्तत्व और प्रकृति के कुल 18 आवरणों से  घिरा  है।  यह  सूक्षम  रूप, अव्यक्त, निर्विषेश, आदि - मध्य से रहित एवं नित्य है। वाणी  और  मन की वहां तक पहुंच नहीं है।
   उपरोक्त दोनों माया द्वारा रचित हैं। विद्वान् लोग दोनों को ही स्वीकार नहीं  करते।  वास्तव  में  भगवान्  निष्क्रिय  रहते  हैं। अपनी शक्ति से ही वे सक्रिय बनते हैं। फिर वे ब्रह्मा या  विराट आदि रूप धारण करके वाच्य, वाचक और  शब्द  के  रूप  में प्रकट होते हैं। और अनेकों  रूप, नाम  तथा  क्रियाएं  स्वीकार करते हैं। तीनों गुणों के आधार पर देवता, मनुष्य और  नार्किय योनियां मिलती हैं।

                    ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि विस्तार
1. पांच  व्रतियां  उत्पन्न  की - तम  (अविद्या),  मोह,  महामोह (राग ),  तामिस्र (द्वेष),  और  अंधतामिस्र (अभिनिवेश)।  इस सृष्टि से ब्रह्मा जी अप्रसन्न हुए।
2. सनत, सुनंदन, सनातन और सनत कुमार नामक चार ऋषि
जो सदा बाल रूप में ही रहते हैं। चारों जन्म से  ही  मोक्षमार्गी हुए। उन्होने आगे सृष्टि बढ़ाने के लिए मना कर दिया।
3. ब्रह्मा जी को इस बात पर क्रोध हुआ। उनकी भौंहों से  नील लोहित बालक ( रुद्र ) प्रकट हुए। रुद्र द्वारा प्रकट की गई सृष्टि दशों दिशाओं को जलाने लगी।
4. फिर ब्रह्मा जी ने 10 पुत्र उत्पन्न किए। उनके नाम थे  नारद, दक्ष, वशिष्ठ, भृगु, कृतु, पुलह, पुलस्त्य, अंगिरा,अत्रि,  मरीचि।
5. इसके इलावा -- धर्म, अधर्म, काम  क्रोध,  लोभ,  सरस्वती,
समुद्र, राक्षसों का अधिपति निरिर्ती और ऋषि कर्दम, वेद और अंधकार आदि भी उत्पन्न किए।

                      मेथुनी सृष्टि का आरंभ
सृष्टि आगे ना बढ़ती देख ब्रह्मा जी ने अपने  शरीर  से ही  एक पुरुष और एक स्त्री का जोड़ा उत्पन्न किया। पुरुष का नाम था ' मनु '  और स्त्री का नाम था ' शतरूपा '।  यहां से आगे  सृष्टि का विस्तार तेजी से हुआ। और बीच बीच में  भगवान  ने  कई बार अवतार भी ग्रहण किए। उन अवतारों के बारे अगले लेख में लिखेंगे
                       जय श्रीकृष्ण जी की

       

मंगलवार, 5 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण - लेख संख्या - 4 (सृष्टि रचना)

परीक्षित ने श्री शुकदेव जी से पूछा कि भगवान अपनी माया से सृष्टि की रचना कैसे करते है। इसके उत्तर में श्री  शुकदेव जी ने परीक्षित से कहा कि यही  प्रश्न  एक  बार  नारद  जी  ने ब्रह्मा जी से पूछा था और ब्रह्मा जी ने जो उत्तर दिया था, वो मैं तुम्हें बताता हूं। सुनो:
       ब्रह्मा जी ने कहा, " हे नारद मैं , स्वयं प्रकाश भगवान, से प्रकाशित  होकर  संसार  को  प्रकाशित  करता हूँ।"  भगवान निराकार होते हुए भी सर्वस्वरूप हैं। उन्होंने ही मुझे बनाया है।
भगवान माया के गुणों से रहित, अनंत,  इंद्रियातीत हैं। उनकी दृष्टि से प्रेरित होकर ही मैं सृष्टि  करता  हूँ।  भगवान  माया  के तीनों गुणों (सत्व, रज और तमोगुण) से  अपने  आप को  ढक लेते हैं। इस लिए लोग उसे जान नहीं पाते। जीव  माया  में  रम कर ' मैं और मेरा में पड़ जाता  है'।  जीव  अगर  माया  से  दूर रहता है तो आत्माराम बन जाता है। इस को समझने  के  लिए सृष्टि रचना को विस्तार से जानना आवश्यक  है।  आओ  सृष्टि रचना का  संक्षिप्त वर्णन करते हैं।
   भगवान द्वारा माया से सृष्टि की रचना:
मायापती भगवान ने एक से अनेक  होने  की  इच्छा  होने  पर अपनी माया से अपने स्वरुप में स्वयं  प्राप्त,  'काल, कर्म  और स्वभाव' को स्वीकार कर लिया
   महत्तत्व की उत्पत्ति:
काल  ने  तीनों  गुणों ( सतोगुण, रजोगुण, और  तमोगुण)  में क्षोभ उत्पन्न किया। स्वभाव ने तीनों गुणों को  रूपांतरित  कर दिया। और कर्म ने महत्तत्व को जन्म दिया। महत्तत्व का अर्थ है ( sum total of material  creation (ultimate end of the all universes)
    अहंकार की उत्पत्ति:
 महत्तत्व में रजोगुण और सतोगुण  की वृद्धि होने पर महत्तत्व में विकार हुआ उससे ज्ञान, क्रिया  और द्रव्य रूप  तम: प्रधान विकार हुआ। उस विकार को कहा  गया  अहंकार (पहचान)।
    अहंकार के तीन रूप: 
अहंकार फिर विकारों को प्राप्त हुआ और तीन प्रकार  का  हो गया:-
1. वैकारिक अहंकार से मन, इन्द्रियों के देवताओं की उत्पत्ति:  यह अहंकार  'ज्ञान शक्ति' प्रधान है। इस से  मन  की उत्पत्ति हुई। इस से इन्द्रियों के 10 अधिष्ठातृ  देवताओं की  भी उत्पत्ति हुई जिनके  नाम  हैं:-- दिशा, वायु, सूर्य, वरुण, अश्वनी कुमार, अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मित्र और प्रजापति।
2. तेजस अहंकार से बुद्धि, प्राण एवं इन्द्रियों का निर्माण:   यह अहंकार 'क्रिया शक्ति'  प्रधान है। इसके विकार से  पांच  ज्ञान इन्द्रियां--- श्रोत्र (कान), त्वचा, नेत्र, जिह्वा  और नाक;  पांच कर्म इन्द्रियां -- मुख, हस्त,  पैर,  गुदा और  जनन अंग उत्पन्न हुईं।  साथ ज्ञान शक्ति रूप बुद्धि और क्रिया  शक्ति रूप प्राण भी तेजस अहंकार से ही उत्पन्न हुए।
3. तामस अहंकार से पांच भूत एवं पांच तन्मात्रा निर्माण:
 यह  द्रव्य  शक्ति  प्रधान  अहंकार  है।इसमें  विकार  आने  से  'आकाश की उत्पत्ति' हुई। आकाश का गुण है शब्द। शब्द के द्वारा ही दृष्टा और द्रव्य का बोध होता  है। आकाश  में  विकार आने से  'वायु की उत्पति' हुई। वायु का  गुण है  स्पर्श।  अपने कारण का गुण आ जाने से शब्द भी इसका गुण है। इन्द्रियों में स्फूर्ति, शरीर में जीवन शक्ति, ओज़ और बल इसी के रूप  हैं। काल, कर्म और स्वभाव से वायु में  भी  विकार  हुआ।  उससे  'तेज (अग्नि) की उत्पत्ति'  हुई।  इसका  प्रधान  गुण, रूप  है। इसमें इसके कारण आकाश और वायु के गुण शब्द और स्पर्श भी  हैं। तेज के विकार से  जल की उत्पत्ति हुई। इसका गुण है रस। कारण तत्वों के गुण शब्द, स्पर्श, और रूप भी  इसमें  हैं। जल के विकार से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई। इसका  गुण  है  गंध। इसके  कारण  तात्वों  के गुण शब्द, स्पर्श, रूप  और  रस  भी इसमें विद्यमान हैं।
   विराट पुरुष की उत्पत्ति:
हे नारद जिस  समय  यह  पंच  भूत, इन्द्रियां, मन, और  सत्व, रजो और तमो गुण परस्पर संगठित नहीं थे, तब अपने रहने के लिए, भोगों के साधन रूप शरीर की रचना नहीं कर सके। जब भगवान ने  उन्हें  अपनी  शक्ति  से  प्रेरित  किया  तब  वे  तत्व परस्पर एक दूसरे के साथ  मिल  गए। उन्होंने  आपस में  कार्य कारण भाव को स्वीकार करके व्याष्टी-- समष्टि रूप पिंड और ब्रह्माण्ड दोनों की  रचना  की।  वह  ब्रह्माण्ड  रूप  अंडा  एक सहस्र वर्ष तक निर्जीव रूप से जल में पड़ा रहा। फिर भगवान ने उसे जीवत कर दिया। उसको फोड़ कर उसमें से वही विराट रूप निकला जिसकी जंघा, चरण, भुजाएं, नेत्र, मुख और सिर सहस्त्रों की संख्या में हैं।
   चौदह लोकों के नाम:
श्रीमद्भागवत में  कुल चौदह लोकों का वर्णन आता  है।  उनके नाम हैं:-- भू - लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महरलोक,  जनलोक, तपोलोक,  सत्यलोक  और  अतल,  वितल,  सुतल,  तलातल, महातल, रसातल एवं पताल्लोक। यह सब लोक  विराट  पुरुष के अंदर ही आते हैं। अगला लेख सृष्टि के  विस्तार  के  बारे  में होगा।
                       (जय श्रीकृष्ण जी की)

रविवार, 3 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण, लेख संख्या-3 (परीक्षित जी का अनशन व्रत)


     राजऋषि परीक्षित:
              महाराज परीक्षित अर्जुन के पौत्र एवं अभिमन्यु तथा उत्तरा के पुत्र थे। पांडवों ने हिमालय को  चले  जाने से  पहले अपना सारा राजपाट अपने पौत्र  परीक्षित को  सौंप दिया था। राजा परीक्षित साहसी और कल्याणकारी  शासक  थे।  हमेशा लोकहित में ही कार्य करते थे।
    परीक्षित और कलयुग:
एक दिन राजा ने  देखा कि कलयुग उनके राज्य में  प्रवेश  कर चुका है और धर्म को नष्ट करने की चेष्टा कर रहा है। जब राजा उसको दण्ड देने लगा तो उसी समय कलयुग  ने  क्षमा  याचना की कि मैं किसी को कष्ट नहीं दूंगा कृपया मुझे  रहने  के  लिए कोई स्थान प्रदान करने की कृपा करें।  इस पर राजा  को  दया आ गई और राजा ने कहा कि  तुम्हारी  प्रवृत्ति  के  अनुसार  मैं तुम्हें जुआ घर, वेश्यालय, और मदिरालय  आदि  में  रहने  की अनुमति देता हूं। इस पर कलयुग ने कहा कि राजन  कोई  एक अच्छा स्थान भी बता दो जहां  मैं निवास  कर  सकूं।  इस  पर परीक्षित जी ने उसको  सोने ( गलत ढंग से कमाया हुआ धन ) में निवास करने की आज्ञा भी दे दी।
     परीक्षित को श्रृंगी ऋषि का शाप:
एक दिन राजा को पांडवों द्वारा जीती  हुई बहुत सारी बहुमूल्य वस्तुओं को देखने का मन हुआ। राजा ने वहां पड़ा हुआ  एक  मुकुट देखा और उसे पहन लिया। वास्तव में वो मुकुट जरासंध का था जो  बहुत ही  पापी और क्रूर राजा था।  उस मुकुट  को पहनते ही राजा की बुद्धि भृष्ट हो गई। राजा उसी समय वन में शिकार खेलने चला गया। शिकार करते करते राजा  को  जोर की प्यास लगी। राजा ऋषि शमीक की कुटिया  में  गए।  साधु महाराज  ध्यान में  बैठे थे। राजा ने सोचा कि मेरा कोई  आदर सत्कार नहीं हुआ। गुस्से में राजा ने एक  मरा हुआ सांप  लिया और ऋषि के गले में डाल दिया  और  चला  गया।  उधर  जब ऋषि के पुत्र श्रृंगी को पता चला तो  उसने  राजा  को  शाप  दे दिया कि आज से सातवें दिन तक्षक नाग के डसने से परीक्षित की मृत्यु हो जाएगी। ऋषि श्मीक को जब शाप के बारे में पता चला तो उन्होंने अपने पुत्र को कहा कि यह  तुमने अच्छा  नहीं किया , हमारे राजा तो बहुत ही अच्छे हैं। अब तुम वहां जाकर उनको सूचित करो ।
     राज ऋषि का पश्चाताप और अनशन व्रत: 
उधर जब राजा ने घर जाकर मुकुट उतारा और जब होश आई तो राजा को बहुत पछतावा हुआ। इतने में राजा को  शाप  का समाचार भी मिल गया। राजा इस बात के लिए प्रसन्न  हुए  कि उन्हें पश्चाताप का अवसर मिल गया है।  राजा  ने  उसी  समय अपने बेटे जनमेजा को राज्य सौंपा  और  मुक्ति  की  खोज  में गंगा जी के तट पर चले गए। राजा होते हुए भी  परीक्षित  एक उच्च कोटि के ऋषि थे। उनको देखने के लिए वहां  पर  महर्षि अत्री जी, वशिष्ट जी, च्यवन ऋषि, अरिष्टनेमी जी, अंगिरा  जी, पराशर जी, और व्यास जी  आदि  अनेकों  ॠषी  पधारे। राज ऋषि परीक्षित जी ने सबको प्रणाम किया।  ऋषियों ने  उनको आशीर्वाद प्रदान किया।
     श्री शुकदेव जी द्वारा कथा आरंभ:
उसी समय वहां पर शुकदेव जी भी पधारे। परीक्षित जी ने उठ कर उनको प्रणाम किया।  परीक्षित ने उन से शाप  मुक्ति  नहीं मांगी अपितु प्रार्थना की कि उसे कोई ऐसा साधन बताएं, जिस के करने से मृत्यु के बाद  जो  भी  जन्म  उसे  मिले, उसमें  श्री कृष्ण जी की भक्ति और उनकी रसमई लीलाओं में रूचि  बनी रहे।  मेरी दृष्टी में सभी प्राणी एक  समान  हों। आप  मेरे  शाप के कारण ही स्वयं भगवान बन कर पधारे हैं। मेंने अपना चित्त भगवान में अर्पण कर दिया  है।  इसके  बाद सभी  ऋषियों  ने श्री शुकदेव जी को प्रार्थना की वे राज ऋषि परीक्षित और सारे जगत के कल्याण हेतु  श्रीमद्भागवत  कथा  सुनाने  की  कृपा  करें। एक ऊंचे आसन पर श्री शुकदेव  जी  को  बैठाया  गया। जब श्री शुकदेव जी कथा सुनाने को सहमत हो गए तो आज्ञा लेकर परीक्षित जी  ने  एक प्रश्न किया  कि यदि  मृत्यु  में  कम समय बचा हो तो मनुष्य को क्या करना और  क्या नहीं  करना चाहिए?
शुकदेव जी ने कहा कि यदि अभय पद को प्राप्त करना  है  तो श्री कृष्ण की लीलाओं का  श्रवण, कीर्तन  और  स्मरण  करना चाहिए। ज्ञान, भक्ति, धर्म की निष्ठा आदि कोई भी  साधन  करें परन्तु ऐसा करें कि मृत्यु के समय भगवान की स्मृति बनी  रहे। लीला वर्णन बहुत ही महत्वपूर्ण साधन है। यहां तक कि निर्गुण स्वरूप में स्थित बड़े बड़े ऋषि मुनि भी लीला वर्णन में ही  लगे रहते हैं। द्वापर के अंत में ही  मैने  यह  कथा  अपने  पिता  श्री व्यास जी से सुनी है। तुम चिंता मत करो। राजर्षी  खटवांग  ने दो घटी जीवन रहते ही, अपना सब कुछ त्याग कर अभय  पद पा लिया था। तुम्हारे पास तो सात दिन हैं।
सुनो, ऐसी अवस्था में व्यक्ति को चाहिए कि वह बिना  घबराए, वैराग्य से ममता को काट डाले,  ॐ का उच्चारण मन  में  करे। मन को इन्द्रियों से हटा ले और  भगवान  के  विग्रह  का  ध्यान करे। एक क्षण के लिए भी रूप को ना भूले। एक एक अंग का ध्यान करते करते तल्लीन हो जाए। अगर ध्यान  हट  भी  जाए तो फिर से जोड़े। नित्य निरंतर अभ्यास से उसे  भक्ति योग की प्राप्ति हो जाती है।
यह सुनकर परीक्षित ने अपनी शुद्ध बुद्धि भगवान श्री कृष्ण के चरणों में अनन्य भाव से समर्पित करदी।  उसी समय  परीक्षित के मन में एक और भाव आया और उसने दूसरा प्रश्न किया कि भगवान  अपनी माया से सृष्टि की रचना कैसे करते हैं।
         इस प्रश्न के उत्तर की व्याखया अगले लेख -4 में की जाएगी।
                           जय श्रीकृष्ण जी की
     

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण, लेख संख्या 2 - (गोकर्ण की कथा एवं भक्ति की महिमा)

 श्रीमद्भागवत कथा के गुण:-    एक बार नैमिशरण्य तीर्थ  में शौनक आदि अठासी हज़ार ऋषियों को कथा सुनाते  हुए  सूत जी ने श्रीमद्भागवत महापुराण के  गुणों  का  वर्णन  किया था। उन्होंने बताया कि यह ग्रंथ संपूर्ण सिद्धांतों का  निष्कर्ष है, यह जन्म और मृत्यु के भय का नाश करता  है, वैराग्य  और  त्याग प्रदान करके भक्ति और प्रेम के प्रवाह को बढ़ाता है और स्वयं भगवान की प्रसन्नता का प्रधान कारण है। कलयुग में जीवों के दुखों का नाश करने, मन  को  शांति देने और  तीनों  तापों  को नष्ट करने का साधन है। यह मनुष्यों के लिए ऐसा अमृत  तुल्य वरदान है जो देवताओं के लिए भी  दुर्लभ  है।  स्वयं ब्रह्मा  जी और ऋषियों मुनियों ने भी इस ग्रंथ की सराहना  की  है।  जीव के जन्म जन्मांतर के पुण्य उदय होने पर ही उसे इस  कथा को श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
सनक आदि ऋषियों की नारद जी से भेंट :-  यद्यपि  नारद जी ने भागवत कथा अपने पिता ब्रह्मा जी से सुनी हुई थी  फिर भी कथा की सप्ताह विधि उन्होंने सनक आदि ऋषियों  से  ही श्रवण की थी। एक बार नारद जी विशाल पुरी में  गए थे।  वहां उनकी भेंट सनक आदि ऋषियों से हो गई। ऋषियों द्वारा नारद जी से उनकी उदासी का कारण पूछने पर  नारद  जी  ने  उत्तर देते हुए कहा:-
  कलयुगी जीवो में असंतोष व्याप्त है:-   "मैं सर्वोत्तम लोक समझ कर पृथ्वी लोक पर आया था। तथा यहां पुष्कर, प्रयाग, काशी, गोदावरी, हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, श्रीरंग और  सेतुबंध  आदि कई तीर्थों में मैं इधर उधर विचरता रहा।  किन्तु  मुझे  कहीं भी मन को सन्तोष देने वाली शांति नहीं मिली।  इस  समय अधर्म के सहायक कलयुग ने सारी पृथ्वी को पीड़ित  कर  रक्खा  है। अब यहां सत्य, तप, शौच, दया, दान आदि कुछ  भी  नहीं  है। बेचारे जीव केवल अपना पेट पालने में लगे हुए  हैं।  वे असत्य भाषी आलसी, मंद बुद्धि,भाग्य हीन एवं  उपद्रव  ग्रस्त  हो  गए हैं। जो देखने में विरक्त प्रतीत होते हैं वे वास्तव में ऐसे नहीं  हैं।
  भक्ति की दशा दयनीय है:-     यमुना तट पर जहां श्रीकृष्ण जी की अनेकों लीलाएं हो चुकी हैं, वहां पर मैंने देखा कि  एक युवती स्त्री खिन्न मन से बैठी हुई थी। उसके पास दो वृद्ध पुरुष अचेत अवस्था में पड़े ज़ोर ज़ोर से सांस ले रहे थे। वह स्त्री उन पुरुषों की सेवा करती हुई कभी उन्हें होश में  लाने  का  प्रयास करती तो कभी रोने लगती थी। चारों ओर  सैकड़ों  स्त्रियां उन्हें पंखा कर रही थीं। जब मैने पूछा कि देवी तुम कौन हो तो  उस स्त्री ने कहा कि," मैं भक्ति हूँ। यह दोनों  मेरे  पुत्र हैं  ज्ञान  और वैराग्य। यह जो स्त्रियां मुझे पंखा कर  रही  हैं  यह  गंगा  आदि नदियां हैं। यह सब मेरी सेवा के लिए आई हैं। परंतु मुझे  शांति नहीं मिल रही है। जब से मैं वृंदावन में आई  हूं  तब  से  मैं  तो परम सुंदरी नवयुवती हो गई हूं परन्तु यह  मेरे  दोनों  पुत्र अभी भी थके मांदे दुःखी हो रहे हैं।" तब मैने कहा हे  देवी  श्री  हरि  तुम्हारा कल्याण करेंगे। हे देवी, कलयुग के कारण  योग  मार्ग, सदाचार आदि का स्थान शठता और  दुष्कर्म  ने  ले  लिया  है। लोग कुकर्मी हो गए हैं। इन्हीं कारणों से इनकी यह स्थिति बनी हुई है। अन्यथा हे भक्ति तुम तो भगवान की  बहुत  प्यारी  हो। तुम्हारे बुलाने पर तो भगवान कहीं भी प्रकट हो जाते  हैं।  तीन युगों में ज्ञान और वैराग्य ही मुक्ति के साधन थे परंतु कलयुग में तो केवल भक्ति ही मोक्ष प्राप्त करवाने वाली है। तुम  चिंता  ना करो मैं कोई उपाय सोचता हूँ। कलयुग में जो लोग तुम से युक्त होंगे वे पापी होने पर भी बे खटके भगवान श्रीकृष्ण के  अभय धाम को प्राप्त होंगे। जो भक्ति युक्त हो जाता  है  उसका  अंत: करण शुद्ध हो जाता है।  उसे  कोई प्रेत, पिशाच, राक्षस  कभी स्पर्श भी नहीं करते। उसी समय भक्ति  के  सारे  अंग  पुष्ट  हो गए। भक्ति ने कहा," हे ऋषि  वर  आपने  जैसे  मुझे  पुष्ट  कर दिया है उसी तरह मेरे पुत्रों को भी कीजिए।"
 नारद जी द्वारा भक्ति के कष्ट निवारण का उद्योग :   नारद जी ने ऋषियों को बताया," तब मैंने भगवान को स्मरण किया। उसी समय आकाशवाणी  हुई। " मुने, खेद  मत  करो,  तुम्हारा यह उद्योग नि:संदेह सफल होगा। तुम  एक  सत्कर्म  करो।  वो सत्कर्म तुम्हें संत शिरोमणि महानुभाव बताएंगे।  उस  अनुष्ठान के करते ही क्षण भर में इनकी  नींद  और  वृद्ध  अवस्था  चली जाएगी और सर्वत्र भक्ति का प्रसार होगा।" वो संत  कौन  होंगे उनको ढूंढते ढूंढते मैं थक गया परंतु  किसी  निष्कर्ष  पर  नहीं पहुंच सका। तब मैंने तप करने  की  बात  सोची  और  विशाल पुरी में आ गया। यहां पर  आप  के  दर्शन  करके  में  धन्य  हो गया। अब कृपा करके आप ही इसका कोई उचित उपाय  बता कर इस कष्ट का निवारण कीजिए।"
 सनक आदि ऋषियों द्वारा उपाय बताना :-   नारद जी की बात सुन कर सनक आदि ऋषियों ने नारद  जी  को  कहा," हे नारद जी आपने सभी के हित की बात पूछी  है।  सुनिए,  द्रव्य यज्ञ, तपो यज्ञ, योग यज्ञ और स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ यह  सब तो स्वर्ग की प्राप्ति करने वाले कर्म की ओर ही संकेत करते हैं। विद्वानों ने  ज्ञान  यज्ञ  को  ही  सत्कर्म (मुक्ति दायक कर्म) का सूचक माना है। वह श्रीमद्भागवत का पारायण है जिसका गान शुक आदि महानुभावों ने किया है।  उसके  शब्द  सुनने  से  ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को बड़ा बल  मिलेगा।  इसके  इलावा कलयुग के सारे दोष नष्ट हो जाएंगे। तब भक्ति अपने  पुत्रों  के साथ प्रत्येक घर एवं व्यक्ति के हृदय में क्रीड़ा करेगी। यह कथा सभी ग्रंथों का सार (फल) है।" नारद जी ने कहा  कि " मैं  प्रेम लक्षणा भक्ति का प्रकाश करने  के  उद्देश्य  से  आपकी  शरण लेता हूँ।" सनक आदि ऋषियों ने कहा कि  हरिद्वार  के  आनंद घाट पर कथा होगी। इस  प्रकार  कहकर  नारद  जी  के  साथ सनक आदि भी श्रीमद्भागवत कथा का अमृत पान करने  गंगा तट चले आए। सनक आदि ऋषि  नारद जी द्वारा दिए हुए श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हुए। श्रोताओं में नारद जी  सबसे  आगे बैठे। एक तरफ देवता और  दूसरी  तरफ  ऋषिगण।  विधिवत पूजा होने के उपरांत सनक आदि  श्रीमद्भागवत  का  माहात्म्य स्पष्ट करके सुनाने लगे। उन्होंने बताया  कि  जिस  घर  में  यह कथा होती है वह घर तीरथ बन जाता है। महात्म्य सुनने से श्री हरि हृदय में आ विराजते हैं। हजारों अश्वमेध यज्ञ इस कथा का सोलहवां अंश भी नहीं हो सकते। दिनों का कोई नियम नहीं है हमें तो सर्वदा ही सुनना  अच्छा  लगता  है।  कलयुग  में  बहुत दिनों तक चित्त की वृत्तियों को वश में रखना कठिन  होता  है। इस लिए सप्ताह श्रवण की विधि भी  बनाई  गई  है।  इकादश स्कंध में अपने धाम को जाने से पहले उद्धव जी के प्रश्न  करने पर भगवान ने कहा था कि मैंने अपनी सारी शक्ति  भागवत  में रख दी है। इस तरह यह साक्षात शब्द मेरी  ही  मूर्त्ति है।  इसके दर्शन मात्र से ही सारे कष्ट नष्ट हो जाते हैं। इस कथा  के  बिना भगवान की माया से पीछा छुड़ाना मुमकिन नहीं है।
     तभी सभा में बड़ा आश्चर्य हुआ। तरुण अवस्था  को  प्राप्त हुए अपने दोनों पुत्रों को साथ लेकर प्रेम रूप  भक्ति  बार  बार भगवान के "श्री  कृष्ण  गोविन्द  हरे  मुरारी  हे  नाथ  नारायण वासुदेव" आदि नामों का उच्चारण करती हुई अकस्मात  प्रकट हो गई। सभी की शंका दूर करने के लिए सनक  आदि ने  कहा कि यह भक्ति देवी अभी अभी कथा के ही  अर्थ से निकली है। भक्ति ने कहा,"मैं कलयुग में नष्ट प्राया हो गई थी। आपने कथा अमृत से सींच कर मुझे फिर से पुष्ट कर दिया है। अब आप  ही मुझे यह बताएं कि " मैं कहां रहूं।" तब सनक आदि ऋषियों ने कहा कि तुम भगवान का स्वरूप  प्रदान  करने  वाली,  अनन्य प्रेम का संपादन करने वाली हो और तुम संसार रोग को निर्मूल करने वाली हो। अत: तुम ही  धैर्य  धारण  करके  नित्य निरंतर भगवद्भक्तों के हृदयों में ही निवास करो। कलयुग के दोष  भले ही सारे संसार पर अपना प्रभाव डालें परंतु वहां तुम पर इसकी दृष्टि भी नहीं पड़ सकेगी। इस  प्रकार  उनकी  आज्ञा  पाते  ही भक्ति तुरंत भक्तों के हृदयों में का विराजी। जिसके हृदय भक्ति - वहां भगवान की शक्ति। भू लोक  में  भागवत  साक्षात  परम ब्रह्म का विग्रह है। सुनने और सुनाने वाले दोनों को ही भगवान श्री कृष्ण की समता प्राप्त हो जाती है।
      उस समय अपने भक्तों  के  हृदय  में  भक्ति  का  प्रादूर्भाव हुआ देखकर भक्तवत्सल भगवान अपना धाम छोड़  कर  वहां पर आ पधारे। चारों ओर जय जयकार की गूंज  हुई।  भगवान श्री हरि का रूप बड़ा ही मनमोहक था:
    गले वन माला, श्याम वर्ण, पीताम्बर सोहे।
    सिर पर मुकुट, कटी प्रदेश पर करधनी सोहे।।
    वक्ष स्थल पर उनके कौसतुभ मणि दमके।
    श्री अंग हरि चंदन से चर्चित, कान में कुण्डल चमके।।
    त्रिभंग ललित भाव से खड़े चित्त चुराएं।
    वहां उपस्थित सभी जनों के मन हर्षाएं।।
उसी समय भगवान, भक्तों  के  निर्मल  चित्त  में  अविर्भूत  हुए और वह स्थान तीरथ बन गया। नारद जी ने कहा  कि  यह  तो मैंने कथा की अलौकिक महिमा देखी है। साथ ही नारद जी  ने सनक आदि ऋषियों से जन कल्याण  के  लिए  एक  बहुत  ही सुंदर प्रश्न किया कि कौन कौन से ऐसे लोग हैं जिन्हें इस  कथा से पवित्र होने का सौभाग्य प्राप्त हो सकता है और उनके  पाप कट सकते हैं। इसके उत्तर में ऋषियों ने कहा:-
    ये मानवा: पाप कृतस्तु सर्वदा
    सदा दुराचार रता विमार्ग गा:।
    क्रोधाग्नि दग्धा: कुटीलाश्च कामिन:
    सप्ताह यज्ञेन कलौ पुनन्ति ते।।
ऋषियों ने कहा कि हे नारद जी, सभी प्रकार के मानव चाहे वो सदा पाप करते रहे हों, दुराचारी हों, उल्टे मार्ग पर चलने  वाले हों, क्रोधी हों, कुटिल हों सब के सब  इस  कथा  के  प्रभाव  से पवित्र हो जाते हैं। इस संबंध में एक प्राचीन  इतिहास  आपको सुनाते हैं। आप लोग धैर्य पूर्वक श्रवण करें।
 गोकर्ण की कथा:- पूर्व काल में तुंगभद्रा नदी के तट पर एक सुंदर नगर बसा हुआ था। उस नगर में समस्त वेदों का विशेषज्ञ और श्रौत स्मार्त कर्मों में निपुण एक आत्मदेव  नामक  ब्राह्मण रहता था। वह तेजस्वी और धनी था।  धनी  होते  हुए  भी  वह भिक्षा जीवी था। उसकी  प्यारी पत्नी जिसका नाम धुंदली था, कुलीन, ग्रह कार्य में निपुण एवं  सुंदरी  थी।  परंतु  स्वभाव  से बहुत ही हठी, क्रूर एवं झगड़ालू थी।  उनके  कोई  संतान  नहीं थी जिसका ब्राह्मण को बहुत संताप था। अनेकों  साधन  किए परंतु संतान प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन इसी  बात  के  लिए  वह बहुत दुखी हो रहा  था।  वह  घर  से  निकला और  बाहर  एक तालाब के किनारे आकर बैठ गया। वहां पर उसे एक  सन्यासी के दर्शन हुए। उसने सन्यासी के पास जाकर प्रणाम किया और अपना सारा दुखड़ा उन्हें सुना दिया।  सन्यासी  ने  उसके  माथे की लकीरें पढ़ कर उसको कहा कि वो  संतान  के  बारे  में  ना सोचे क्योंकि अगले सात जन्मों तक तो उसके  भाग्य  में  कोई संतान नहीं है। यह भी कह दिया  कि  उसे  तो  सन्यास  धारण कर लेना चाहिए। परंतु उस ब्राह्मण ने सन्यासी से कहा कि वो  सन्यास धारण नहीं करेगा। यह भी कहा कि ,"आप बल पूर्वक मुझे पुत्र  प्राप्ति  का  वरदान  दीजिए  वरना  मैं  अभी  आपके सामने ही शोक मूर्छित  होकर  अपने  प्राण  त्याग  दूंगा।" जब महात्मा ने देखा कि यह किसी प्रकार भी हठ नहीं छोड़ रहा तो उसने ब्राह्मण को एक फल देते हुए कहा कि इसे अपनी  पत्नी को खिला देना। तुम्हारी स्त्री  को  एक  साल  तक सत्य, शौच, दया, दान और एक समय एक ही अन्न खाने का नियम  रखना चाहिए। तभी बालक  शुद्ध  स्वभाव  वाला  होगा।  ब्राह्मण  ने सन्यासी को प्रणाम किया और फल लेकर घर  को चला  गया। उसने सारा वृतांत अपनी पत्नी को सुनाकर कहा  कि  वो  इस फल को खाकर विधि पूर्वक व्रत का पालन करे। उसकी स्त्री ने उसे तो हां बोल दी परंतु स्वयं सोच में पड़ गई कि  इस  कठिन कार्य को वो कैसे करे। उसने निश्चय  किया  कि  वो  ऐसा  नहीं करेगी। उसने झूठ ही अपने पति को कह दिया कि उसने  फल खा लिया है। उसी दिन उसकी बहन मिलने के  लिए  आ  गई। उस स्त्री ने अपनी बहन को सारी बात बताई। बहन ने कहा कि मेरे भी बच्चा होने वाला है। सही समय  आने  पर  मैं  तुम्हें  वो बच्चा दे दूंगी। इस तरह तुम्हें कोई कष्ट भी  नहीं  उठाना पड़ेगा और मेरा बच्चा भी  तुम्हारे  घर  में  अच्छी  तरह  पल  जाएगा क्योंकि मेरे तो पहले भी बच्चे हैं और धन का भी बहुत अभाव है। यह विचार ब्राह्मण की स्त्री को अच्छा लगा। उसने वह फल अपनी गाए को खिला दिया। समय आने पर  उसकी  बहन  ने उसे अपना नव जन्मा बालक दे दिया। उसने अपने  पति  और लोगों को यही बताया कि बालक उसका अपना ही है। उसका नाम भी उसने अपने नाम पर ही धुंधुकारी रक्खा।
     जिस गाए को फल खिला दिया था उसके भी मानव  जैसा ही बालक उत्पन्न हो गया। उसके कान गाए जैसे थे परंतु बाकी आकार मनुष्य जैसा ही था। वह सर्वांग सुंदर, दिव्य, निर्मल एवं सुवर्ण सी कांति  वाला  था।  ब्राह्मण  ने  उसका  नाम  गोकर्ण रक्खा। कुछ काल बीत जाने के बाद गोकर्ण तो बड़ा ही  ज्ञानी और पंडित हुआ। परंतु धुंधुकारी  बड़ा  ही  दुष्ट  निकला।  वह बालकों को कुएं में डाल देता,  हिंसा  करता,  लोगों  को  बहुत तंग करता, शिकार खेलता और  बुरी  संगत  में  जाकर  प्रसन्न रहता था। थोड़े ही समय में उसने अपने पिता की सारी संपत्ति नष्ट कर दी। उसने अपने माता पिता को भी  पीटना  शुरू  कर दिया। तब जाकर उस ब्राह्मण ने कहना शुरू किया  की  इससे तो ना ही होता तो अच्छा था। गोकर्ण ने अपने पिता  को  ज्ञान देकर वन में भेज दिया। वहां पर साधुओं को सेवा  और  दशम स्कंध का नित्य पाठ करके वह ब्राह्मण श्रीकृष्ण जी  को  प्राप्त हो गया।
     धुंधुकारी अपनी माता को भी पीटता था।  एक  दिन उसने अपनी माता को धमकी दी कि वो उसको  जलती  हुई  लकड़ी से पीटेगा। इस बात से डर कर रात्रि के समय वह  कुएं में गिर गई और उसकी मृत्यु हो गई।  गोकर्ण  जी तो  तीरथ  यात्रा  के लिए निकल गए और धुंधुकारी पांच  वैश्याओं को साथ  लेकर घर में रहने लगा। वह चोरियां करने लगा।  एक दिन वह उनके लिए बहुत से गहने चुरा लाया।  स्त्रियों ने विचार किया कि यह तो और भी चोरियां करेगा और इसे चोरी के कारण  राजा  के सेवक पकड़ लेंगे। यह हमें भी  पिटवाएगा।  उन्होंने उसे  सोते हुए को ही रस्सियों से बांध दिया और उसे जान से  मारने  का प्रयत्न किया। जब वह नहीं मरा तो  उन्होंने अंगारे  उसके  मुंह पर डाले। तड़प तड़प कर उसके प्राण निकल गए।  वो  उसके शरीर को गड्डे में डाल कर और सारी  संपत्ति  लेकर भाग  गईं। वह अपने कुकर्मों के  कारण  एक  भयंकर प्रेत बन  गया। वह बवंडर के रूप में दशो दिशाओं में भटकता रहता था।  गोकर्ण को उसकी मौत का पता चल  गया  था।  उसने  उसका  श्राद्ध, तर्पण पिंडदान आदि सब कुछ  करवा  दिया था।  गया  जी  में जाकर भी उसका श्राद्ध करवा दिया। परंतु जब गोकर्ण वापिस गांव आया तो गांव वालों ने उसे बताया कि  उसकी आत्मा  तो अभी भी भटक रही है। गोकर्ण बड़ी सोच में  पड़ गए कि  सारे उपाय करने पर भी  उसकी मुक्ति क्यों नहीं हुई। गोकर्ण ने सूर्य देव की तपस्या की। तब आकाशवाणी हुई  कि," श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह विधि पूर्वक करवाने से ही इसकी मुक्ति संभव हो सकती है।"गोकर्ण जी ने कथा  सुनाई।  बहुत  लोगों  ने  सुनी। प्रेत सात गांठ के एक बांस में घुस  कर बैठ  गया।  पहले  दिन की कथा से एक गांठ तड़ तड़ कर के टूट गई।  इसी तरह सात दिनों में सात गांठें टूट गईं। सातवें दिन दिव्य रूप धारण करके वह अपने लिए आए हुए  दिव्य विमान में बैठ कर  भगवान  के गो लोक  को चला गया।  इसका अर्थ  है कि भागवत सुनने से चित्त की गांठें खुल जाती हैं।  गोकर्ण ने भगवान  से  पूछा  कि बाकी लोगों ने भी कथा सुनी थी परंतु उनका उद्धार  क्यों  नहीं हुआ। भगवान ने कहा कि अगर कथा  का  श्रवण, मनन  और भजन शुद्ध हृदय से किया जाए तभी मनुष्य का  उद्धार  संभव होता है। फिर से कथा की गई। इस बार सब ने  बड़ी  ही श्रद्धा से सारी कथा सुनी। अब की बार सभी का उद्धार हो गया और सभी दिव्य विमानों से भगवान के गोलोक में पहुंच गए।
                        जय श्री कृष्ण जी की