सती जी का दक्ष के यज्ञ में जाना
दीर्घ काल के पश्चात जब भगवान शिव की समाधि खुली तो वो सती जी को राम जी की नित्य नई नई कथाएं सुनाने लगे। एक दिन सती जी को पता चला कि उनके पिता दक्ष ने एक यज्ञ का अनुष्ठान किया है। सती जी का मन किया कि पुत्री होने के नाते पिता के घर अनुष्ठान में वो भी सम्मिलित हों। इस बात का आग्रह उन्होंनेे भगवान शिवजी से किया। परंतु तब शिवजी उनकी इस बात से इस लिए सहमत नहीं हुए क्योंकि दक्ष ने उनको बुलावा नहीं भेजा था। बेशक पिता के घर बिना बुलावे के भी जाना गलत नहीं है, परंतु जब आपस में कटुता आ गई हो तो इस बात का विचार कर लेना ही उचित है। इतना कह कर शिव मौन हो गए।
जब सती जी ने देखा कि शिवजी नहीं मानेंगे तो उन्होंने अकेले ही जाने का निर्णय कर लिया। सती जी अकेली ही चल पड़ीं। उनको अकेली जाते देख कर, मद एवं मनिमाद आदि हजारों सेवक व्रशभराज को आगे कर और अनेकों पार्षद और यक्षों को साथ ले निर्भयता पूर्वक उनके पीछे हो लिए। माता सती को बैल पर सवार करा दिया। श्वेत छत्र, चंवर और माला आदि राज चिन्ह साथ लिए तथा दुंदभी शंख और बांसुरी आदि से सुसज्जित हो उनके साथ चल दिए।
सती जी का अपने आप को योगाग्नि में भस्म करना
माता सती को भ्रम था कि दक्ष उनके पिता होने के नाते उनका आदर सत्कार अवश्य करेंगे। परंतु जब वो दक्ष के यहां पहुंचे तो किसी ने भी उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। केवल एक माता ने ही उनसे आगे आ कर बात की। यज्ञ भूमि में पहुंचीं तो देखा कि यज्ञ में शिवजी का भाग भी नहीं निकाला गया। और ना ही उनके लिए कोई स्थान ही रक्खा गया था। उल्टा दक्ष ने उनको बातों ही बातों में बहुत अपमानित भी किया।
जब माता सती ने देखा कि यहां पर तो भगवान शिव का इतना अपमान हो रहा है, तो उन्होंने उसी समय योगाग्नि प्रकट की और उसी यज्ञशाला में अपने आप को भस्म कर दिया।
साथ गए पार्षदों ने जब यह सब देखा तो उन्होंने आक्रमण कर दिया। उधर भृगु ने रिभु नाम के हजारों देवता पैदा करके वहां से सारे शिव गणों को भगा दिया।
वीरभद्र द्वारा दक्ष का वध
उधर जब भगवान शिव को इस बात का पता चला तो क्रोध में उन्होंने अपनी जटाओं से वीर भद्र को पैदा किया और दक्ष के समूल विनाश का आदेश देकर उसे वहां भेज दिया। वीरभद्र ने भृगु की दाढ़ी और मूंछ नोच लीं, क्योंकि जब शिव भगवान को प्रजापतियों की सभा में शाप दिया गया था, तब उसने ही मूंछें ऐंठते हुए शिवजी का उपहास किया था। भग देवता की आंखें निकाल लीं। दक्ष की गर्दन काट दी। सब को यथा योग्य सज़ा दी।
ब्रह्मा जी और देवताओं द्वारा शिव स्तुति
यज्ञ संपूर्ण नहीं हुआ। सभी डरे और सहमे हुए थे। सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि आप ही इस समय कष्ट का निवारण कर सकते हैं, क्योंकि और कोई भी इस प्रकार के हालात में भगवान शिवजी के सामने जाने की हिम्मत नहीं कर सकता। सभी देवताओं के साथ ब्रह्मा जी शिवजी के पास गए। भगवान शिव की स्तुति की और प्रार्थना की कि जन कल्याण के लिए यज्ञ का सम्पूर्ण होना बहुत ही आवश्यक है। यदि आप कृपा करके दक्ष को जीवित कर दें तो यह कार्य संपूर्ण हो जाएगा। उन्होंने भृगु और भग देवता के लिए भी प्रार्थना की। और कहा कि हे महादेव यज्ञ संपूर्ण हो जाने पर जो भाग बचा रहेगा वो भी आप का ही होगा।
शिव कृपा से दक्ष को जीवन दान और यज्ञ संपूर्ण
इस प्रकार ब्रह्मा जी समेत सभी देवताओं द्वारा भगवान शिवजी की स्तुति से भगवान प्रसन्न हुए और कहा कि दक्ष का सर जल गया है इस लिए उसे बकरे का सर लगा दिया जाए। भग देवता, मित्र देवता की आंखों से अपना भाग देखे। पूषा, पिसा हुआ अन्न ग्रहण करने वाले हैं, इस लिए वो यजमान के दांतों से भक्षण करे। बाकी देताओं के अंग स्वस्थ हो जावें। भृगु के बकरे की सी दाढ़ी मूंछ हो जावे।
शिवजी भगवान ने जैसा कहा वैसा हो गया। तब दक्ष ने शिवजी भगवान की स्तुति की और क्षमा याचना भी की। उसी समय श्री हरी विष्णु प्रकट हुए और उन्होने सब को समझाया कि मैं ही ब्रह्मा हूँ और मैं ही शिव भी हूँ। अज्ञानी लोग ही हमें भिन्न भिन्न देखते हैं। वास्तव में हम तीनों एक ही हैं।
पार्वती जी का जन्म
उधर सती जी ने शरीर त्यागते समय भगवान से जन्म जन्म तक शिवजी भग्वान् का ही साथ मांगा था। इस लिए उन्होंने अगले जन्म में पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती जी के रूप में जन्म लिया। अगले लेख में हम शिव पार्वती जी की कथा के बारे में पढ़ेंगे।
क्रमशः
दीर्घ काल के पश्चात जब भगवान शिव की समाधि खुली तो वो सती जी को राम जी की नित्य नई नई कथाएं सुनाने लगे। एक दिन सती जी को पता चला कि उनके पिता दक्ष ने एक यज्ञ का अनुष्ठान किया है। सती जी का मन किया कि पुत्री होने के नाते पिता के घर अनुष्ठान में वो भी सम्मिलित हों। इस बात का आग्रह उन्होंनेे भगवान शिवजी से किया। परंतु तब शिवजी उनकी इस बात से इस लिए सहमत नहीं हुए क्योंकि दक्ष ने उनको बुलावा नहीं भेजा था। बेशक पिता के घर बिना बुलावे के भी जाना गलत नहीं है, परंतु जब आपस में कटुता आ गई हो तो इस बात का विचार कर लेना ही उचित है। इतना कह कर शिव मौन हो गए।
जब सती जी ने देखा कि शिवजी नहीं मानेंगे तो उन्होंने अकेले ही जाने का निर्णय कर लिया। सती जी अकेली ही चल पड़ीं। उनको अकेली जाते देख कर, मद एवं मनिमाद आदि हजारों सेवक व्रशभराज को आगे कर और अनेकों पार्षद और यक्षों को साथ ले निर्भयता पूर्वक उनके पीछे हो लिए। माता सती को बैल पर सवार करा दिया। श्वेत छत्र, चंवर और माला आदि राज चिन्ह साथ लिए तथा दुंदभी शंख और बांसुरी आदि से सुसज्जित हो उनके साथ चल दिए।
सती जी का अपने आप को योगाग्नि में भस्म करना
माता सती को भ्रम था कि दक्ष उनके पिता होने के नाते उनका आदर सत्कार अवश्य करेंगे। परंतु जब वो दक्ष के यहां पहुंचे तो किसी ने भी उनकी ओर ध्यान नहीं दिया। केवल एक माता ने ही उनसे आगे आ कर बात की। यज्ञ भूमि में पहुंचीं तो देखा कि यज्ञ में शिवजी का भाग भी नहीं निकाला गया। और ना ही उनके लिए कोई स्थान ही रक्खा गया था। उल्टा दक्ष ने उनको बातों ही बातों में बहुत अपमानित भी किया।
जब माता सती ने देखा कि यहां पर तो भगवान शिव का इतना अपमान हो रहा है, तो उन्होंने उसी समय योगाग्नि प्रकट की और उसी यज्ञशाला में अपने आप को भस्म कर दिया।
साथ गए पार्षदों ने जब यह सब देखा तो उन्होंने आक्रमण कर दिया। उधर भृगु ने रिभु नाम के हजारों देवता पैदा करके वहां से सारे शिव गणों को भगा दिया।
वीरभद्र द्वारा दक्ष का वध
उधर जब भगवान शिव को इस बात का पता चला तो क्रोध में उन्होंने अपनी जटाओं से वीर भद्र को पैदा किया और दक्ष के समूल विनाश का आदेश देकर उसे वहां भेज दिया। वीरभद्र ने भृगु की दाढ़ी और मूंछ नोच लीं, क्योंकि जब शिव भगवान को प्रजापतियों की सभा में शाप दिया गया था, तब उसने ही मूंछें ऐंठते हुए शिवजी का उपहास किया था। भग देवता की आंखें निकाल लीं। दक्ष की गर्दन काट दी। सब को यथा योग्य सज़ा दी।
ब्रह्मा जी और देवताओं द्वारा शिव स्तुति
यज्ञ संपूर्ण नहीं हुआ। सभी डरे और सहमे हुए थे। सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि आप ही इस समय कष्ट का निवारण कर सकते हैं, क्योंकि और कोई भी इस प्रकार के हालात में भगवान शिवजी के सामने जाने की हिम्मत नहीं कर सकता। सभी देवताओं के साथ ब्रह्मा जी शिवजी के पास गए। भगवान शिव की स्तुति की और प्रार्थना की कि जन कल्याण के लिए यज्ञ का सम्पूर्ण होना बहुत ही आवश्यक है। यदि आप कृपा करके दक्ष को जीवित कर दें तो यह कार्य संपूर्ण हो जाएगा। उन्होंने भृगु और भग देवता के लिए भी प्रार्थना की। और कहा कि हे महादेव यज्ञ संपूर्ण हो जाने पर जो भाग बचा रहेगा वो भी आप का ही होगा।
शिव कृपा से दक्ष को जीवन दान और यज्ञ संपूर्ण
इस प्रकार ब्रह्मा जी समेत सभी देवताओं द्वारा भगवान शिवजी की स्तुति से भगवान प्रसन्न हुए और कहा कि दक्ष का सर जल गया है इस लिए उसे बकरे का सर लगा दिया जाए। भग देवता, मित्र देवता की आंखों से अपना भाग देखे। पूषा, पिसा हुआ अन्न ग्रहण करने वाले हैं, इस लिए वो यजमान के दांतों से भक्षण करे। बाकी देताओं के अंग स्वस्थ हो जावें। भृगु के बकरे की सी दाढ़ी मूंछ हो जावे।
शिवजी भगवान ने जैसा कहा वैसा हो गया। तब दक्ष ने शिवजी भगवान की स्तुति की और क्षमा याचना भी की। उसी समय श्री हरी विष्णु प्रकट हुए और उन्होने सब को समझाया कि मैं ही ब्रह्मा हूँ और मैं ही शिव भी हूँ। अज्ञानी लोग ही हमें भिन्न भिन्न देखते हैं। वास्तव में हम तीनों एक ही हैं।
पार्वती जी का जन्म
उधर सती जी ने शरीर त्यागते समय भगवान से जन्म जन्म तक शिवजी भग्वान् का ही साथ मांगा था। इस लिए उन्होंने अगले जन्म में पर्वतराज हिमालय के घर पार्वती जी के रूप में जन्म लिया। अगले लेख में हम शिव पार्वती जी की कथा के बारे में पढ़ेंगे।
क्रमशः
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