शनिवार, 30 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या-16(मैं कौन हूं, राजा पुरांजन की प्राचीन कथा)

       पिछले लेख में आप ने पढ़ा था कि ध्रुव जी के बाद उनके वंश में कौन  कौन से राजा हुए। भगवान पृथु जी के बारे में भी पढ़ा और  लेख के अंत में  आप  राजा बहीर्शद (प्राचीन बर्हि) को  नारद  जी द्वारा दिए  उपदेश  के बारे में पढ़ रहे थे।  राजा प्राचीन बर्हि  ने  अपने जीवनकाल में अनेक यज्ञ किए। नारद जी ने एक  दिन  प्रकट होकर  राजा को  उपदेश दिया कि " हे राजन  आप  केवल   कर्म  ( यज्ञ आदि )  कर  रहे  हो।  और परमानन्द केवल कर्मों से नहीं मिलता। यज्ञों में जो तुम पशुओं की बलि देते हो, वो तुम से बदला लेने की फ़िराक में हैं।"
       राजा ने  कहा," हे ऋषिवर  मेरी बुद्धि  तो केवल कर्मों में बंधी हुई है। मुझे परम कल्याण का कुछ भी ज्ञान नहीं है। अब आप ही कृपा करके मुझे परमानन्द प्राप्ति का साधन बता कर कृतार्थ करें।"
       नारद जी कहते हैं," अच्छा अब मैं तुम्हें जीव,  परमात्मा, कर्म,  यज्ञ,  बली  और  परमानन्द आदि के बारे में एक प्राचीन उपाख्यान  सुनाता हूँ, जो राजा  पुरञ्जन  का  चरित्र  है।  तुम सावधान होकर सुनो।"
               पुरंजनोपाख्यन् ( पुरंजन की कथा )
       पूर्व  काल में पुरांजन्  और  उसका मित्र अविज्ञात  इकट्ठे रहते थे। वे  दोनों  चिर काल तक  बड़े  सुख पूर्वक  रह रहे थे।
पूरंजन् के मन में अचानक भोग भोगने की इच्छा हुई। मित्र के रोकने पर भी वह नहीं माना और ऐसी पुरी(नगर) की खोज में निकल पड़ा  जिस में  वह  संपूर्ण भोगों को, जी भर कर  भोग सके। वह  नगर नगर घूमा।  अंत में उसे एक ऐसा प्रदेश मिला जहां उसे  लगा कि  उस स्थान पर  वह इच्छा अनुसार जितना चाहे भिन्न भिन्न भोगों का भोग कर सकता है। उस नगर के नौ दरवाजे थे। यह नगर नागो की राजधानी  भोगपुरी  के  समान जान पड़ता था जो कि बहुत ही सुंदर और कुदरत का खजाना था। जैसे ही नगर की ओर राजा ने कदम बढ़ाया वहां पर उसने एक सुंदरी को देखा। उसके दस सेवक और एक प्रधान सेवक था जो कि महाबली था। एक पांच मुख  वाला  नाग  भी  नगर की रक्षा करता था। राजा ने उस सुंदरी से पूछा कि वह कौन है और यह भी बताया कि वह उस पर  मोहित  हो  गया  है। उस स्त्री ने उत्तर दिया कि  वह  स्वयं  नहीं  जानती  कि  वह  कौन है,किसने उसे उत्पन्न किया है और यह पुरी किसने बनवाई है।
उसने यह भी कहा कि जब वह सो जाती है तब भी  यह  पांच मुख वाला नाग उसकी रक्षा करता है। यह भी कहा कि वह भी उस नौजवान पर मोहित है और वे दोनों एक साथ  उस  नगरी में चिर काल तक इकट्ठे निवास कर सकते हैं। उसने आगे कहा कि," आप को विषय भोगों की इच्छा है और मैं अपने साथियों के साथ सभी  प्रकार  के  भोग  प्रस्तुत करती रहूंगी। आप नौ द्वारों वाली  इस  पुरी  में  प्रस्तुत  किए  हुए  इच्छित भोगों को भोगते हुए सेंकड़ों वर्षों तक निवास कीजिए। इसके इलावा दो अंधे  नागरिक  हैं  जो  बाहर  जाने  आने और  कार्य  करने में आपकी सहायता करेंगे। जब आप अंत:पुर में होंगे तो मैं और हमारी होने वाली संतानें आपको प्रसन्नता एवं हर्ष देंगे।"
       राजा ने  उस सुंदरी की बात मानकर  उसी पुरि में  रहना आरंभ कर दिया।  भोग  विलास  पूर्ण  जीवन  जीते हुए जैसा जैसा रानी कहती वैसा वैसा ही राजा करता। उन्हीं नौ द्वारों से राजा  बाहर  जाता और वापिस अंत:पुर में आ जाता। अपनी स्त्री और संतानों में उसका मन पूरी तरह रम् गया।
       उधर उसकी नगरी पर गंधर्व राज चंडवेग ने अपनी बहन काल कन्या,  भाई प्रज्वार,  पैदल  सैनिकों,  360 सेवक और 360 सेविकाओं के साथ  पुरी  को  समाप्त करने के लिए बार बार आक्रमण  करने शुरू  कर दिए।  प्रति  दिन पुरी का पतन होना शुरू हो गया। आखिर एक दिन  आक्रमणकारियों ने बूढ़े सांप से सुरक्षित पुरी  को चारों ओर से घेर लिया। काल कन्या बलात् उस पुरी  की  प्रजा  को  भोगने लगी।  राजा पीड़ा और चिंता में डूब  गया। उस समय ' मैं और मेरे पन'  का भाव बड़ा ही तीव्र था।  आक्रमणकारियों  ने  पुरी  को चारों ओर से आग लगा दी।  उसी  समय  उसकी  रक्षा करने  वाला सांप भी उसे छोड़ कर भाग गया। राजा को उस समय भी स्त्री की याद बनी हुई थी। इस प्रकार राजा की मृत्यु हो गई। कोई पुण्य ना किया होने के कारण नरक में जाना पड़ा। तत्पश्चात उसे विधर्भ राज की कन्या के  रूप में स्त्री शरीर  मिला।  बड़ी  होने पर उसका विवाह महाराज मलय ध्वज  के साथ हुआ।  संतान प्राप्ति भी हुई। इस जन्म में उसने भगवान  की  अराधना की। जब मलय ध्वज अपनी संतान को  राज्य सौंप कर तपस्या के लिए वन में गए तो वह भी उनके  साथ ही  गईं।  जब मलय ध्वज की मृत्यु हुई तो उसने भी सती होने की सोची।उस समय उसने ईश्वर को याद  किया। उसी  समय एक आत्म् ज्ञानी  ब्राह्मण वहां आया और उसने उस स्त्री को कहा कि 'मैं तेरा पुराना मित्र आविज्ञात हूं। तुम  पृथ्वी के भोग भोगने के लिए  निवास स्थान की खोज में मुझे  छोड़  कर चले गए थे। हम  एक  दूसरे  के मित्र मानस निवासी हंस थे।हम सहस्र वर्षों तक बिना निवास स्थान के ही रह रहे थे।संसार में आकर तुम अपने स्वरुप को भूल गए।'
       तुम अपने आप को ना तो स्त्री समझो और ना पुरुष। मैं ईश्वर हूं और तुम जीव हो। अपने आप को मुझ से अलग मत समझो। इस तरह आत्म ज्ञान प्राप्त कर पुरञ्जन् भी हंस बन कर अपने स्वरुप में स्थित हुआ।
                   पुरंजनोपाख्यान का तात्पर्य
       नारद  जी  कहते  हैं कि  जीव सबसे बड़े सुख, नित्यानंद परमात्मा  के पास  ही  रहता  है।  परंतु  जब  माया के प्रभाव से उसे भोग  भोगने  की इच्छा होती है और वो समझता है कि सुख केवल शरीर प्राप्त करने से ही मिलता है तो वह शरीर की तालाश करने के लिए निकलता है। शरीर धारण करने के बाद वह भूल जाता है कि सभी सुखों का जनक केवल ईश्वर ही है। माया के प्रभाव में पड़ कर भोग विलासों में डूबा रहता है। और फिर अपने द्वारा किए गए अच्छे  और बुरे कर्मों के कारण बार बार जन्म लेता और  शरीर छोड़ता रहता है अर्थात आवागमन के चक्कर  में पड़ा  रहता  है। इस  कुचक्र से निकलने के लिए केवल ईश्वर की आराधना ही एक मात्र उपाय है।
       राजा पुरञ्जन् की कहानी में भी यही बताया गया है। इस कहानी में  अविज्ञात  ईश्वर को कहा गया है। पुरांजान जीव है। पुरी (नगर), पिंड  अर्थात  शरीर को कहा गया है। सुंदरी, बुद्धि या अविद्या को कहा है।  इसी से 'मैं और मेरे पन' का अहसास होता है। 10 सेवक,  इन्द्रियों ( पांच ज्ञान इन्द्रियां - कान,नाक, जिह्वा, नेत्र और त्वचा एवं पांच कर्म इन्द्रियां - मुख, हाथ, पैर, गुदा और जननेन्द्रिय) को कहा गया है। रक्षा करने वाला पांच फन वाला नाग, प्राणवायु (पञ्च प्राण) को कहा गया है। प्राण पांच प्रकार के हैं -
1. प्राण - यह नाक के अगले भाग में रहता है, सामने से आता है।  2. अपान - गुदा आदि  स्थानों  में  रहता  है। यह नीचे को जाता है। 3. व्यान - संपूर्ण  शरीर  में रहता है। सब ओर जाता है। 4. उदान - गले में रहता है। ऊपर की ओर जाता है।
5. समान - भोजन को पचाता है।
ग्यारवें सेवक के रूप में ' मन ' को कहा गया है।
नगरी या पुरी के 9 द्वार हैं - दो आंखें, दो कान, दो नासिका छिद्र, मुख, गुदा और जननेन्द्रिय।
अंधे नागरिक जो राजा की सहायता करते है वो हैं हाथ और पैर।
         इस  प्रकार राजा (जीव),  सुंदरी (बुद्धि या अविद्या)  के अधीन हुआ, प्रधान सेवक (मन) और दस सेवक (इन्द्रिओं) के वश  में होकर  संतान (विकारों) को  जन्म देता है। और सारी आयु  उन्हीं के साथ खेलता रहता है। इस तरह हर्ष, दुःख,सुख आदि में जीवन व्यतीत करता है  और अनेक जन्मों तक  इसी चक्र में पड़ा रहता है।
गंधर्व राज चंड वेग,  मृत्यु रूप काल चक्र को ;  काल कन्या, वृद्धावस्था  को ;   प्रज्जवर, शीत  एवं  उष्ण ज्वर को;  पैदल सैनिक,  आधि (मानसिक रोग)  और  व्याधि (शारीरिक रोग) को; 360 सेवक, साल के दिनों और 360 सेविकाएं, साल की रात्रियों को कहा गया है। चंद्र वर्ष में 360 दिन होते हैं। इसी लिए चंद्र वर्ष में अधिक मास भी आता है।
       जैसे ही जीव शरीर धारण करता है, उसी दिन से ही मृत्यु रूप काल चक्र का कार्य भी शुरू हो जाता है। काल के रूप में दिन  और  रात्रियां  निकलती जाती हैं। शरीरक और मानसिक रोग  उसे  वृद्धावस्था और  मृत्यु की ओर ले जाना  आरंभ कर देते हैं  परंतु  जीव माया के जाल में  फंसे होने  के  कारण इस चक्र को  समझ  नहीं  पाता है  और  अपने  असली घर  और परमात्मा को भूला रहता है। बार बार इसी जन्म मरण के चक्र में घूमता रहत है।
        इस  प्रकार  नारद  जी ने  राजा बरहिषद को बताया कि केवल  कर्मों के द्वारा  तुम शांति,  परमपद या मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते।  व्यक्ति की  मृत्यु कभी भी हो सकती है। इस लिए उसे  समय रहते  अंतर्मुखी  हो जाना चाहिए।  यह स्थूल शरीर लिंग शरीर के आधीन है।
       लिङ्ग शरीर  का  अर्थ :-  पांच  तनमत्राओं  (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध) से बना और मन, बुद्धि, पांच ज्ञान इंद्रियों, पांच  कर्म इंद्रियों  एवं  पांच प्राण से विकसित यह त्रिगुणमय संघात ही लिङ्ग  शरीर है।
       लिङ्ग शरीर ही - शोक,  दुःख,  सुख आदि अनुभव करता है। मृत्यु  के बाद जब तक  दूसरा  स्थूल शरीर नहीं मिल जाता तब तक  इसका संबंध पिछले शरीर की यादों से बना रहता है। इस लिए तुम कर्मों का त्याग करो और अंतर्मुख होकर भगवान की  आराधना  करो।  इस  उपदेश  को  सुनते ही प्राचीन बर्हि  (बारहिशद) को समझ में आ गया कि ' मैं कौन हूँ '। वह सभी प्रकार के सांसारिक साधनों का परित्याग करके तपस्या करने कपिल आश्रम चले गए।
                          जय श्रीकृष्ण जी की
     
     



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