शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण, लेख संख्या 2 - (गोकर्ण की कथा एवं भक्ति की महिमा)

 श्रीमद्भागवत कथा के गुण:-    एक बार नैमिशरण्य तीर्थ  में शौनक आदि अठासी हज़ार ऋषियों को कथा सुनाते  हुए  सूत जी ने श्रीमद्भागवत महापुराण के  गुणों  का  वर्णन  किया था। उन्होंने बताया कि यह ग्रंथ संपूर्ण सिद्धांतों का  निष्कर्ष है, यह जन्म और मृत्यु के भय का नाश करता  है, वैराग्य  और  त्याग प्रदान करके भक्ति और प्रेम के प्रवाह को बढ़ाता है और स्वयं भगवान की प्रसन्नता का प्रधान कारण है। कलयुग में जीवों के दुखों का नाश करने, मन  को  शांति देने और  तीनों  तापों  को नष्ट करने का साधन है। यह मनुष्यों के लिए ऐसा अमृत  तुल्य वरदान है जो देवताओं के लिए भी  दुर्लभ  है।  स्वयं ब्रह्मा  जी और ऋषियों मुनियों ने भी इस ग्रंथ की सराहना  की  है।  जीव के जन्म जन्मांतर के पुण्य उदय होने पर ही उसे इस  कथा को श्रवण करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
सनक आदि ऋषियों की नारद जी से भेंट :-  यद्यपि  नारद जी ने भागवत कथा अपने पिता ब्रह्मा जी से सुनी हुई थी  फिर भी कथा की सप्ताह विधि उन्होंने सनक आदि ऋषियों  से  ही श्रवण की थी। एक बार नारद जी विशाल पुरी में  गए थे।  वहां उनकी भेंट सनक आदि ऋषियों से हो गई। ऋषियों द्वारा नारद जी से उनकी उदासी का कारण पूछने पर  नारद  जी  ने  उत्तर देते हुए कहा:-
  कलयुगी जीवो में असंतोष व्याप्त है:-   "मैं सर्वोत्तम लोक समझ कर पृथ्वी लोक पर आया था। तथा यहां पुष्कर, प्रयाग, काशी, गोदावरी, हरिद्वार, कुरुक्षेत्र, श्रीरंग और  सेतुबंध  आदि कई तीर्थों में मैं इधर उधर विचरता रहा।  किन्तु  मुझे  कहीं भी मन को सन्तोष देने वाली शांति नहीं मिली।  इस  समय अधर्म के सहायक कलयुग ने सारी पृथ्वी को पीड़ित  कर  रक्खा  है। अब यहां सत्य, तप, शौच, दया, दान आदि कुछ  भी  नहीं  है। बेचारे जीव केवल अपना पेट पालने में लगे हुए  हैं।  वे असत्य भाषी आलसी, मंद बुद्धि,भाग्य हीन एवं  उपद्रव  ग्रस्त  हो  गए हैं। जो देखने में विरक्त प्रतीत होते हैं वे वास्तव में ऐसे नहीं  हैं।
  भक्ति की दशा दयनीय है:-     यमुना तट पर जहां श्रीकृष्ण जी की अनेकों लीलाएं हो चुकी हैं, वहां पर मैंने देखा कि  एक युवती स्त्री खिन्न मन से बैठी हुई थी। उसके पास दो वृद्ध पुरुष अचेत अवस्था में पड़े ज़ोर ज़ोर से सांस ले रहे थे। वह स्त्री उन पुरुषों की सेवा करती हुई कभी उन्हें होश में  लाने  का  प्रयास करती तो कभी रोने लगती थी। चारों ओर  सैकड़ों  स्त्रियां उन्हें पंखा कर रही थीं। जब मैने पूछा कि देवी तुम कौन हो तो  उस स्त्री ने कहा कि," मैं भक्ति हूँ। यह दोनों  मेरे  पुत्र हैं  ज्ञान  और वैराग्य। यह जो स्त्रियां मुझे पंखा कर  रही  हैं  यह  गंगा  आदि नदियां हैं। यह सब मेरी सेवा के लिए आई हैं। परंतु मुझे  शांति नहीं मिल रही है। जब से मैं वृंदावन में आई  हूं  तब  से  मैं  तो परम सुंदरी नवयुवती हो गई हूं परन्तु यह  मेरे  दोनों  पुत्र अभी भी थके मांदे दुःखी हो रहे हैं।" तब मैने कहा हे  देवी  श्री  हरि  तुम्हारा कल्याण करेंगे। हे देवी, कलयुग के कारण  योग  मार्ग, सदाचार आदि का स्थान शठता और  दुष्कर्म  ने  ले  लिया  है। लोग कुकर्मी हो गए हैं। इन्हीं कारणों से इनकी यह स्थिति बनी हुई है। अन्यथा हे भक्ति तुम तो भगवान की  बहुत  प्यारी  हो। तुम्हारे बुलाने पर तो भगवान कहीं भी प्रकट हो जाते  हैं।  तीन युगों में ज्ञान और वैराग्य ही मुक्ति के साधन थे परंतु कलयुग में तो केवल भक्ति ही मोक्ष प्राप्त करवाने वाली है। तुम  चिंता  ना करो मैं कोई उपाय सोचता हूँ। कलयुग में जो लोग तुम से युक्त होंगे वे पापी होने पर भी बे खटके भगवान श्रीकृष्ण के  अभय धाम को प्राप्त होंगे। जो भक्ति युक्त हो जाता  है  उसका  अंत: करण शुद्ध हो जाता है।  उसे  कोई प्रेत, पिशाच, राक्षस  कभी स्पर्श भी नहीं करते। उसी समय भक्ति  के  सारे  अंग  पुष्ट  हो गए। भक्ति ने कहा," हे ऋषि  वर  आपने  जैसे  मुझे  पुष्ट  कर दिया है उसी तरह मेरे पुत्रों को भी कीजिए।"
 नारद जी द्वारा भक्ति के कष्ट निवारण का उद्योग :   नारद जी ने ऋषियों को बताया," तब मैंने भगवान को स्मरण किया। उसी समय आकाशवाणी  हुई। " मुने, खेद  मत  करो,  तुम्हारा यह उद्योग नि:संदेह सफल होगा। तुम  एक  सत्कर्म  करो।  वो सत्कर्म तुम्हें संत शिरोमणि महानुभाव बताएंगे।  उस  अनुष्ठान के करते ही क्षण भर में इनकी  नींद  और  वृद्ध  अवस्था  चली जाएगी और सर्वत्र भक्ति का प्रसार होगा।" वो संत  कौन  होंगे उनको ढूंढते ढूंढते मैं थक गया परंतु  किसी  निष्कर्ष  पर  नहीं पहुंच सका। तब मैंने तप करने  की  बात  सोची  और  विशाल पुरी में आ गया। यहां पर  आप  के  दर्शन  करके  में  धन्य  हो गया। अब कृपा करके आप ही इसका कोई उचित उपाय  बता कर इस कष्ट का निवारण कीजिए।"
 सनक आदि ऋषियों द्वारा उपाय बताना :-   नारद जी की बात सुन कर सनक आदि ऋषियों ने नारद  जी  को  कहा," हे नारद जी आपने सभी के हित की बात पूछी  है।  सुनिए,  द्रव्य यज्ञ, तपो यज्ञ, योग यज्ञ और स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ यह  सब तो स्वर्ग की प्राप्ति करने वाले कर्म की ओर ही संकेत करते हैं। विद्वानों ने  ज्ञान  यज्ञ  को  ही  सत्कर्म (मुक्ति दायक कर्म) का सूचक माना है। वह श्रीमद्भागवत का पारायण है जिसका गान शुक आदि महानुभावों ने किया है।  उसके  शब्द  सुनने  से  ही भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को बड़ा बल  मिलेगा।  इसके  इलावा कलयुग के सारे दोष नष्ट हो जाएंगे। तब भक्ति अपने  पुत्रों  के साथ प्रत्येक घर एवं व्यक्ति के हृदय में क्रीड़ा करेगी। यह कथा सभी ग्रंथों का सार (फल) है।" नारद जी ने कहा  कि " मैं  प्रेम लक्षणा भक्ति का प्रकाश करने  के  उद्देश्य  से  आपकी  शरण लेता हूँ।" सनक आदि ऋषियों ने कहा कि  हरिद्वार  के  आनंद घाट पर कथा होगी। इस  प्रकार  कहकर  नारद  जी  के  साथ सनक आदि भी श्रीमद्भागवत कथा का अमृत पान करने  गंगा तट चले आए। सनक आदि ऋषि  नारद जी द्वारा दिए हुए श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हुए। श्रोताओं में नारद जी  सबसे  आगे बैठे। एक तरफ देवता और  दूसरी  तरफ  ऋषिगण।  विधिवत पूजा होने के उपरांत सनक आदि  श्रीमद्भागवत  का  माहात्म्य स्पष्ट करके सुनाने लगे। उन्होंने बताया  कि  जिस  घर  में  यह कथा होती है वह घर तीरथ बन जाता है। महात्म्य सुनने से श्री हरि हृदय में आ विराजते हैं। हजारों अश्वमेध यज्ञ इस कथा का सोलहवां अंश भी नहीं हो सकते। दिनों का कोई नियम नहीं है हमें तो सर्वदा ही सुनना  अच्छा  लगता  है।  कलयुग  में  बहुत दिनों तक चित्त की वृत्तियों को वश में रखना कठिन  होता  है। इस लिए सप्ताह श्रवण की विधि भी  बनाई  गई  है।  इकादश स्कंध में अपने धाम को जाने से पहले उद्धव जी के प्रश्न  करने पर भगवान ने कहा था कि मैंने अपनी सारी शक्ति  भागवत  में रख दी है। इस तरह यह साक्षात शब्द मेरी  ही  मूर्त्ति है।  इसके दर्शन मात्र से ही सारे कष्ट नष्ट हो जाते हैं। इस कथा  के  बिना भगवान की माया से पीछा छुड़ाना मुमकिन नहीं है।
     तभी सभा में बड़ा आश्चर्य हुआ। तरुण अवस्था  को  प्राप्त हुए अपने दोनों पुत्रों को साथ लेकर प्रेम रूप  भक्ति  बार  बार भगवान के "श्री  कृष्ण  गोविन्द  हरे  मुरारी  हे  नाथ  नारायण वासुदेव" आदि नामों का उच्चारण करती हुई अकस्मात  प्रकट हो गई। सभी की शंका दूर करने के लिए सनक  आदि ने  कहा कि यह भक्ति देवी अभी अभी कथा के ही  अर्थ से निकली है। भक्ति ने कहा,"मैं कलयुग में नष्ट प्राया हो गई थी। आपने कथा अमृत से सींच कर मुझे फिर से पुष्ट कर दिया है। अब आप  ही मुझे यह बताएं कि " मैं कहां रहूं।" तब सनक आदि ऋषियों ने कहा कि तुम भगवान का स्वरूप  प्रदान  करने  वाली,  अनन्य प्रेम का संपादन करने वाली हो और तुम संसार रोग को निर्मूल करने वाली हो। अत: तुम ही  धैर्य  धारण  करके  नित्य निरंतर भगवद्भक्तों के हृदयों में ही निवास करो। कलयुग के दोष  भले ही सारे संसार पर अपना प्रभाव डालें परंतु वहां तुम पर इसकी दृष्टि भी नहीं पड़ सकेगी। इस  प्रकार  उनकी  आज्ञा  पाते  ही भक्ति तुरंत भक्तों के हृदयों में का विराजी। जिसके हृदय भक्ति - वहां भगवान की शक्ति। भू लोक  में  भागवत  साक्षात  परम ब्रह्म का विग्रह है। सुनने और सुनाने वाले दोनों को ही भगवान श्री कृष्ण की समता प्राप्त हो जाती है।
      उस समय अपने भक्तों  के  हृदय  में  भक्ति  का  प्रादूर्भाव हुआ देखकर भक्तवत्सल भगवान अपना धाम छोड़  कर  वहां पर आ पधारे। चारों ओर जय जयकार की गूंज  हुई।  भगवान श्री हरि का रूप बड़ा ही मनमोहक था:
    गले वन माला, श्याम वर्ण, पीताम्बर सोहे।
    सिर पर मुकुट, कटी प्रदेश पर करधनी सोहे।।
    वक्ष स्थल पर उनके कौसतुभ मणि दमके।
    श्री अंग हरि चंदन से चर्चित, कान में कुण्डल चमके।।
    त्रिभंग ललित भाव से खड़े चित्त चुराएं।
    वहां उपस्थित सभी जनों के मन हर्षाएं।।
उसी समय भगवान, भक्तों  के  निर्मल  चित्त  में  अविर्भूत  हुए और वह स्थान तीरथ बन गया। नारद जी ने कहा  कि  यह  तो मैंने कथा की अलौकिक महिमा देखी है। साथ ही नारद जी  ने सनक आदि ऋषियों से जन कल्याण  के  लिए  एक  बहुत  ही सुंदर प्रश्न किया कि कौन कौन से ऐसे लोग हैं जिन्हें इस  कथा से पवित्र होने का सौभाग्य प्राप्त हो सकता है और उनके  पाप कट सकते हैं। इसके उत्तर में ऋषियों ने कहा:-
    ये मानवा: पाप कृतस्तु सर्वदा
    सदा दुराचार रता विमार्ग गा:।
    क्रोधाग्नि दग्धा: कुटीलाश्च कामिन:
    सप्ताह यज्ञेन कलौ पुनन्ति ते।।
ऋषियों ने कहा कि हे नारद जी, सभी प्रकार के मानव चाहे वो सदा पाप करते रहे हों, दुराचारी हों, उल्टे मार्ग पर चलने  वाले हों, क्रोधी हों, कुटिल हों सब के सब  इस  कथा  के  प्रभाव  से पवित्र हो जाते हैं। इस संबंध में एक प्राचीन  इतिहास  आपको सुनाते हैं। आप लोग धैर्य पूर्वक श्रवण करें।
 गोकर्ण की कथा:- पूर्व काल में तुंगभद्रा नदी के तट पर एक सुंदर नगर बसा हुआ था। उस नगर में समस्त वेदों का विशेषज्ञ और श्रौत स्मार्त कर्मों में निपुण एक आत्मदेव  नामक  ब्राह्मण रहता था। वह तेजस्वी और धनी था।  धनी  होते  हुए  भी  वह भिक्षा जीवी था। उसकी  प्यारी पत्नी जिसका नाम धुंदली था, कुलीन, ग्रह कार्य में निपुण एवं  सुंदरी  थी।  परंतु  स्वभाव  से बहुत ही हठी, क्रूर एवं झगड़ालू थी।  उनके  कोई  संतान  नहीं थी जिसका ब्राह्मण को बहुत संताप था। अनेकों  साधन  किए परंतु संतान प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन इसी  बात  के  लिए  वह बहुत दुखी हो रहा  था।  वह  घर  से  निकला और  बाहर  एक तालाब के किनारे आकर बैठ गया। वहां पर उसे एक  सन्यासी के दर्शन हुए। उसने सन्यासी के पास जाकर प्रणाम किया और अपना सारा दुखड़ा उन्हें सुना दिया।  सन्यासी  ने  उसके  माथे की लकीरें पढ़ कर उसको कहा कि वो  संतान  के  बारे  में  ना सोचे क्योंकि अगले सात जन्मों तक तो उसके  भाग्य  में  कोई संतान नहीं है। यह भी कह दिया  कि  उसे  तो  सन्यास  धारण कर लेना चाहिए। परंतु उस ब्राह्मण ने सन्यासी से कहा कि वो  सन्यास धारण नहीं करेगा। यह भी कहा कि ,"आप बल पूर्वक मुझे पुत्र  प्राप्ति  का  वरदान  दीजिए  वरना  मैं  अभी  आपके सामने ही शोक मूर्छित  होकर  अपने  प्राण  त्याग  दूंगा।" जब महात्मा ने देखा कि यह किसी प्रकार भी हठ नहीं छोड़ रहा तो उसने ब्राह्मण को एक फल देते हुए कहा कि इसे अपनी  पत्नी को खिला देना। तुम्हारी स्त्री  को  एक  साल  तक सत्य, शौच, दया, दान और एक समय एक ही अन्न खाने का नियम  रखना चाहिए। तभी बालक  शुद्ध  स्वभाव  वाला  होगा।  ब्राह्मण  ने सन्यासी को प्रणाम किया और फल लेकर घर  को चला  गया। उसने सारा वृतांत अपनी पत्नी को सुनाकर कहा  कि  वो  इस फल को खाकर विधि पूर्वक व्रत का पालन करे। उसकी स्त्री ने उसे तो हां बोल दी परंतु स्वयं सोच में पड़ गई कि  इस  कठिन कार्य को वो कैसे करे। उसने निश्चय  किया  कि  वो  ऐसा  नहीं करेगी। उसने झूठ ही अपने पति को कह दिया कि उसने  फल खा लिया है। उसी दिन उसकी बहन मिलने के  लिए  आ  गई। उस स्त्री ने अपनी बहन को सारी बात बताई। बहन ने कहा कि मेरे भी बच्चा होने वाला है। सही समय  आने  पर  मैं  तुम्हें  वो बच्चा दे दूंगी। इस तरह तुम्हें कोई कष्ट भी  नहीं  उठाना पड़ेगा और मेरा बच्चा भी  तुम्हारे  घर  में  अच्छी  तरह  पल  जाएगा क्योंकि मेरे तो पहले भी बच्चे हैं और धन का भी बहुत अभाव है। यह विचार ब्राह्मण की स्त्री को अच्छा लगा। उसने वह फल अपनी गाए को खिला दिया। समय आने पर  उसकी  बहन  ने उसे अपना नव जन्मा बालक दे दिया। उसने अपने  पति  और लोगों को यही बताया कि बालक उसका अपना ही है। उसका नाम भी उसने अपने नाम पर ही धुंधुकारी रक्खा।
     जिस गाए को फल खिला दिया था उसके भी मानव  जैसा ही बालक उत्पन्न हो गया। उसके कान गाए जैसे थे परंतु बाकी आकार मनुष्य जैसा ही था। वह सर्वांग सुंदर, दिव्य, निर्मल एवं सुवर्ण सी कांति  वाला  था।  ब्राह्मण  ने  उसका  नाम  गोकर्ण रक्खा। कुछ काल बीत जाने के बाद गोकर्ण तो बड़ा ही  ज्ञानी और पंडित हुआ। परंतु धुंधुकारी  बड़ा  ही  दुष्ट  निकला।  वह बालकों को कुएं में डाल देता,  हिंसा  करता,  लोगों  को  बहुत तंग करता, शिकार खेलता और  बुरी  संगत  में  जाकर  प्रसन्न रहता था। थोड़े ही समय में उसने अपने पिता की सारी संपत्ति नष्ट कर दी। उसने अपने माता पिता को भी  पीटना  शुरू  कर दिया। तब जाकर उस ब्राह्मण ने कहना शुरू किया  की  इससे तो ना ही होता तो अच्छा था। गोकर्ण ने अपने पिता  को  ज्ञान देकर वन में भेज दिया। वहां पर साधुओं को सेवा  और  दशम स्कंध का नित्य पाठ करके वह ब्राह्मण श्रीकृष्ण जी  को  प्राप्त हो गया।
     धुंधुकारी अपनी माता को भी पीटता था।  एक  दिन उसने अपनी माता को धमकी दी कि वो उसको  जलती  हुई  लकड़ी से पीटेगा। इस बात से डर कर रात्रि के समय वह  कुएं में गिर गई और उसकी मृत्यु हो गई।  गोकर्ण  जी तो  तीरथ  यात्रा  के लिए निकल गए और धुंधुकारी पांच  वैश्याओं को साथ  लेकर घर में रहने लगा। वह चोरियां करने लगा।  एक दिन वह उनके लिए बहुत से गहने चुरा लाया।  स्त्रियों ने विचार किया कि यह तो और भी चोरियां करेगा और इसे चोरी के कारण  राजा  के सेवक पकड़ लेंगे। यह हमें भी  पिटवाएगा।  उन्होंने उसे  सोते हुए को ही रस्सियों से बांध दिया और उसे जान से  मारने  का प्रयत्न किया। जब वह नहीं मरा तो  उन्होंने अंगारे  उसके  मुंह पर डाले। तड़प तड़प कर उसके प्राण निकल गए।  वो  उसके शरीर को गड्डे में डाल कर और सारी  संपत्ति  लेकर भाग  गईं। वह अपने कुकर्मों के  कारण  एक  भयंकर प्रेत बन  गया। वह बवंडर के रूप में दशो दिशाओं में भटकता रहता था।  गोकर्ण को उसकी मौत का पता चल  गया  था।  उसने  उसका  श्राद्ध, तर्पण पिंडदान आदि सब कुछ  करवा  दिया था।  गया  जी  में जाकर भी उसका श्राद्ध करवा दिया। परंतु जब गोकर्ण वापिस गांव आया तो गांव वालों ने उसे बताया कि  उसकी आत्मा  तो अभी भी भटक रही है। गोकर्ण बड़ी सोच में  पड़ गए कि  सारे उपाय करने पर भी  उसकी मुक्ति क्यों नहीं हुई। गोकर्ण ने सूर्य देव की तपस्या की। तब आकाशवाणी हुई  कि," श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह विधि पूर्वक करवाने से ही इसकी मुक्ति संभव हो सकती है।"गोकर्ण जी ने कथा  सुनाई।  बहुत  लोगों  ने  सुनी। प्रेत सात गांठ के एक बांस में घुस  कर बैठ  गया।  पहले  दिन की कथा से एक गांठ तड़ तड़ कर के टूट गई।  इसी तरह सात दिनों में सात गांठें टूट गईं। सातवें दिन दिव्य रूप धारण करके वह अपने लिए आए हुए  दिव्य विमान में बैठ कर  भगवान  के गो लोक  को चला गया।  इसका अर्थ  है कि भागवत सुनने से चित्त की गांठें खुल जाती हैं।  गोकर्ण ने भगवान  से  पूछा  कि बाकी लोगों ने भी कथा सुनी थी परंतु उनका उद्धार  क्यों  नहीं हुआ। भगवान ने कहा कि अगर कथा  का  श्रवण, मनन  और भजन शुद्ध हृदय से किया जाए तभी मनुष्य का  उद्धार  संभव होता है। फिर से कथा की गई। इस बार सब ने  बड़ी  ही श्रद्धा से सारी कथा सुनी। अब की बार सभी का उद्धार हो गया और सभी दिव्य विमानों से भगवान के गोलोक में पहुंच गए।
                        जय श्री कृष्ण जी की

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