गुरुवार, 7 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण - लेख संख्या - 5 (सृष्टि का विस्तार)

                        ब्रह्मा जी की उत्पत्ति
पिछले लेख  में हमने सृष्टि की रचना के बारे में पढ़ा  था।  इस लेख में हम ब्रह्मा जी की उत्पत्ति और उनके  द्वारा  किए  सृष्टि के विस्तार के बारे चर्चा करेंगे। सृष्टि  के  पूर्व  यह  संपूर्ण  विश्व जल में डूबा हुआ था। नारायण देव शेष शैया पर लेटे  हुए  थे। ज्ञान शक्ति को अक्षुण्ण रखते हुए ही, योग निद्रा का आश्रय ले अपने नेत्र मूंदे हुए थे। उन्हें सृष्टि काल आने पर पुन: जगाने के लिए केवल काल शक्ति को  ही  जागृत  रक्खा  हुआ  था। एक सहस्र चतुर्युग बीत जाने के बाद और शयन के  उपरांत  उनकी काल शक्ति ने उन्हें जीवों के कर्मों  की  प्रवृति  के  लिए  प्रेरित किया। तभी उनकी ही प्रेरणा से उनकी  नाभि  से  एक  कमल का पुष्प उत्पन्न हुआ। फिर उसमें से ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए। ब्रह्मा जी ने उस कमल का आधार ढूंढना चाहा। वे दूर तक नीचे गए परंतु उनको कमल का कोई आधार नहीं मिला। अंत में उनको तपस्या करने की प्रेरणा हुई। तपस्या करने पर उनको  भगवान और उनके धाम बैकुंठ के  दर्शन  हुए। उन्होंने  देखा  कि  वहां  पर  काल, माया और तीनों गुणों का कोइ प्रभाव नहीं है। वहां  पर  लक्ष्मी जी एवं नंद, सुनंद आदि पार्षद भी  हैं  जो  भगवान की सेवा कर रहे हैं।  महतत्व  आदि 25 शक्तियां  भी  भगवान की सेवा में   ही रहती हैं। भगवान नित्य स्वरुप में निमग्न रहते हैं।  ब्रह्मा जी  ने भगवान से प्रार्थना  की कि,"हे भगवान  मुझे  अपने  सगुण  और निर्गुण  स्वरुप  का  ज्ञान  प्रदान  करने  की कृपा  करें,  जिससे  मैं  सृष्टि  विस्तार  का   मर्म   जान   सकूं और  मुझे अभिमान भी ना आए। तब भगवान ने ब्रह्मा जी को भागवत का ज्ञान दिया।
                      चतु:  श्लोकी भागवत
भगवान ने कहा " हे ब्रह्मा मेरी कृपा से तुझ में पहले से  ही वेद का ज्ञान है।  तुम अब मेरे  विस्तार का  ज्ञान  ग्रहण  करो।
1. सृष्टि से पूर्व केवल मैं ही था।  सत् , असत  और  उससे परे, मुझ से भिन्न, कुछ भी नहीं था।  सृष्टि  ना  रहने  पर  भी  मैं ही रहता हूँ। यह सब सृष्टि रूप भी मैं ही हूँ। जो कुछ सृष्टि, स्थिति (पालन) और प्रलय से बचा रहता है, वह भी मैं ही हूँ।
2. जो मुझ मूल तत्व के अतिरिक्त  सत्य  सा  प्रतीत  होता  है, परंतु आत्मा में प्रतीत नहीं होता, उस अज्ञान  को  आत्मा  की  माया  समझो, जो प्रतिबिंब या अंधकार की  भांति  मिथ्या  है।
3. जैसे  पंच  महाभूत  ( पृथ्वी,  जल, अग्नि,  वायु,  आकाश) संसार के छोटे बड़े सभी पदार्थों में  प्रविष्ट  होते  हुए भी  उनमें प्रतीत नहीं होते, वैसे ही मैं भी सब में व्याप्त होने पर भी सबसे प्रथक हूँ।
4. आत्म तत्व को जानने की इच्छा रखने वाले के  लिए  इतना ही जानने योग्य है कि सृष्टि अथवा प्रलय क्रम में जो तत्व सर्वत्र एवं सर्वदा स्थान और समय से परे रहता है वही आत्म तत्व है। भगवान ने इस चतु: श्लाेकी भागवत के  द्वारा  उपदेश  देने  के बाद अपना रूप छिपा लिया।
            ब्रह्मा जी द्वारा नारद जी को भागवत ज्ञान
ब्रह्मा जी नारद जी को 10 लक्षण वाली  भागवत  सुनाते  हुए  कहते हैं कि  इन 10 लक्षणों  से  पूरे  सृष्टि  चक्र  का  बोध  हो जाता है। यह इस प्रकार हैं:
1. सर्ग :-- महत्तत्व आदि की उत्पत्ति (जो लेख - 4 में विस्तार से बताई गई है)
2. विसर्ग:-- विभिन्न सृष्टिओं का ब्रह्मा जी द्वारा निर्माण।
3. स्थान : प्रति पल विनाश  की  ओर  बढ़ने  वाली  सृष्टि  को  मर्यादा में स्थिर रखने की भगवान विष्णु की श्रेष्ठता।
4. पोषण:-- भगवान की भक्तों पर कृपा।
5. मन्वन्तर:-- मन्वन्तरों के अधिपति जो भगवद्भक्ति और शुद्ध धर्म अनुष्ठान आदि करते हैं।
6. उती:    जीवों की वे वासनाएं जो कर्म के द्वारा उन्हें बंधन में डाल देती हैं।
7. ईश कथा: भगवान के अवतारों एवं भक्तों की कथाएं।
8. निरोध:  जब भगवान योग निद्रा स्वीकार करके शयन करते हैं, तब जीव का अपनी उपाधियों के साथ उनमें लीन हो जाना ही ' निरोध ' कहलाता है।
9. मुक्ति: अज्ञान का परित्याग और वास्तविक स्वरुप परमात्मा में स्थित होना ही मुक्ति है।
10. आश्रय:-- परम ब्रह्म ही आश्रय है।  विराट  पुरुष  के  रूप में  कहीं रहने की इच्छा से जल उत्पन्न हुआ। विराट  पुरुष  नर से उत्पन्न होने के  कारण  ही  जल  का  नाम  नीर  पड़ा।  एक हजार वर्षों तक जल में रहने के  कारण  ही  विराट  पुरुष  का नाम नारायण  पड़ा।  उनकी  कृपा  से  ही  द्रव्य,  कर्म,  काल, स्वभाव और जीव आदि की सत्ता है।
 विराट पुरुष का स्वरुप बाहर की ओर से महत्तत्व और प्रकृति के कुल 18 आवरणों से  घिरा  है।  यह  सूक्षम  रूप, अव्यक्त, निर्विषेश, आदि - मध्य से रहित एवं नित्य है। वाणी  और  मन की वहां तक पहुंच नहीं है।
   उपरोक्त दोनों माया द्वारा रचित हैं। विद्वान् लोग दोनों को ही स्वीकार नहीं  करते।  वास्तव  में  भगवान्  निष्क्रिय  रहते  हैं। अपनी शक्ति से ही वे सक्रिय बनते हैं। फिर वे ब्रह्मा या  विराट आदि रूप धारण करके वाच्य, वाचक और  शब्द  के  रूप  में प्रकट होते हैं। और अनेकों  रूप, नाम  तथा  क्रियाएं  स्वीकार करते हैं। तीनों गुणों के आधार पर देवता, मनुष्य और  नार्किय योनियां मिलती हैं।

                    ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि विस्तार
1. पांच  व्रतियां  उत्पन्न  की - तम  (अविद्या),  मोह,  महामोह (राग ),  तामिस्र (द्वेष),  और  अंधतामिस्र (अभिनिवेश)।  इस सृष्टि से ब्रह्मा जी अप्रसन्न हुए।
2. सनत, सुनंदन, सनातन और सनत कुमार नामक चार ऋषि
जो सदा बाल रूप में ही रहते हैं। चारों जन्म से  ही  मोक्षमार्गी हुए। उन्होने आगे सृष्टि बढ़ाने के लिए मना कर दिया।
3. ब्रह्मा जी को इस बात पर क्रोध हुआ। उनकी भौंहों से  नील लोहित बालक ( रुद्र ) प्रकट हुए। रुद्र द्वारा प्रकट की गई सृष्टि दशों दिशाओं को जलाने लगी।
4. फिर ब्रह्मा जी ने 10 पुत्र उत्पन्न किए। उनके नाम थे  नारद, दक्ष, वशिष्ठ, भृगु, कृतु, पुलह, पुलस्त्य, अंगिरा,अत्रि,  मरीचि।
5. इसके इलावा -- धर्म, अधर्म, काम  क्रोध,  लोभ,  सरस्वती,
समुद्र, राक्षसों का अधिपति निरिर्ती और ऋषि कर्दम, वेद और अंधकार आदि भी उत्पन्न किए।

                      मेथुनी सृष्टि का आरंभ
सृष्टि आगे ना बढ़ती देख ब्रह्मा जी ने अपने  शरीर  से ही  एक पुरुष और एक स्त्री का जोड़ा उत्पन्न किया। पुरुष का नाम था ' मनु '  और स्त्री का नाम था ' शतरूपा '।  यहां से आगे  सृष्टि का विस्तार तेजी से हुआ। और बीच बीच में  भगवान  ने  कई बार अवतार भी ग्रहण किए। उन अवतारों के बारे अगले लेख में लिखेंगे
                       जय श्रीकृष्ण जी की

       

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