ब्रह्मा जी द्वारा गृहस्थ जीवन जीने की आज्ञा
कर्दम ऋषि ब्रह्मा जी के पुत्र थे। वे सदा तपस्या में लीन रहते थे। एक बार सृष्टि को बढ़ाने के लिए ब्रह्मा जी ने उन्हें विवाह करने के लिए आज्ञा दी। पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए उन्होंने उनके आदेश को स्वीकार कर लिया।
सुयोग्य कन्या के लिए तपस्या
सुयोग्य कन्या की प्राप्ति के लिए उन्होंने सरस्वती ज के किनारे भगवान की आराधना करते हुए घोर तपस्या की। उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें दर्शन दिए। भगवान ने वर मांगने के लिए कहा तो कर्दम जी ने प्रार्थना की," भगवन मेरे पिता ब्रह्मा जी की आज्ञा का पालन करने के लिए मुझे ऐसा वर दीजिए कि मुझे एक ऐसी सुशील और मेरे अपने जैसे स्वभाव की कन्या मिले जिससे विवाह करके मैं अपने पिता की इच्छा को भी पूरा कर सकूं।" भगवान ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि पर्सों ही मनु जी अपनी पुत्री देवहूति के विवाह का प्रस्ताव लेकर तुम्हारे पास आएंगे। तब तुम इनकार मत करना। इतना कहकर भगवान अन्तर्ध्यान हो गए।
मनु जी का कर्दम के पास आना
मनु जी अपनी पुत्री देवहूति के विवाह का प्रस्ताव लेकर आए। दोनों का विवाह हुआ। देवहूति ने अपने पति की बड़ी ही सेवा की। एक राजा की पुत्री होते हुए भी एक साधु पति के साथ आनन्द के साथ रहतीं और अपने तपस्वी पति की सेवा करती थीं। कोई चाह ना थी। पति की तपस्या में देवहूति सेवा रूप से सहयोग देती थीं। सेवा करते करते वह काफी कमज़ोर हो चुकी थीं।
सुंदर भवन और विमान का निर्माण
एक दिन कर्दम ऋषि को अपनी पत्नी पर बड़ी ही दया आई। उन्होंने विचार किया कि इतने बड़े राजा की पुत्री होकर भी वो मेरे साथ ऐसी दयनीय दशा में रह रही है। उन्होंने अपने तप के बल से एक बहुत ही सुंदर भवन का निर्माण किया। एक सुंदर विमान भी बनवाया। उसमें कई प्रकार की दासियां भी सेवा में लगी हुईं थीं। सब प्रकार की सुविधाओं से सुसज्जित विमान से कर्दम जी ने देवहूति को अनेक रमणीक स्थलों का भ्रमण करवाया।
कर्दम ऋषि और देवहूति की संतति
कर्दम तथा देवहूति को नौ कन्याओं के बाद एक पुत्र का जन्म हुआ। कन्याओं के बड़ी हो जाने पर उनका विवाह नौ ऋषियों के साथ किया गया। उनके नाम इस प्रकार हैं: कला का विवाह मारीची, अनसुईया का अत्री, श्रद्धा का अंगिरा, अविर्भूव का पुलस्त्य, गति का पूलह, क्रिया का कृतु, ख्याति का भृगु ऋषि से, अरुंधति का वशिष्ट और शांति का अथर्व ऋषि से विवाह हुआ।
भगवान कपिल देव जी का जन्म
ऋषि कर्दम जी की 9 कन्याओं के बाद, भगवान विष्णु जी ने स्वयं उनके घर कपिल देव जी के रूप में अवतार धारण किया था। जो बाद में कपिल मुनि के नाम से विख्यात हुए। बचपन में ही भगवान कपिल बड़े बुद्धिमान थे। कर्दम जी ने सन्यास ले लिया, जंगल में जाकर घोर तप किया और अंत में परम पद को प्राप्त हुए। कपिल जी के ज्ञान को सांख्य दर्शन के नाम से जाना जाता है। उन्होंने अपनी माता देवहूति को भी ज्ञान दिया जिससे उन्हें भी परमपद की प्राप्ति हुई। इसका विस्तार से वर्णन अगले लेख में होगा।
(जय श्रीकृष्ण जी की)
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