बुधवार, 13 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण - लेख - 9 (कपिल जी द्वारा माता देवहूति को ज्ञान)


             भगवान कपिल को माता देवहूति के प्रश्न  
माता देवहूति जानती थी कि उसका पुत्र भगवान  का  अवतार है। एक दिन माता देवहूति ने कपिल जी को एक ऊंचे  आसन पर बैठा कर प्रश्न किए कि "हे देव 1. इन देह गेह आदि में  जो, मैं और मेरे पन का दुराग्रह होता है यह क्या है ? 2. मेरा  महा मोह कैसे दूर होगा ? 3. प्रकृति और पुरूष का ज्ञान क्या है ?" यह प्रार्थना भी की कि "मुझे अपनी शरण में ले लो"।

                   कपिल जी का माता को ज्ञान
 " हे माता, 1. अध्यात्म योग ही मनुष्य के कल्याण  का  मुख्य साधन है। 2. बंधन,  विषयों  में  आसक्ति  के कारण  होता  है, मोक्ष,  परमात्मा में  अनुरक्त  होने  पर प्राप्त होता है और  इन दोनों का कारण मन है। 3. विकारों  से  मुक्ति, सुख - दुःख  से मुक्ति, और  सम अवस्था  बनाने  के लिए मन को मारना  नहीं होता अपितु सही दिशा देनी होती है।
इसे कविता के रूप में इस तरह से कहा है :
क्यों चाहे रे मन को मारण, मन ही बंधन मोक्ष का कारण।
विष्यासक्ती  बंधन  ल्यावे,  हरि  अनुरक्ती मोक्ष दिलावे ।।
जो विकार से मुक्ति पावे, सुख-दुःख छोड़ के सम हो जावे।
ज्ञान,  वैराग्य,  भक्ति  से  पूर्ण,  आत्मा  को माने संपूर्ण।।
प्रकृति  से  है  परे  आत्मा,  भेद  रहित  इकमात्र  आत्मा।
सूक्षम,  सव्यांप्रकाश  आत्मा,  उदासीन आखंड आत्मा।।
शक्तिहीन प्रकृति  है मानों, ऐसा अनुभव करो  तो  जानों।
सबसे  मंगल  मार्ग है भक्ति, हरि  में  केवल  हो अनुरक्ति।।
सन्तों  के संग मन  हो जावे, मार्ग  मोक्ष  का  संत  बतावे।
संत  अकारण  हितु  होता है,  सहनशील, दयालु  होता है।।
शत्रुभाव  से  मुक्त  संत  है,  प्रेमी,  त्यागी,  सरल  संत  है।
चिंतन,  श्रवण,  कीर्तन  गावे,  शांत  रहे  संसार  भुलावे।।
त्रिगुन, त्रिताप, कष्ट  ना आवे,  संतों का संग हरि को भावे।
आसन,  प्राणायाम  करे  जो, अंग अंग का ध्यान  करे जो।।
आत्म विभोर  हो कर  जो रोवे, ऐसे अपना  आप भिगोवे।
अंत: करण  शुद्ध  हो  जावे, हरि कृपा  से  हरि  पद  पावे।।

उन्होंने यह भी बताया कि प्रकृति  से अलग  है  चित्त, चित्त  से अलग है आत्मा, और आत्मा से अलग  है ब्रह्म।  इस  तरह  से देवहूति को ज्ञान देकर कपिल जी ने माता  से आज्ञा  ली  और घर छोड़ दिया। माता ने जो ज्ञान  प्राप्त  किया  था, उसका  ही अनुसरण करते हुए उन्होंने परमपद को प्राप्त किया।
                       जय श्रीकृष्ण जी की

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