दक्ष द्वारा भगवान शिव को शाप
जैसे कि पिछले लेख में आप ने पढ़ा है कि प्रजापति दक्ष की पुत्री सती का विवाह भगवान शिवजी से हुआ था। मैत्रेय जी कहते हैं कि एक बार प्रजापतियों का यज्ञ था। उसमें शिव भगवान भी बैठे थे। जब दक्ष प्रजापति सभा में आए तो सभी ने उठ कर उनका स्वागत किया। परंतु भगवान शिव खड़े नहीं हुए। दक्ष को यह बहुत बुरा लगा कि उसका दामाद होते हुए भी शिवजी ने खड़े होकर उसका सम्मान नहीं किया। क्रोध में आकर दक्ष ने शिवजी को श्राप दे दिया कि भविष्य में जो भी यज्ञ होगा उसमें बाकी देवताओं के साथ यज्ञ का भाग शिवजी को प्राप्त नहीं होगा।
जैसे कि पिछले लेख में आप ने पढ़ा है कि प्रजापति दक्ष की पुत्री सती का विवाह भगवान शिवजी से हुआ था। मैत्रेय जी कहते हैं कि एक बार प्रजापतियों का यज्ञ था। उसमें शिव भगवान भी बैठे थे। जब दक्ष प्रजापति सभा में आए तो सभी ने उठ कर उनका स्वागत किया। परंतु भगवान शिव खड़े नहीं हुए। दक्ष को यह बहुत बुरा लगा कि उसका दामाद होते हुए भी शिवजी ने खड़े होकर उसका सम्मान नहीं किया। क्रोध में आकर दक्ष ने शिवजी को श्राप दे दिया कि भविष्य में जो भी यज्ञ होगा उसमें बाकी देवताओं के साथ यज्ञ का भाग शिवजी को प्राप्त नहीं होगा।
भगवान शिव तो सदा कल्याण करने वाले हैं परन्तु उनके परम सेवक नंदीश्वर जी को क्रोध आ गया। उन्होंने भी दक्ष और उनकी बात का अनुमोदन करने वाले ब्राह्मणों को शाप दे दिया कि:- "तुम सभी तत्व ज्ञान से विमुख हो जाओ, अत्यन्त स्त्री लंपट हो जाओ, दक्ष का मुख भी शीघ्र ही बकरे जैसा हो जाए। तुम सभी आवागमन के चक्र में पड़े रहो और शंकर द्रोही होने के कारण कर्मों के जाल में ही फंसे रहो। तुम केवल पेट पालने के लिए ही तप करो और सांसारिक सुख के गुलाम हो कर भीख मांगते भटका करो।" इस पर भृगु ने कहा कि " शिव भक्त और उनके अनुयाई सतशास्त्रों के विरूद्ध आचरण करने वाले और पाखंडी हों।"
माता सती द्वारा भगवान राम जी की परीक्षा
माता सती द्वारा भगवान राम जी की परीक्षा
इस तरह से शिव - सती का दक्ष के यहां आना जाना ही समाप्त हो गया। कोई संबंध ना रहा। बहुत समय व्यतीत हो जाने के बाद, त्रेता युग में, जब भगवान राम अवतार हुआ, उस समय भगवान शिवजी सती जी के साथ ऋषि अगस्त्य जी के आश्रम में पधारे। क्योंकि राम उनके आराध्य हैं और उनकी कथा सुनना और सुनाना उनको बहुत प्रिय है । इस लिए उन्हों ने महर्षि अगस्त्य जी से राम कथा सुनी और बाद में ऋषि के प्रार्थना करने पर उनको हरि भक्ति का ज्ञान प्रदान किया। तुलसी दास जी ने इस पर लिखा है कि:-
" एक बार त्रेता जुग माहीं। शंभु गए कुम्भज ऋषि पाहीं।।
संग सती जग जननी भवानी। पूजे ऋषि अखिलेश्वर जानी।।
राम कथा मुनि बरज बखानी। सुनी महेस परम सुख मानी।।
ऋषि पूछी हरि भक्ति सुहाई। कही संभू अधिकारी पाई।।"
कुछ दिन ऋषि आश्रम में रहने के पश्चात सती जी के साथ वापिस कैलाश लौटते हुए सोचते जा रहे थे कि गुप्त रूप से अवतरित प्रभु राम के दर्शन कैसे प्राप्त हों। अगर उनके सामने जाता हूँ तो सब लोग जान जाएंगे। शिव ऐसा सोच ही रहे थे कि उन्होंने उसी समय श्री राम और लक्ष्मण जी के दर्शन किए।
"संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हिएं अती हर्ष बिसेषा।"
शिवजी महाराज ने मन ही मन प्रणाम किया और पुलकित हो गए। परंतु सती जी को संदेह हुआ क्योंकि यह बात उस समय की है जब सीता माता का हरण हुआ था और भगवान श्रीराम
माता सीता जी के वियोग में दुःखी हो रहे थे। तब सती जी को लगा कि एक साधारण व्यक्ति की तरह दुःखी होने वाले राम, महादेव जी के इष्ट देव कैसे हो सकते हैं। और शिवजी कह रहे हैं कि: "सोई मम इष्टदेव रघुबीरा।" सती जी के संदेह करने पर भगवान् शिव ने उन्हें समझाया लेकिन सती जी संदेह निवारण चाहती थीं। सती जी ने माता सीता का भेस बनाया और राम भगवान के सामने चली गईं। लक्ष्मण जी को तो संदेह हुआ, लेकिन राम जी को कोई सन्देह नहीं हुआ। वो बोले कि " माता जी आप अकेली क्यों इस जंगल में घूम रही हैं, और शिवजी महाराज कहां हैं ?"
" राम बचन मृदु गूढ़ सुनि, उपजा अति संकोच।
सती सभीत महेस पहिं, चलीं हृदय बढ़ सोच।। "
और सोचने लगीं कि:-
" मैं संकर कर कहा ना माना, निज अज्ञान राम पर आना।"
उसी समय सती जी ने एक कौतक देखा कि उनके आगे राम और सीता जी दोनों जा रहे हैं। पीछे देखा तो दोनों भाई खड़े हैं। उसी समय उन्होंने राम वंदन करते हुए अनेकों ब्रह्मा, विष्णु और शिव देखे।
" सती बिधात्री (ब्रम्मानी) इंदिरा (लक्ष्मी), देखीं अमित अनूप ।
जेहि जेहि बेष अजादी सुर (देवता), तेहि तेहि तन अनुरूप ।।"
सभी को कई कई रूप में देखा परंतु राम का रूप एक ही है। बार बार सिर निवा कर शिवजी के पास चली गईं। जब उन को शिवजी भगवान ने पूछा तो कहा कि कोई परीक्षा नहीं ली। परंतु भगवान ने सब जान लिया।
" परम पुनीत ना जाई तजी, किए प्रेम बढ़ पाप।
प्रकट ना कहत महेश कछु, हृदय अधिक संताप।।"
सामने तो शिवजी महाराज कुछ नहीं कह रहे परंतु मन ही मन दुःखी हो रहे हैं। सती जी को सुख देने के लिए अनेकों कथाएं कहीं। कैलाश पहुंच कर समाधि में बैठ गए।
क्रमशः
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