गुरुवार, 21 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण, लेख संख्या - 14 (भक्त ध्रुव जी की कथा)

                  ध्रुव से सौतेली माता दुर्व्यवहार
भागवत के अनुसार ब्रह्मा जी ने अपने में से ही एक पुरुष  मनु और एक स्त्री शतरूपा को  उत्पन्न किया।  मनु और  शतरूपा की तीन पुत्रियां हुईं। उनके बारे में पिछले लेखों में  बता  दिया गया है। मनु के दो पुत्र हुए, जिनके नाम  थे, एक  का  प्रियव्रत और दूसरा उत्तान पाद। राजा ऊत्तान पाद की दो पत्नियां  थीं। उनके नाम थे सुनीति और सुरुचि।  सुरुचि  राजा  को  अधिक प्रिय थी। उसके पुत्र का नाम  था  उत्तम।  सुनीति  के  पुत्र  का नाम था ध्रुव। सुरुचि, सुनीति और उसके  पुत्र  ध्रुव  से  नफरत करती थी। एक दिन जब ध्रुव केवल पांच वर्ष  का  ही  था, वह अपने पिता जी के पास उनकी गोद में बैठने की इच्छा से गया। पास ही उसकी दूसरी माता सुरुचि भी बैठी  थीं।  राजा  ने  भी ध्रुव का स्वागत नहीं किया और सुरुचि  ने  तो  यहां  तक  कह दिया कि," बच्चे तू राज सिंहासन पर बैठने का अधिकारी नहीं है।  तू भी, है तो राजा का ही बेटा, परंतु मैंने तुझे अपनी कोख में धारण नहीं किया। अर्थात तू मेरा बेटा नहीं  है। अरे  तूने  तो किसी दूसरी स्त्री के गर्भ से जन्म लिया है, और नादान होने के नाते ही तू ऐसे दुर्लभ विषय की इच्छा कर  रहा  है।  यदि  तुझे राज सिंघासन की इच्छा है तो  जा  और  तपस्या  करके  परम पुरुष श्री नारायण की आराधना कर और उनकी  कृपा  से  मेरे गर्भ में आकर जन्म ले।"
           माता के वचन सुनकर तपस्या के लिए जाना
सुरुचि की इस बात पर पिता कि चुप्पी यह सिद्ध करती थी कि वो भी इस बात से सहमत हैं।  ध्रुव  चुप  चाप  वहां  से  अपनी माता सुनीति के महल में चले गए। सारी बात माता सुनीति को बताई। माता ने सुना तो व्याकुल हो गईं। अश्रुधारा  बहने  लगी परंतु पुत्र से कहने लगीं, " हां बेटा तेरी  दूसरी  माता  ठीक  ही कहती हैं। राजा तो मुझे दासी के लायक भी नहीं मानते।  यदि तू उत्तम के समान राज सिंघासन पर बैठना चाहता  है  तो  श्री नारायण भगवान की आराधना में लग जा। तेरे  परदादा  ब्रह्मा जी और दादा स्वायंभुव मनु जी ने भी यही किया था। इस लिए तू भी भगवान का आश्रय ले। तू केवल अपने पवित्र  हुए  चित्त में पुरषोत्तम भगवान को बैठा ले, अन्य  सब  का  चिंतन  छोड़ कर, केवल उन्हीं का भजन कर।" यह सुनकर, ध्रुव ने माता के वचनों को हृदय में धारण किया और  जंगल  की  ओर  निकल पड़े।
                 ध्रुव को नारद जी का आशिर्वाद
जंगल की ओर जाते हुए रास्ते में ध्रुव को आशीर्वाद  देने  नारद जी का आगमन हुआ। आते ही नारद जी ने अपना पापनाशक कर कमल मस्तक पर फेरा। नारद जी ने कहा, " बेटा तू  अभी बच्चा है,कर्मों के अनुसार मान अपमान  मिलता  है।  तुम  हर परिस्थिति में संतुष्ट रहो। यह तपस्या की डगर बड़ी कठिन  है। बड़ा होकर तपस्या भी कर लेना। तुम्हारे लिए यही शुभ है  कि तुम सभी से मित्रता का भाव रक्खो।"
        ध्रुव ने कहा," मुझ अज्ञानी को आप  का  ज्ञान  समझ में नहीं आएगा। हे ब्राह्मण मैं उस पद पर अधिकार करना चाहता हूं जो त्रिलोकी में सब से श्रेष्ठ है और जिस पर  मेरे  बाप  दादा भी आरूढ़ नहीं हो सके। आप मुझे उसी की  प्राप्ति  का  कोई अच्छा सा मार्ग बता दीजिए।  क्योंकि  संसार  के  कल्याण के लिए ही आप तो त्रिलोकी में विचरते हैं।"
       नारद जी ध्रुव का दृढ़ संकल्प देख  कर  अति  प्रसन्न  हुए और उपदेश करने लगे कि जैसा तेरी माता सुनीति ने कहा है तू वैसा ही कर। अभिलाषा पूरी करने के लिए श्री हरि  के  चरणों का सेवन ही एक मात्र उपाय है। अब तुम श्री यमुना जी के तट वर्ती परम पवित्र मधुवन में जाओ, क्योंकि वहां पर श्री हरी का नित्य निवास है। नारद जी ने तपस्या  करने  की  विधि  बताई। रूप ध्यान करने के लिए  भगवान  का  स्वरूप  भी  बतलाया। रूप ध्यान और मंत्र जाप  की  विधि  समझाते  हुए, जपने  के लिए द्वादश अक्षर मंत्र  भी दिया,"ॐ नाम: भगवते वासुदवाय"
             उत्तानपाद को नारद जी द्वारा सांत्वना
इतना कहकर नारद जी अन्तर्ध्यान हो गए और उधर घर में भी उत्तानपाद को अपने किए पर बहुत पछतावा हुआ। तभी नारद जी ने प्रकट हो कर उसको सांत्वना देते हुए कहा कि  तेरा  पुत्र शीघ्र ही सफल होकर वापस आएगा। इस लिए तुम  चिंता  को त्याग दो और शुभ समय की प्रतीक्षा करो।
                      ध्रुव द्वारा घोर तपस्या
उधर ध्रुव ने मधुवन पहुंचकर यमुना जी में स्नान करने के  बाद एकाग्रचित्त होकर उपासना शुरू की।  चार  महीने  तक, पहले फल खाकर, फिर केवल  सूखे  पत्ते  और  घास  खाकर,  फिर केवल पानी पीकर और फिर केवल हवा ग्रहण  कर  उपासना, भजन और आराधना की। पांचवें महीने में श्वास  जीतकर, पार ब्रह्म का चिंतन करते हुए एक पैर पर निश्चल भाव  से  खड़े  हो गए। मन को सब ओर से खींच लिया। तीनों  लोक  कांप  उठे। उनके अंगूठे से आधी पृथ्वी झुक गई। अनन्य बुद्धि से श्री  हरि का ध्यान करने लगे। उनकी समष्टि प्राण से अभिन्नता  हो गई। सभी जीवों का प्राण रुकने लगा। श्री हरि प्रसन्न हुए।
            ध्रुव को भगवान के दर्शन और आशिर्वाद
श्री हरि ध्रुव को दर्शन देने के लिए आ पहुंचे। जैसे ही  श्री  हरी ने ध्रुव को आंखें खोलने के लिए कहा तो आंखें खोलते ही ध्रुव ने वही मूरत बाहर भी देखी जिसको वह थोड़ी देर  पहले  तक अंदर देख रहे थे। ध्रुव हरि दर्शन करके आनंदित हो  गए। अब
छोटे से बालक ध्रुव भगवान की स्तुति  करना  चाहते  हैं  परंतु  करनी नहीं  आती।  भगवान  ने  जान  लिया  कि  ध्रुव  अपनी प्रसन्नता व्यक्त करना चाहते हैं परंतु उनके पास  शब्द  नहीं हैं। भगवान ने जैसे ही अपने शंख से ध्रुव जी  को  छुआ, वैशे  ही  उनके ज्ञान चक्षु खुल गए और वो स्तुति करने लग गए।
                   ध्रुव द्वारा भगवान की स्तुति 
"हे हरि, आप ही अंत: करण में प्रवेश कर अपने तेज  से, सोई हुई वाणी को जगाते हैं और इन्द्रियों को  चेतनता  प्रदान  करते हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूं। आप एक हैं, परंतु  अनेक रूप हैं। आप अन्तर्यामी हैं। ब्रह्मा जी ने भी  आपकी  ही  शरण  ली थी। सकाम मनुष्य माया से ठगा जाता है। इस लिए आप  मुझे विशुद्ध हृदय भक्तों का संग दीजिए। आप जीव से सर्वदा भिन्न हैं। परमानन्द मूर्त्ति हैं। मैं आपकी शरण लेता हूं।
                  भगवान द्वारा ध्रुव को वरदान
भगवान ने कहा," तेरा कल्याण हो, मैं तुझे वह पद देता हूँ जो सबसे ऊंचा है और जिसके  गिर्द  नक्षत्र  एवं  सप्त  ऋषि  भी प्रदक्षिणा करते हैं। इस लोक में भी तू  धर्म  पूर्वक  पृथ्वी  का पालन करेगा।"भगवान इतना कहकर अंतर्ध्यान हो गए।
                     घर पहुंचने पर स्वागत
ध्रुव के घर पहुंचने पर बहुत स्वागत  हुआ।  पिता  ने  पश्चाताप किया। ध्रुव राजा बने। उनका विवाह शिशुमार की पुत्री भ्रमी से हुआ। दो पुत्र हुए कल्प और वत्सर। दूसरी पत्नी वायु की  पुत्री इला से उत्कल नाम का पुत्र और एक कन्या भी हुई।
                 चिरकाल तक धर्म पूर्वक शासन
भाई उत्तम को एक यक्ष ने मार दिया। उत्तम की माता  का  भी जंगल की आग में जल कर देहान्त हो गया। अपने भाई के वध का बदला लेने के लिए  ध्रुव  का  यक्षों  से  भयानक  युद्ध  भी हुआ।  कुबेर से वरदान  पाया  कि "सदा  भगवत  समृती  बनी रहे।"
                        परमपद की प्राप्ति
अंततोगत्वा जब वैराग्य हुआ तो बद्रिक आश्रम चले गए।  वहां अपने आप को विराट स्वरूप में स्थिर कर लिया।  फिर उसका भी त्याग कर दिया। अपने ध्रुव  होने का भी  त्याग  कर  दिया। अंततः एक दिन, भगवान विष्णु के पार्षद उन्हें लेने के लिए आ गए। उनकी माता सुनीति को भी भगवतधाम  की  प्राप्ति  हुई। आज भी महान भक्त ध्रुव जी को साधक आदर्श मानते हैं।
                       जय श्रीकृष्ण जी की

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें