राजऋषि परीक्षित:
महाराज परीक्षित अर्जुन के पौत्र एवं अभिमन्यु तथा उत्तरा के पुत्र थे। पांडवों ने हिमालय को चले जाने से पहले अपना सारा राजपाट अपने पौत्र परीक्षित को सौंप दिया था। राजा परीक्षित साहसी और कल्याणकारी शासक थे। हमेशा लोकहित में ही कार्य करते थे।
परीक्षित और कलयुग:
एक दिन राजा ने देखा कि कलयुग उनके राज्य में प्रवेश कर चुका है और धर्म को नष्ट करने की चेष्टा कर रहा है। जब राजा उसको दण्ड देने लगा तो उसी समय कलयुग ने क्षमा याचना की कि मैं किसी को कष्ट नहीं दूंगा कृपया मुझे रहने के लिए कोई स्थान प्रदान करने की कृपा करें। इस पर राजा को दया आ गई और राजा ने कहा कि तुम्हारी प्रवृत्ति के अनुसार मैं तुम्हें जुआ घर, वेश्यालय, और मदिरालय आदि में रहने की अनुमति देता हूं। इस पर कलयुग ने कहा कि राजन कोई एक अच्छा स्थान भी बता दो जहां मैं निवास कर सकूं। इस पर परीक्षित जी ने उसको सोने ( गलत ढंग से कमाया हुआ धन ) में निवास करने की आज्ञा भी दे दी।
परीक्षित को श्रृंगी ऋषि का शाप:
एक दिन राजा को पांडवों द्वारा जीती हुई बहुत सारी बहुमूल्य वस्तुओं को देखने का मन हुआ। राजा ने वहां पड़ा हुआ एक मुकुट देखा और उसे पहन लिया। वास्तव में वो मुकुट जरासंध का था जो बहुत ही पापी और क्रूर राजा था। उस मुकुट को पहनते ही राजा की बुद्धि भृष्ट हो गई। राजा उसी समय वन में शिकार खेलने चला गया। शिकार करते करते राजा को जोर की प्यास लगी। राजा ऋषि शमीक की कुटिया में गए। साधु महाराज ध्यान में बैठे थे। राजा ने सोचा कि मेरा कोई आदर सत्कार नहीं हुआ। गुस्से में राजा ने एक मरा हुआ सांप लिया और ऋषि के गले में डाल दिया और चला गया। उधर जब ऋषि के पुत्र श्रृंगी को पता चला तो उसने राजा को शाप दे दिया कि आज से सातवें दिन तक्षक नाग के डसने से परीक्षित की मृत्यु हो जाएगी। ऋषि श्मीक को जब शाप के बारे में पता चला तो उन्होंने अपने पुत्र को कहा कि यह तुमने अच्छा नहीं किया , हमारे राजा तो बहुत ही अच्छे हैं। अब तुम वहां जाकर उनको सूचित करो ।
राज ऋषि का पश्चाताप और अनशन व्रत:
उधर जब राजा ने घर जाकर मुकुट उतारा और जब होश आई तो राजा को बहुत पछतावा हुआ। इतने में राजा को शाप का समाचार भी मिल गया। राजा इस बात के लिए प्रसन्न हुए कि उन्हें पश्चाताप का अवसर मिल गया है। राजा ने उसी समय अपने बेटे जनमेजा को राज्य सौंपा और मुक्ति की खोज में गंगा जी के तट पर चले गए। राजा होते हुए भी परीक्षित एक उच्च कोटि के ऋषि थे। उनको देखने के लिए वहां पर महर्षि अत्री जी, वशिष्ट जी, च्यवन ऋषि, अरिष्टनेमी जी, अंगिरा जी, पराशर जी, और व्यास जी आदि अनेकों ॠषी पधारे। राज ऋषि परीक्षित जी ने सबको प्रणाम किया। ऋषियों ने उनको आशीर्वाद प्रदान किया।
श्री शुकदेव जी द्वारा कथा आरंभ:
उसी समय वहां पर शुकदेव जी भी पधारे। परीक्षित जी ने उठ कर उनको प्रणाम किया। परीक्षित ने उन से शाप मुक्ति नहीं मांगी अपितु प्रार्थना की कि उसे कोई ऐसा साधन बताएं, जिस के करने से मृत्यु के बाद जो भी जन्म उसे मिले, उसमें श्री कृष्ण जी की भक्ति और उनकी रसमई लीलाओं में रूचि बनी रहे। मेरी दृष्टी में सभी प्राणी एक समान हों। आप मेरे शाप के कारण ही स्वयं भगवान बन कर पधारे हैं। मेंने अपना चित्त भगवान में अर्पण कर दिया है। इसके बाद सभी ऋषियों ने श्री शुकदेव जी को प्रार्थना की वे राज ऋषि परीक्षित और सारे जगत के कल्याण हेतु श्रीमद्भागवत कथा सुनाने की कृपा करें। एक ऊंचे आसन पर श्री शुकदेव जी को बैठाया गया। जब श्री शुकदेव जी कथा सुनाने को सहमत हो गए तो आज्ञा लेकर परीक्षित जी ने एक प्रश्न किया कि यदि मृत्यु में कम समय बचा हो तो मनुष्य को क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए?
शुकदेव जी ने कहा कि यदि अभय पद को प्राप्त करना है तो श्री कृष्ण की लीलाओं का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिए। ज्ञान, भक्ति, धर्म की निष्ठा आदि कोई भी साधन करें परन्तु ऐसा करें कि मृत्यु के समय भगवान की स्मृति बनी रहे। लीला वर्णन बहुत ही महत्वपूर्ण साधन है। यहां तक कि निर्गुण स्वरूप में स्थित बड़े बड़े ऋषि मुनि भी लीला वर्णन में ही लगे रहते हैं। द्वापर के अंत में ही मैने यह कथा अपने पिता श्री व्यास जी से सुनी है। तुम चिंता मत करो। राजर्षी खटवांग ने दो घटी जीवन रहते ही, अपना सब कुछ त्याग कर अभय पद पा लिया था। तुम्हारे पास तो सात दिन हैं।
सुनो, ऐसी अवस्था में व्यक्ति को चाहिए कि वह बिना घबराए, वैराग्य से ममता को काट डाले, ॐ का उच्चारण मन में करे। मन को इन्द्रियों से हटा ले और भगवान के विग्रह का ध्यान करे। एक क्षण के लिए भी रूप को ना भूले। एक एक अंग का ध्यान करते करते तल्लीन हो जाए। अगर ध्यान हट भी जाए तो फिर से जोड़े। नित्य निरंतर अभ्यास से उसे भक्ति योग की प्राप्ति हो जाती है।
यह सुनकर परीक्षित ने अपनी शुद्ध बुद्धि भगवान श्री कृष्ण के चरणों में अनन्य भाव से समर्पित करदी। उसी समय परीक्षित के मन में एक और भाव आया और उसने दूसरा प्रश्न किया कि भगवान अपनी माया से सृष्टि की रचना कैसे करते हैं।
इस प्रश्न के उत्तर की व्याखया अगले लेख -4 में की जाएगी।
जय श्रीकृष्ण जी की
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