गुरुवार, 28 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण लेख संख्या-15(ध्रुव वंश एवं विष्णु अवतार, सम्राट पृथु जी)

                         ध्रुव जी उत्तराधिकारी
       ध्रुव जी  के बाद  उनके बड़े पुत्र  उत्कल ने राज्य स्वीकार नहीं किया।  ध्रुव जी के छोटे पुत्र  वात्सर राजा बने उनके बाद उनके पुत्र पुष्पार्ण और फिर उनके पुत्र व्युष्ट राजा बने।व्युष्ट के सर्वतेजा  और आगे  उनके  चक्षु  नामक  पुत्र राजा बने। यही राजा चक्षु ही चक्षुष नामक मन्वन्तर के मनु भी हुए। उनके पुत्र उल्मुक और उनके आगे अंग नामक पुत्र राजा बने।
       अंग की  पत्नी सनीथा ने  क्रूर कर्मा  वेन को जन्म दिया। वेन के कर्मों से तंग आकर  अंग ने भी  अपने नगर का  त्याग कर दिया। नगर को राजा वहीन देख कर भृगु आदि मुनियों ने माता सुनीथा से परामर्श कर वेन को राजा बना दिया। वह बड़ा ही निरंकुश राजा साबित हुआ। उसके द्वारा प्रजा पर किए जा रहे  अत्याचारों  को  देखते  हुए  ऋषियों  ने उसे समझाने का प्रयत्न  किया  तो  उल्टा  उसने  उनको  ही  मूर्ख बताया। तब ऋषियों के श्राप से वेन की मृत्यु हो गई।
                      भगवान पृथु का प्राकट्य
       राजा के ना रहने पर ऋषियों के द्वारा मरे  हुए  राजा वेन की भुजाओं  को  मथने  से  भगवान  विष्णु जी ने पृथु नामक बालक के रूप में अपना अंशावतार धारण किया। बंदिजनों ने उसी समय भगवान की स्तुति की।
       जब पृथु राजा बने उस  से  पहले  पृथ्वी अन्न पैदा करना बंद कर  चुकी  थी।  जब  राजा  पृथु  पृथ्वी पर कुपित हुए तो पृथ्वी ने प्रकट होकर भगवान की स्तुति की। पृथु जी प्रसन्न हुए और उन्होंने पृथ्वी को  पुत्री  के रूप में  स्वीकार किया। इसके बाद राजा  पृथु  ने पृथ्वी  को  समतल  किया। उसमें से अनेक प्रकार  की  औषधियों  का  दोहन किया। पृथ्वी ने भरपूर अन्न उगाना शुरू कर दिया।
       राजा पृथु ने 100 अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प लिया। 99  यज्ञ  पूरे होने  के पश्चात  जब वो सौवां यज्ञ करने लगे तो इन्द्र देवता ने विघ्न डालना शुरू कर दिया। जब राजा को पता चला तो  वो  इंद्र का वध  करने के लिए  तैयार  हो गए।  तभी ब्रह्मा जी ने उन्हें समझाया और ऐसा करने से रोका।
       तभी  यज्ञशाला में ही  भगवान विष्णु  का प्रादुर्भाव हुआ। इन्द्र ने अपने किए पर पश्चाताप किया।
       राजा पृथु  ने  अपनी प्रजा का  सनेहपूर्वक  पालन किया, उनको भगवान में  प्रीति रखने और अच्छे आचरण का उपदेश भी किया। राजा स्वयं कर्म करते हुए भी निर्लेप रहते थे।
       पृथु के  पांच पुत्र  हुए।  लंबे समय तक  शासन करने  के उपरांत  राज्य  भार  पुत्रों  को सौंप कर  अपनी भार्या के साथ तपोवन चले गए। पहले कंद मूल खाकर, फिर पत्ते आदि, फिर जल  पीकर  और फिर केवल वायु के सहारे  घोर तपस्या की। अंततोगत्वा दोनों भगवान के परमधाम को पधारे।
       पृथु के बाद उनके पुत्र विजाश्व राजा बने। उन्होंने इन्द्र से अन्तर्ध्यान  होने की  शक्ति पाई।  इस लिए  उनको  अन्तर्ध्यान नाम से भी  जाना जाता है।  इन्होंने भी तपस्या करके परमपद प्राप्त किया।  उनके  पुत्र हुए हविर्धान  और उनके बहिर्षद जो प्रजापति भी बने।  उन्होंने  बहुत से यज्ञ किए। प्रचिंबरही नाम से भी  प्रसिद्ध  हुए।  ब्रह्मा जी  के कहने पर  समुद्र की  कन्या शतदृती  से  उन्होंने  विवाह  किया  जिससे  प्रचेता  नाम   से विख्यात दस पुत्र हुए। वो दसों समुद्र में तपस्या करने चले गए।उन्होंने  महादेव जी से  तत्व का उपदेश पाया और महादेव जी के  बताए  दिशानिर्दशों  के अनुसार  दस हज़ार  वर्ष तक घोर तपस्या की। बहिर्शद के छ: और पुत्र भी हुए।
       इसी राजा बहीर्षद को नारद जी ने राजा पुरंजन की बहुत ही रुचिकर  और प्रेरणादायक कहानी सुनाई जिसको सुनने से आज  भी  व्यक्ति  को  ' मैं क्या हूं '  का ज्ञान हो जाता है। इस कहानी का वर्णन अगले लेख में किया जाएगा।
                       जय श्रीकृष्ण जी की

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