रविवार, 17 नवंबर 2019

श्रीमद्भागवत महापुराण - लेख संख्या- 13 (शिव कथा- ३)

         हिमालय की पुत्री के रूप पार्वती जी का जन्म
सती जी ने अगला जन्म पर्वत राज हिमालय की पुत्री  के  रूप में लिया। जब से पार्वती जी ने जन्म  लिया,तब  से  वहां  सारी सिद्धियां और संपत्तियां छा गईं।
                   नारद जी द्वारा भविष्य बताना
 एक दिन नारद जी का उधर आना हुआ। पार्वती जी की माता के पूछने पर नारद जी ने बताया कि तुम्हारी पुत्री सुंदर, सुशील और समझदार है। उमा, अंबिका और भवानी इसके  नाम  हैं। यह अपने पति को बहुत ही प्यारी होगी।  सुहाग  सदा  अटल रहेगा। परंतु इसका जो पति  होगा  वो  गुणहीन,  माता- पिता विहीन, उदासीन, संश्यहीन (लापरवाह), योगी जटाधारी, नंगा, निष्काम हृदय, और अमंगल वेश वाला होगा।
            पार्वती जी का तपस्या करने वन में जाना
यह बातें सुनकर माता पिता को बड़ा कष्ट  हुआ, परंतु  पार्वती जी ने इन बातों को धारण कर लिया। इतना  सब कुछ  सुनकर हिमराज और उनकी पत्नी मैना ने  नारद  जी  से  कोई  उपाय पूछा तो नारद जी ने बताया कि शिवजी भगवान के लक्षण भी ऐसे ही हैं। अगर पार्वती तप करेगी तो वह साक्षात शिवजी को पति रुप में प्राप्त कर सकती है। फिर  समय  आने  पर  माता पिता  को  समझाकर  और  उनकी  आज्ञा  लेकर  पार्वती  जी शिवजी महाराज को पति रूप में पाने के  लिए  तपस्या  करने वन में चली गईं। वहां पर उन्होंने घोर तपस्या की। पहले पहल फल फूल आदि खाकर, फिर साग आदि  खाकर, फिर  केवल जल पीकर और उसके बाद कठोर उपवास करके  चिर  काल तक तपस्या करती रहीं।
            एक दिन उनको आकाशवाणी सुनाई दी
 "अब तुम्हारा  मनोरथ  पूर्ण  होगा।  अब  तुम्हें  त्रिपुरारी  मिल जाएंगे। जब तुम्हें तुम्हारे पिता बुलाने आएं, जिद छोड़ कर  घर चली जाना। और जब सप्त ऋषि तुम्हें मिलने  आएं तो  इसको प्रमाण समझ लेना।"
            सप्त ऋषियों द्वारा पार्वती जी की परीक्षा
उधर भगवान शिव राम भजन में ही लगे रहे। एक दिन राम जी ने स्वयं प्रकट हो कर भगवान  शिव  को  पार्वती जी  के बारे में समझाया और कहा कि अब तुम मेरी आज्ञा से पार्वती  जी  से  विवाह कर लो। तब शिवजी  ने सप्त ऋषियों  को  पार्वती  जी के पास परीक्षा लेने के लिए  भेजा।  ऋषियों ने  कई  प्रकार से पार्वती जी की परीक्षा ली और पाया कि  पार्वती जी तो  अपने इरादे पर पूर्णतया अडिग हैं। तब वे  हिमाचल  के  पास  पहुंचे और उन्हें पार्वती जी को घर लाने के लिए कहा। जब  शिवजी को सारी बात पता चली तो  वे  भी  बहुत  प्रसन्न  हुए।  उसके  बाद शिवजी समाधि में चले गए।
             शिवजी भगवान द्वारा कामदेव भस्म
उसी समय तारक नाम का असुर हुआ  जो  बहुत  ही  बलवान था। उसने सब देवताओं को जीत लिया था। तब हारे हुए सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने बताया कि तारक को केवल शिवजी का पुत्र ही मार सकता है।  यह भी  बताया  कि सती ने ही पार्वती के रूप में जन्म लिया है। अगर तुम कामदेव को शिवजी के पास भेज कर उनकी समाधि भंग करवा सकते हो तो तुम्हारा कार्य शीघ्र हो  सकता है।  देवताओं  ने  कामदेव को भेजा। कामदेव के इस प्रयास से समाधि तो भंग  हुईं  परंतु निष्काम भगवान ने क्रोध में कामदेव के शरीर को ही भस्म कर दिया। कामदेव की पत्नी रती की प्रार्थना पर भगवान  शिव  ने कहा कि यह बिना शरीर के ही व्यापेगा। और तुम्हें  यह  द्वापर युग में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में मिलेगा।
          ब्रह्मा जी द्वारा मनाने पर शिवजी सहमत हुए
वहां पर सभी देवताओं के साथ ब्रह्मा जी का भी आना  हुआ। उन्होंने शिवजी महाराज जी  को  सृष्टि  के  कल्याण  के  लिए पार्वती जी से विवाह के लिए कहा जिस पर  भगवान  शिवजी  ने अपनी सहमति दे दी। ऋषियों ने हिमाचल  के  पास  जाकर लगन लिखवाए।
                       अनोखी शिव बारात
 अनोखी बारात चली। विष्णु जी और सभी देवगण साथ चले। उनके इलावा सभी गण एवं भूत प्रेत आदि भी उनके साथ थे।  तुलसी जी ने लिखा है कि किसी का हाथ नहीं तो कोई मुख के बिना ही चला जा रहा है। वहां  लगन पत्री ब्रह्मा जी ने पढ़ कर सुनाई।
                     भगवान शिव का श्रंगार
जटा मुकुट, ऊपर सांपों का मौर सजाया  है, सांपों  के  कुंडल, शरीर पर विभूति रमाई है। बाघाम्बर लपेटा हुआ है, मस्तक पर चंद्रमा और सिर पर गंगा जी सुशोभित हैं। तीन नेत्र  सांपों  का जनेऊ, गले  में  विष, छाती  पर  नरमुंडों  की  माला, मेरे  प्रभु कल्याण के धाम हाथ  में  त्रिशूल  और  डमरू  लिए  बैल  पर सवार हैं। पहले तो आगवानी करने वाले डर  गए।  परंतु  कुछ समझदार लोग डटे रहे। स्वागत का पूरा प्रबंध  किया गया था। मैना को चिंता होने पर नारद जी ने पिछले जन्म की  सब कथा सुनाकर सभी संदेह दूर कर दिए। सब को  संतोष  हुआ। सुंदर मंडप सजाया गया। पार्वती जी की  सुंदरता  देखते  ही  बनती थीं।
                कार्तिकेय जी द्वारा तारकासुर वध
 विवाह उपरांत विदाई हुई। और भगवान शिव माता पार्वती के साथ हिमालय पहुंचे और वहां निवास करते हुए भगवान  शिव ने पूरी राम कथा माता पार्वती जी को सुनाई।  रामचरितमानस में ऐसा दर्शन आया है कि भगवान शिव राम जी का और  राम भगवान शिवजी भगवान का ध्यान लगाते हैं। जब शिव पार्वती जी के पुत्र कार्तिकेय जी का जन्म हुआ तब  कार्तिकेय  जी  ने ही तारकासुर का वध किया और  इस  तरह  देवता  भय  मुक्त हुए। अगले लेख में हम भक्त ध्रुव जी की कथा पढ़ेंगे।
                        जय श्रीकृष्ण जी की
      

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