सनकादि ऋषियों का बैकुंठ में प्रवेश
एक बार सनक आदि ऋषि कुमार जो कि विष्णु जी के प्रथम अवतार माने जाते हैं और अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, भगवान विष्णु जी के शुद्ध सत्वमय बैकुंठ धाम में पहुंचे। भगवान विष्णु के दर्शन की लालसा से अन्य दर्शनीय सामग्री की उपेक्षा करते हुए बैकुंठ धाम की छ: द्योडियां पार करके जब वे सातवीं डियोड़ी पर पहुंचे, तब वहां पर उन्हें हाथ में गदा लिए हुए दो समान आयु वाले देवश्रेश्ठ दिखाई दिए। उनके चेहरे पर कुछ क्षोभ के से चिन्ह दिखाई दे रहे थे। सनकादिक ऋषियों को निसंकोच रूप से भीतर जाते देख उन द्वार पालों ने उन्हें, उनकी हंसी उड़ाते हुए, रोका।
ऋषियों द्वारा जय विजय को शाप
मुनियों ने कहा," जो लोग भगवान के इस लोक को प्राप्त होने पर यहां निवास करते हैं, वे तो भगवान् के समान ही समदर्शी होते हैं। किन्तु तुम्हारे स्वभाव में यह विषमता क्यों है ? तुम हो तो बैकुंठ नाथ के पार्षद, किन्तु तुम्हारी बुद्धि बहुत मंद है। इस लिए तुम्हारा कल्याण करने के लिए ही हम तुम्हारे इस अपराध के योग्य दण्ड का विचार करते हैं। तुम अपनी बहुत ही मंद और भेद बुद्धि दोष के कारण इस लोक से निकल कर उन पापमय योनिओं में जाओ जहां पर काम, क्रोध, लोभ नाम के तीन शत्रु निवास करते हैं।" ऐसे वचन सुनकर उन्होंने बड़े आतुर होकर कहा, " भगवन हम अवश्य अपराधी हैं। और आपने हमें उचित दण्ड दिया है, किन्तु हमारी इस दुर्दशा पर विचार करके यदि आपको, करुणा वश थोड़ा सा भी अनुताप हो तो ऐसी कृपा कीजिए, जिससे उन अधमाधम योनियों में जाने पर भी हमें भागवत स्मृति को नष्ट करने वाला मोह ना प्राप्त हो।"
भगवान द्वारा ऋषियों को दर्शन देना
उसी समय भगवान स्वयं वहां पहुंचे और चारों सनत कुमारों ने उनके दर्शन किए। भगवान ने कहा कि मेरे ही लोगों द्वारा आप का अपमान मेरे लिए असहनीय है। परंतु मेरे अनुरोध से आप केवल इतनी कृपा कीजिए, जिससे इनका निर्वसन काल शीघ्र ही समाप्त हो जाए। मुनियों ने कहा कि आप सर्वेश्वर हो कर भी हमारे परम हितकारी हैं। आप साक्षात धर्म स्वरुप हैं। हमने आपके इन निरपराध अनुचरों को शाप दिया है, इसके लिए आप हमें उचित दण्ड दें। भगवान ने कहा कि यह सब तो मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। अब ये दोनों शीघ्र ही दैत्य योनि को प्राप्त होंगे और वहां पर क्रोधावेश में बढ़ी हुई एकाग्रता के कारण सुदृढ योग संपन्न होकर जल्दी ही मेरे पास लौट आएंगे।
हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का जन्म
वे दोनों दैवश्रेश्ठ जय और विजय ब्रह्म श्राप से उस अलंघनिय भगवतधाम में ही श्रीहीन हो गए तथा उनका सारा का सारा गर्व जाता रहा। देखते ही देखते वे बैकुंठ लोक से नीचे गिर गए और दोनों ने ही महर्षि कश्यप जी की पत्नी दिती के गर्भ में प्रवेश किया। उस समय वो यही सोच रहे थे कि अगर यही हरि इच्छा है तो इसमें हमारा कल्याण ही होगा। समय आने पर दिती के दो यमज (जुड़वां) पुत्र उत्पन्न हुए उनके नाम हुए हिरण्याक्ष और हिर्रण्यकशिपु। हिरण्याक्ष का वध भगवान वाराह ने किया और हिरण्यकशिपु का वध भगवान नृसिंह ने किया था। इन दोनों ने ही त्रेता युग में रावण और कुंभकर्ण के रूप में जन्म लिया और इनका वध भगवान राम ने किया। द्वापर युग में इन्होंने ही शिशुपाल एवं दंतवक्र के रूप में जन्म लिया और उस समय इनका वध श्रीकृष्ण जी द्वारा हुआ था। इनके बारे विस्तार से चर्चा अगले अलग अलग लेखों में करेंगे।
। जय श्रीकृष्ण जी की।
एक बार सनक आदि ऋषि कुमार जो कि विष्णु जी के प्रथम अवतार माने जाते हैं और अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, भगवान विष्णु जी के शुद्ध सत्वमय बैकुंठ धाम में पहुंचे। भगवान विष्णु के दर्शन की लालसा से अन्य दर्शनीय सामग्री की उपेक्षा करते हुए बैकुंठ धाम की छ: द्योडियां पार करके जब वे सातवीं डियोड़ी पर पहुंचे, तब वहां पर उन्हें हाथ में गदा लिए हुए दो समान आयु वाले देवश्रेश्ठ दिखाई दिए। उनके चेहरे पर कुछ क्षोभ के से चिन्ह दिखाई दे रहे थे। सनकादिक ऋषियों को निसंकोच रूप से भीतर जाते देख उन द्वार पालों ने उन्हें, उनकी हंसी उड़ाते हुए, रोका।
ऋषियों द्वारा जय विजय को शाप
मुनियों ने कहा," जो लोग भगवान के इस लोक को प्राप्त होने पर यहां निवास करते हैं, वे तो भगवान् के समान ही समदर्शी होते हैं। किन्तु तुम्हारे स्वभाव में यह विषमता क्यों है ? तुम हो तो बैकुंठ नाथ के पार्षद, किन्तु तुम्हारी बुद्धि बहुत मंद है। इस लिए तुम्हारा कल्याण करने के लिए ही हम तुम्हारे इस अपराध के योग्य दण्ड का विचार करते हैं। तुम अपनी बहुत ही मंद और भेद बुद्धि दोष के कारण इस लोक से निकल कर उन पापमय योनिओं में जाओ जहां पर काम, क्रोध, लोभ नाम के तीन शत्रु निवास करते हैं।" ऐसे वचन सुनकर उन्होंने बड़े आतुर होकर कहा, " भगवन हम अवश्य अपराधी हैं। और आपने हमें उचित दण्ड दिया है, किन्तु हमारी इस दुर्दशा पर विचार करके यदि आपको, करुणा वश थोड़ा सा भी अनुताप हो तो ऐसी कृपा कीजिए, जिससे उन अधमाधम योनियों में जाने पर भी हमें भागवत स्मृति को नष्ट करने वाला मोह ना प्राप्त हो।"
भगवान द्वारा ऋषियों को दर्शन देना
उसी समय भगवान स्वयं वहां पहुंचे और चारों सनत कुमारों ने उनके दर्शन किए। भगवान ने कहा कि मेरे ही लोगों द्वारा आप का अपमान मेरे लिए असहनीय है। परंतु मेरे अनुरोध से आप केवल इतनी कृपा कीजिए, जिससे इनका निर्वसन काल शीघ्र ही समाप्त हो जाए। मुनियों ने कहा कि आप सर्वेश्वर हो कर भी हमारे परम हितकारी हैं। आप साक्षात धर्म स्वरुप हैं। हमने आपके इन निरपराध अनुचरों को शाप दिया है, इसके लिए आप हमें उचित दण्ड दें। भगवान ने कहा कि यह सब तो मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। अब ये दोनों शीघ्र ही दैत्य योनि को प्राप्त होंगे और वहां पर क्रोधावेश में बढ़ी हुई एकाग्रता के कारण सुदृढ योग संपन्न होकर जल्दी ही मेरे पास लौट आएंगे।
हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु का जन्म
वे दोनों दैवश्रेश्ठ जय और विजय ब्रह्म श्राप से उस अलंघनिय भगवतधाम में ही श्रीहीन हो गए तथा उनका सारा का सारा गर्व जाता रहा। देखते ही देखते वे बैकुंठ लोक से नीचे गिर गए और दोनों ने ही महर्षि कश्यप जी की पत्नी दिती के गर्भ में प्रवेश किया। उस समय वो यही सोच रहे थे कि अगर यही हरि इच्छा है तो इसमें हमारा कल्याण ही होगा। समय आने पर दिती के दो यमज (जुड़वां) पुत्र उत्पन्न हुए उनके नाम हुए हिरण्याक्ष और हिर्रण्यकशिपु। हिरण्याक्ष का वध भगवान वाराह ने किया और हिरण्यकशिपु का वध भगवान नृसिंह ने किया था। इन दोनों ने ही त्रेता युग में रावण और कुंभकर्ण के रूप में जन्म लिया और इनका वध भगवान राम ने किया। द्वापर युग में इन्होंने ही शिशुपाल एवं दंतवक्र के रूप में जन्म लिया और उस समय इनका वध श्रीकृष्ण जी द्वारा हुआ था। इनके बारे विस्तार से चर्चा अगले अलग अलग लेखों में करेंगे।
। जय श्रीकृष्ण जी की।
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