परीक्षित ने श्री शुकदेव जी से पूछा कि भगवान अपनी माया से सृष्टि की रचना कैसे करते है। इसके उत्तर में श्री शुकदेव जी ने परीक्षित से कहा कि यही प्रश्न एक बार नारद जी ने ब्रह्मा जी से पूछा था और ब्रह्मा जी ने जो उत्तर दिया था, वो मैं तुम्हें बताता हूं। सुनो:
ब्रह्मा जी ने कहा, " हे नारद मैं , स्वयं प्रकाश भगवान, से प्रकाशित होकर संसार को प्रकाशित करता हूँ।" भगवान निराकार होते हुए भी सर्वस्वरूप हैं। उन्होंने ही मुझे बनाया है।
भगवान माया के गुणों से रहित, अनंत, इंद्रियातीत हैं। उनकी दृष्टि से प्रेरित होकर ही मैं सृष्टि करता हूँ। भगवान माया के तीनों गुणों (सत्व, रज और तमोगुण) से अपने आप को ढक लेते हैं। इस लिए लोग उसे जान नहीं पाते। जीव माया में रम कर ' मैं और मेरा में पड़ जाता है'। जीव अगर माया से दूर रहता है तो आत्माराम बन जाता है। इस को समझने के लिए सृष्टि रचना को विस्तार से जानना आवश्यक है। आओ सृष्टि रचना का संक्षिप्त वर्णन करते हैं।
भगवान द्वारा माया से सृष्टि की रचना:
मायापती भगवान ने एक से अनेक होने की इच्छा होने पर अपनी माया से अपने स्वरुप में स्वयं प्राप्त, 'काल, कर्म और स्वभाव' को स्वीकार कर लिया
महत्तत्व की उत्पत्ति:
काल ने तीनों गुणों ( सतोगुण, रजोगुण, और तमोगुण) में क्षोभ उत्पन्न किया। स्वभाव ने तीनों गुणों को रूपांतरित कर दिया। और कर्म ने महत्तत्व को जन्म दिया। महत्तत्व का अर्थ है ( sum total of material creation (ultimate end of the all universes)
अहंकार की उत्पत्ति:
महत्तत्व में रजोगुण और सतोगुण की वृद्धि होने पर महत्तत्व में विकार हुआ उससे ज्ञान, क्रिया और द्रव्य रूप तम: प्रधान विकार हुआ। उस विकार को कहा गया अहंकार (पहचान)।
अहंकार के तीन रूप:
अहंकार फिर विकारों को प्राप्त हुआ और तीन प्रकार का हो गया:-
1. वैकारिक अहंकार से मन, इन्द्रियों के देवताओं की उत्पत्ति: यह अहंकार 'ज्ञान शक्ति' प्रधान है। इस से मन की उत्पत्ति हुई। इस से इन्द्रियों के 10 अधिष्ठातृ देवताओं की भी उत्पत्ति हुई जिनके नाम हैं:-- दिशा, वायु, सूर्य, वरुण, अश्वनी कुमार, अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मित्र और प्रजापति।
2. तेजस अहंकार से बुद्धि, प्राण एवं इन्द्रियों का निर्माण: यह अहंकार 'क्रिया शक्ति' प्रधान है। इसके विकार से पांच ज्ञान इन्द्रियां--- श्रोत्र (कान), त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नाक; पांच कर्म इन्द्रियां -- मुख, हस्त, पैर, गुदा और जनन अंग उत्पन्न हुईं। साथ ज्ञान शक्ति रूप बुद्धि और क्रिया शक्ति रूप प्राण भी तेजस अहंकार से ही उत्पन्न हुए।
3. तामस अहंकार से पांच भूत एवं पांच तन्मात्रा निर्माण:
यह द्रव्य शक्ति प्रधान अहंकार है।इसमें विकार आने से 'आकाश की उत्पत्ति' हुई। आकाश का गुण है शब्द। शब्द के द्वारा ही दृष्टा और द्रव्य का बोध होता है। आकाश में विकार आने से 'वायु की उत्पति' हुई। वायु का गुण है स्पर्श। अपने कारण का गुण आ जाने से शब्द भी इसका गुण है। इन्द्रियों में स्फूर्ति, शरीर में जीवन शक्ति, ओज़ और बल इसी के रूप हैं। काल, कर्म और स्वभाव से वायु में भी विकार हुआ। उससे 'तेज (अग्नि) की उत्पत्ति' हुई। इसका प्रधान गुण, रूप है। इसमें इसके कारण आकाश और वायु के गुण शब्द और स्पर्श भी हैं। तेज के विकार से जल की उत्पत्ति हुई। इसका गुण है रस। कारण तत्वों के गुण शब्द, स्पर्श, और रूप भी इसमें हैं। जल के विकार से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई। इसका गुण है गंध। इसके कारण तात्वों के गुण शब्द, स्पर्श, रूप और रस भी इसमें विद्यमान हैं।
विराट पुरुष की उत्पत्ति:
हे नारद जिस समय यह पंच भूत, इन्द्रियां, मन, और सत्व, रजो और तमो गुण परस्पर संगठित नहीं थे, तब अपने रहने के लिए, भोगों के साधन रूप शरीर की रचना नहीं कर सके। जब भगवान ने उन्हें अपनी शक्ति से प्रेरित किया तब वे तत्व परस्पर एक दूसरे के साथ मिल गए। उन्होंने आपस में कार्य कारण भाव को स्वीकार करके व्याष्टी-- समष्टि रूप पिंड और ब्रह्माण्ड दोनों की रचना की। वह ब्रह्माण्ड रूप अंडा एक सहस्र वर्ष तक निर्जीव रूप से जल में पड़ा रहा। फिर भगवान ने उसे जीवत कर दिया। उसको फोड़ कर उसमें से वही विराट रूप निकला जिसकी जंघा, चरण, भुजाएं, नेत्र, मुख और सिर सहस्त्रों की संख्या में हैं।
चौदह लोकों के नाम:
श्रीमद्भागवत में कुल चौदह लोकों का वर्णन आता है। उनके नाम हैं:-- भू - लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महरलोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक और अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल एवं पताल्लोक। यह सब लोक विराट पुरुष के अंदर ही आते हैं। अगला लेख सृष्टि के विस्तार के बारे में होगा।
(जय श्रीकृष्ण जी की)
ब्रह्मा जी ने कहा, " हे नारद मैं , स्वयं प्रकाश भगवान, से प्रकाशित होकर संसार को प्रकाशित करता हूँ।" भगवान निराकार होते हुए भी सर्वस्वरूप हैं। उन्होंने ही मुझे बनाया है।
भगवान माया के गुणों से रहित, अनंत, इंद्रियातीत हैं। उनकी दृष्टि से प्रेरित होकर ही मैं सृष्टि करता हूँ। भगवान माया के तीनों गुणों (सत्व, रज और तमोगुण) से अपने आप को ढक लेते हैं। इस लिए लोग उसे जान नहीं पाते। जीव माया में रम कर ' मैं और मेरा में पड़ जाता है'। जीव अगर माया से दूर रहता है तो आत्माराम बन जाता है। इस को समझने के लिए सृष्टि रचना को विस्तार से जानना आवश्यक है। आओ सृष्टि रचना का संक्षिप्त वर्णन करते हैं।
भगवान द्वारा माया से सृष्टि की रचना:
मायापती भगवान ने एक से अनेक होने की इच्छा होने पर अपनी माया से अपने स्वरुप में स्वयं प्राप्त, 'काल, कर्म और स्वभाव' को स्वीकार कर लिया
महत्तत्व की उत्पत्ति:
काल ने तीनों गुणों ( सतोगुण, रजोगुण, और तमोगुण) में क्षोभ उत्पन्न किया। स्वभाव ने तीनों गुणों को रूपांतरित कर दिया। और कर्म ने महत्तत्व को जन्म दिया। महत्तत्व का अर्थ है ( sum total of material creation (ultimate end of the all universes)
अहंकार की उत्पत्ति:
महत्तत्व में रजोगुण और सतोगुण की वृद्धि होने पर महत्तत्व में विकार हुआ उससे ज्ञान, क्रिया और द्रव्य रूप तम: प्रधान विकार हुआ। उस विकार को कहा गया अहंकार (पहचान)।
अहंकार के तीन रूप:
अहंकार फिर विकारों को प्राप्त हुआ और तीन प्रकार का हो गया:-
1. वैकारिक अहंकार से मन, इन्द्रियों के देवताओं की उत्पत्ति: यह अहंकार 'ज्ञान शक्ति' प्रधान है। इस से मन की उत्पत्ति हुई। इस से इन्द्रियों के 10 अधिष्ठातृ देवताओं की भी उत्पत्ति हुई जिनके नाम हैं:-- दिशा, वायु, सूर्य, वरुण, अश्वनी कुमार, अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मित्र और प्रजापति।
2. तेजस अहंकार से बुद्धि, प्राण एवं इन्द्रियों का निर्माण: यह अहंकार 'क्रिया शक्ति' प्रधान है। इसके विकार से पांच ज्ञान इन्द्रियां--- श्रोत्र (कान), त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नाक; पांच कर्म इन्द्रियां -- मुख, हस्त, पैर, गुदा और जनन अंग उत्पन्न हुईं। साथ ज्ञान शक्ति रूप बुद्धि और क्रिया शक्ति रूप प्राण भी तेजस अहंकार से ही उत्पन्न हुए।
3. तामस अहंकार से पांच भूत एवं पांच तन्मात्रा निर्माण:
यह द्रव्य शक्ति प्रधान अहंकार है।इसमें विकार आने से 'आकाश की उत्पत्ति' हुई। आकाश का गुण है शब्द। शब्द के द्वारा ही दृष्टा और द्रव्य का बोध होता है। आकाश में विकार आने से 'वायु की उत्पति' हुई। वायु का गुण है स्पर्श। अपने कारण का गुण आ जाने से शब्द भी इसका गुण है। इन्द्रियों में स्फूर्ति, शरीर में जीवन शक्ति, ओज़ और बल इसी के रूप हैं। काल, कर्म और स्वभाव से वायु में भी विकार हुआ। उससे 'तेज (अग्नि) की उत्पत्ति' हुई। इसका प्रधान गुण, रूप है। इसमें इसके कारण आकाश और वायु के गुण शब्द और स्पर्श भी हैं। तेज के विकार से जल की उत्पत्ति हुई। इसका गुण है रस। कारण तत्वों के गुण शब्द, स्पर्श, और रूप भी इसमें हैं। जल के विकार से पृथ्वी की उत्पत्ति हुई। इसका गुण है गंध। इसके कारण तात्वों के गुण शब्द, स्पर्श, रूप और रस भी इसमें विद्यमान हैं।
विराट पुरुष की उत्पत्ति:
हे नारद जिस समय यह पंच भूत, इन्द्रियां, मन, और सत्व, रजो और तमो गुण परस्पर संगठित नहीं थे, तब अपने रहने के लिए, भोगों के साधन रूप शरीर की रचना नहीं कर सके। जब भगवान ने उन्हें अपनी शक्ति से प्रेरित किया तब वे तत्व परस्पर एक दूसरे के साथ मिल गए। उन्होंने आपस में कार्य कारण भाव को स्वीकार करके व्याष्टी-- समष्टि रूप पिंड और ब्रह्माण्ड दोनों की रचना की। वह ब्रह्माण्ड रूप अंडा एक सहस्र वर्ष तक निर्जीव रूप से जल में पड़ा रहा। फिर भगवान ने उसे जीवत कर दिया। उसको फोड़ कर उसमें से वही विराट रूप निकला जिसकी जंघा, चरण, भुजाएं, नेत्र, मुख और सिर सहस्त्रों की संख्या में हैं।
चौदह लोकों के नाम:
श्रीमद्भागवत में कुल चौदह लोकों का वर्णन आता है। उनके नाम हैं:-- भू - लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महरलोक, जनलोक, तपोलोक, सत्यलोक और अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल एवं पताल्लोक। यह सब लोक विराट पुरुष के अंदर ही आते हैं। अगला लेख सृष्टि के विस्तार के बारे में होगा।
(जय श्रीकृष्ण जी की)
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